भागलपुर की गलियों में आज भी जीवित हैं बनफूल की स्मृतियां
भागलपुर। प्राचीन अंगभूमि की पहचान केवल उसके गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं से नहीं रही है। गंगा के दोनों किनारों पर विकसित इस क्षेत्र ने बिहार और बंगाल के बीच सदियों से सांस्कृतिक संवाद की मजबूत कड़ी का काम किया। इसी वजह से भागलपुर में अनेक बांग्लाभाषी साहित्यकारों और कलाकारों ने रहकर अपनी रचनात्मक प्रतिभा को नई ऊंचाइयां दीं। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय से लेकर डॉ. बलायचंद मुखोपाध्याय यानी बनफूल तक, कई रचनाकारों की स्मृतियां आज भी इस शहर की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
बनफूल का नाम बांग्ला साहित्य में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। चिकित्सक होने के साथ-साथ वे ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने आम आदमी के जीवन, उसकी परेशानियों, संवेदनाओं और सामाजिक विसंगतियों को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया। 60 से अधिक उपन्यासों के अलावा उन्होंने बड़ी संख्या में कहानियां, कविताएं, नाटक और अन्य साहित्यिक रचनाएं लिखीं। उनके लेखन की विशेषता यह थी कि सामान्य जीवन की छोटी-सी घटना भी उनकी दृष्टि में गहरे मानवीय अर्थ हासिल कर लेती थी।
हाटे बाजारे’ ने दिलाई व्यापक पहचान
बनफूल की रचनात्मक लोकप्रियता को व्यापक स्तर पर पहचान उनकी चर्चित कृति ‘हाटे बाजारे’ से मिली। तपन सिन्हा के निर्देशन में इस कहानी पर बनी बांग्ला फिल्म में अशोक कुमार और वैजयंतीमाला ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं। फिल्म को वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक मिला। विदेश में आयोजित एशियन फिल्म महोत्सव में भी इसे सम्मान प्राप्त हुआ।
बनफूल की कई अन्य रचनाओं को भी फिल्मों के माध्यम से पर्दे पर उतारा गया। उनके नाटक ‘मंत्रमुग्ध’ पर फिल्म बनी, जबकि चर्चित उपन्यास ‘अग्नीश्वर’ भी फिल्म के रूप में दर्शकों तक पहुंचा। हालांकि बनफूल को केवल बांग्ला साहित्य की सीमा में देखना उनके व्यापक रचनात्मक व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। उनके जीवन और साहित्य पर भागलपुर की मिट्टी की गहरी छाप थी।
साहित्य में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। उनकी जन्मशती के अवसर पर डाक टिकट भी जारी किया गया। उनकी लोकप्रिय कृति ‘हाटे बाजारे’ का नाम आज भी रेल यात्रियों के लिए परिचित है। बरौनी से नवगछिया होते हुए सियालदह जाने वाली ‘हाटे बाजारे एक्सप्रेस’ उनके साहित्य की स्मृति को एक अलग रूप में जीवित रखती है।
मनीहारी से भागलपुर तक का सफर
बनफूल का जन्म 19 जुलाई 1899 को मनीहारी में हुआ था। उनके पिता सत्यचरण मुखोपाध्याय मूल रूप से बंगाल के हुगली जिले से थे और नौकरी के सिलसिले में गंगा पार मनीहारी में रहते थे। बाल्यकाल में ही बनफूल का जीवन बिहार और बंगाल की साझा सांस्कृतिक धारा से जुड़ गया।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा मनीहारी, साहेबगंज और हजारीबाग में हुई। आगे उन्होंने पटना से चिकित्सा शिक्षा हासिल की और कोलकाता से पैथोलॉजी में विशेषज्ञता प्राप्त की। चिकित्सकीय जीवन की शुरुआत उन्होंने बंगाल के आजिमगंज में मेडिकल ऑफिसर के रूप में की।
पिता के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद उन्हें भागलपुर आना पड़ा। उनके छोटे भाई भी भागलपुर सदर अस्पताल में कार्यरत थे। करीब 1929 के आसपास भागलपुर पहुंचने के बाद यह शहर उनके जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। लगभग चार दशकों तक उन्होंने भागलपुर में रहते हुए चिकित्सा और साहित्य, दोनों क्षेत्रों में अपनी सक्रियता बनाए रखी।
दिन में डॉक्टर, रात में साहित्यकार
भागलपुर में बनफूल ने अपना पैथोलॉजिकल क्लीनिक शुरू किया। समय के साथ उन्होंने घर और क्लीनिक के कई ठिकाने बदले और अंततः आदमपुर में अपना मकान खरीदा। उनका पेशा चिकित्सा था, लेकिन साहित्य उनकी आत्मा में बसता था।
