कर्मवीर की कलम का संदेश

Message from Karmaveer's pen
 
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आए हैं… कवि डॉ. कुमार विश्वास जी भी आए हैं

(  लेखक आर्यन वाजपेयी  )

 

 

मैं यहाँ मौन खड़ा हूँ… इस लाल परदे के पीछे। बाहर हलचल है — छात्रों की चहचहाहट, मीडिया के कैमरे, तैयारी की गूँज और उत्सव का माहौल। पर इस परदे की ओट में मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ… केवल मूर्ति के उद्घाटन की नहीं, बल्कि अपने विचारों के पुनर्जन्म की।

 

 

पत्थर में ढला मेरा यह रूप भले स्थिर है, पर भीतर विचारों का सागर उमड़ रहा है। क्या आज की पीढ़ी समझ पाएगी कि पत्रकारिता महज़ नौकरी नहीं, बल्कि एक सामाजिक दायित्व है? क्या यह विश्वविद्यालय, जो मेरे नाम पर खड़ा है, मेरे आदर्शों को उसी तरह जी रहा है जैसे मैंने कभी जिए थे?

 

 

मैं 1889 में होशंगाबाद की पावन धरती पर जन्मा। मेरे समय में यह देश पराधीन था। तब पत्रकारिता का अर्थ केवल समाचार लिखना नहीं था, बल्कि अन्याय के विरुद्ध लड़ना था। ‘कर्मवीर’ मेरे हाथों की कलम नहीं, बल्कि मेरी आत्मा की आवाज़ था। उसमें बहती स्याही मेरे सपनों और मेरे क्रोध की साक्षी थी।

 

आज जब मैं अपनी मूर्ति के नीचे वही ‘कर्मवीर’ अख़बार देखता हूँ, तो लगता है मानो मेरी कलम फिर से धड़क उठी हो। यह दृश्य मुझे आश्वस्त करता है कि मेरे विचार अब इस विश्वविद्यालय की मिट्टी में दर्ज हो चुके हैं। पर्दे के पार से आती आवाज़ें मेरे कानों में गूँज रही हैं — छात्रों की जिज्ञासा, शिक्षकों की उम्मीदें और पत्रकारों की उपस्थिति। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आए और कवि डॉ. कुमार विश्वास  और कुलगुरू  विजय मनोहर तिवारी सभी यहाँ मौजूद हैं। क्षण-प्रतिक्षण मुझे महसूस हो रहा है कि यह समारोह केवल मूर्ति अनावरण नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आत्मा को याद करने का अवसर है।

 

और फिर… लाल परदा हटता है।
मेरे चेहरे पर रोशनी पड़ती है।


तालियों की गड़गड़ाहट और कैमरों की चमक के बीच मैं छात्रों की आँखों में सम्मान देखता हूँ।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस विश्वविद्यालय को आने वाली पीढ़ियों के लिए दीपस्तंभ कहा।
कवि डॉ. कुमार विश्वास ने रामायण के प्रसंगों से संचार की महत्ता को रेखांकित किया।
और कुलगुरू . विजय मनोहर तिवारी ने एक सटीक संदेश दिया 
“पत्रकारिता में उधार के कंधे नहीं होने चाहिए। कलम अपनी हो, साहस अपना हो और विचार भी अपने हों।”
उनकी यह बात सुनकर मेरी आत्मा मुस्कुराई — यही तो पत्रकारिता का असली सार है।

प्रिय विद्यार्थियों,


मेरे लिए फूल चढ़ाना उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना मेरे विचारों को जीना है।पत्रकारिता केवल करियर नहीं, यह समाज और राष्ट्र की सेवा है।तुम्हारी कलम तुम्हारा सबसे बड़ा अस्त्र है। तकनीक गति दे सकती है, पर सत्य ही तुम्हें ऊँचाई देगा।

याद रखो — पत्रकारिता की असली शक्ति सत्ता से टकराकर भी सच बोलने में है।

समाचार बेचने के लिए मत लिखो, बल्कि समाज को जगाने के लिए लिखो।
जब तक तुम्हारी कलम शोषित और निर्बल के पक्ष में खड़ी रहेगी, पत्रकारिता जीवित रहेगी।

आज लाल पर्दा हट चुका है। मेरी प्रतिमा सामने है… पर मेरी सच्ची इच्छा है कि मेरे विचार तुम्हारे हृदय में उतरें। पत्रकारिता कलम की खेती है, और उसकी फसल है समाज का जागरण।मेरी मूर्ति पत्थर की है, लेकिन तुम्हारी कलम जीवित है। उसे जीवित रखना ही मेरे लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

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