दिनभर मरीजों की जांच और उपचार के बाद वे रात में लेखन में जुट जाते थे। चिकित्सक के रूप में समाज के अलग-अलग वर्गों से उनका प्रतिदिन संपर्क होता था। मरीजों और आम लोगों से मिलने वाले अनुभव उनके साहित्य की सामग्री बनते गए।
उनकी रचनाएं कोलकाता की साहित्यिक पत्रिका ‘शनिवारे चिट्ठी’ में प्रकाशित होने लगीं। व्यंग्य कविताओं और लेखों के माध्यम से उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। बाद में ‘बनफूलेर गल्प’, ‘बनफूलेर कविता’ और उपन्यास ‘तृणखंड’ जैसी कृतियों ने बांग्ला साहित्य में उनकी प्रतिष्ठा को मजबूत किया।
भागलपुर बना रचनात्मक प्रेरणा का केंद्र
बनफूल के लिए भागलपुर केवल निवास की जगह नहीं था। शहर का सामाजिक जीवन उनकी रचनात्मक चेतना में लगातार प्रवेश करता रहा। यहां की गलियां, बाजार, घाट, अस्पताल, गंगा किनारे का जीवन, मजदूर बस्तियां और आम लोगों की दिनचर्या उनके लेखन में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।
कुली, मोटिया मजदूर, मछुआरे, मछुआरिनें और छोटे काम करने वाले लोग उनके साहित्य के महज पात्र नहीं थे। वे उनके जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव का हिस्सा थे। यही वजह है कि ‘हाटे बाजारे’ जैसी रचनाओं में आम आदमी का जीवन बेहद स्वाभाविक और जीवंत दिखाई देता है।
दिनकर से रहा आत्मीय संबंध
भागलपुर में रहते हुए बनफूल का संपर्क हिंदी और बांग्ला साहित्य की कई महत्वपूर्ण हस्तियों से रहा। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर उस समय भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति थे। दोनों के बीच आत्मीय संबंध थे। दिनकर ने बनफूल को विश्वविद्यालय की सीनेट का सदस्य भी बनाया।
महादेवी वर्मा और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ से भी उनके संबंध रहे। कलाकार-साहित्यकार हरिकुंज के चित्रशाला स्टूडियो में भी साहित्यकारों की बैठकें हुआ करती थीं, जहां डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ समेत कई रचनाकारों के साथ बनफूल की साहित्यिक चर्चा होती थी।
भागलपुर के लोगों का प्यार कभी नहीं भूले
बनफूल की आत्मकथा ‘उदय अस्त’ में भागलपुर के प्रति उनके लगाव की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्होंने यहां के लोगों से मिले स्नेह को अपने जीवन की महत्वपूर्ण पूंजी माना। उनके अनुसार, भागलपुर में उन्हें बिहारी और अन्य गैर-बंगाली लोगों से जिस आत्मीयता का अनुभव हुआ, वह विशेष था।
भागलपुर छोड़ने का समय भी उनके लिए भावुक कर देने वाला था। जून 1968 में निजी और पारिवारिक कारणों से वे कोलकाता चले गए। विदाई के दौरान उनके सम्मान में कई सभाएं हुईं और स्टेशन पर उन्हें विदा करने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।
महानगर कोलकाता में बस जाने के बाद भी भागलपुर उनके भीतर बना रहा। अपने जीवन के उस दौर को याद करते हुए उन्होंने स्वीकार किया था कि भागलपुर में उनका जीवन सुख का जीवन था।
स्मृतियों में आज भी जिंदा है बनफूल का भागलपुर
बनफूल ने 1979 में अंतिम सांस ली, लेकिन उनका साहित्य आज भी जीवित है। भागलपुर की गलियों में उनका घर शायद आज पहले की तरह आसानी से दिखाई न दे, लेकिन शहर की सांस्कृतिक स्मृतियों में उनकी मौजूदगी अब भी महसूस की जा सकती है।
उनकी रचनाओं में दर्ज भागलपुर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत संसार है—जहां गंगा की नमी है, बाजारों की चहल-पहल है, मेहनतकश लोगों का संघर्ष है, आम आदमी की हंसी और पीड़ा है और इन सबको बेहद करीब से देखने वाली एक संवेदनशील साहित्यिक दृष्टि है।
यही कारण है कि समय बीतने के बावजूद भागलपुर और बनफूल का रिश्ता खत्म नहीं हुआ। शहर की स्मृतियों और उनकी रचनाओं में आज भी एक-दूसरे की छवि दिखाई देती है। भागलपुर की गलियों में बिखरी बनफूल की यादें दरअसल उस साझा अंग-बंग संस्कृति की भी याद हैं, जिसने साहित्य को सीमाओं से परे जाकर मनुष्य से जोड़ने का काम किया।
