अंबाला सेंट्रल जेल में कैदियों के लिए एमएमयू ने शुरू किया फूड प्रोसेसिंग व कुकिंग का विशेष प्रशिक्षण
मुलाना/अंबाला: महर्षि मार्कण्डेश्वर (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी), मुलाना द्वारा सामाजिक उत्तरदायित्व निभाते हुए एक अनूठी पहल की गई है। विश्वविद्यालय और सेंट्रल जेल, अंबाला के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत जेल के बंदियों के कौशल विकास और समाज की मुख्य धारा में उनके सफल पुनर्वास के लिए खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) एवं कुकिंग पर एक विशेष प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बंदियों को रोजगारपरक तकनीकी हुनर सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर करना है।
गेहूं के आटे का वैज्ञानिक महत्व और बेकरी उत्पाद
इस विशेष प्रशिक्षण सत्र के दौरान एमएमयू के खाद्य प्रौद्योगिकी (Food Technology) विभाग के प्रसिद्ध प्रोफेसर (डॉ.) शंकर सुवन सिंह ने मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत की। उन्होंने बंदियों को गेहूं के आटे के वैज्ञानिक उपयोग, उसके रासायनिक संगठन और प्रसंस्करण (Processing) के गुणों के बारे में विस्तार से समझाया।
डॉ. सिंह ने बताया कि गेहूं के आटे में मौजूद ग्लूटेन की मात्रा, जल अवशोषण क्षमता और डो (गूंथा हुआ आटा) बनाने के अनूठे गुणों के कारण ही इसका उपयोग ब्रेड, बिस्कुट, कुकीज़, पास्ता और नूडल्स जैसे बेकरी उत्पादों में किया जाता है। उन्होंने बेहद सरल और वैज्ञानिक भाषा में बंदियों को कठोर (Hard), मुलायम (Soft) और ड्यूरम (Durum) किस्म के गेहूं के आटे के बीच का अंतर और उनके अलग-अलग खाद्य उत्पादों में उपयोग की तकनीक सिखाई। उन्होंने प्रेरित करते हुए कहा कि खाद्य प्रसंस्करण का यह व्यावहारिक ज्ञान भविष्य में कैदियों को खुद का रोजगार (स्वरोजगार) शुरू करने में मील का पत्थर साबित होगा।
व्यावहारिक सत्र: बंदियों ने खुद बनाया 'व्हाइट सॉस पास्ता'
सैद्धांतिक जानकारी के बाद कार्यक्रम में एक व्यावहारिक (Practical) सत्र का भी आयोजन किया गया। संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ईशान बख्शी ने बंदियों के सामने लाइव कुकिंग करते हुए 'व्हाइट सॉस पास्ता' बनाने की पूरी रेसिपी और प्रक्रिया का प्रदर्शन किया। इसके बाद बंदियों ने स्वयं उत्साहपूर्वक पास्ता तैयार किया और उसका स्वाद भी चखा। इस व्यावहारिक प्रशिक्षण को लेकर प्रतिभागियों में एक अलग ही जोश और खुशी देखने को मिली।
इस दौरान प्रोफेसर (डॉ.) शंकर सुवन सिंह, जेल के वरिष्ठ कर्मचारी, डॉ. ईशान बख्शी और लैब अटेंडेंट बल्लू भी उपस्थित रहे।
प्रेरणादायक कविताओं और पुस्तकों से भरा सकारात्मकता का संचार
प्रशिक्षण के साथ-साथ बंदियों के मानसिक बदलाव और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने के लिए प्रोफेसर (डॉ.) शंकर सुवन सिंह ने अपनी लिखित लोकप्रिय पुस्तकों "आलेखों से संवाद" और "विंग्स ऑफ रिफ्लेक्शन" (Wings of Reflection) की प्रतियां बंदियों को निःशुल्क वितरित कीं। ये पुस्तकें अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध हैं।
इसके साथ ही डॉ. सिंह ने अपनी ओजस्वी और प्रेरणादायक कविताओं के माध्यम से बंदियों में नया उत्साह भरा। उनकी कविता की इन पंक्तियों ने वहां मौजूद सभी को भावुक और प्रेरित कर दिया:
"ज़िंदगी घिरी शैलाभों-चट्टानों से, ऐ ज़िंदगी फिर डरना क्या आँधियों और तूफ़ानों से।"
विश्वविद्यालय प्रबंधन और जेल प्रशासन ने की सराहना
विश्वविद्यालय के प्रो-चांसलर डॉ. विशाल गर्ग के कुशल मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम की सेंट्रल जेल, अंबाला के अधिकारियों ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की। जेल प्रशासन का कहना है कि इस प्रकार के कौशल विकास कार्यक्रम कैदियों को सम्मानजनक आजीविका के अवसर प्रदान करने और जेल से छूटने के बाद समाज में पुनः स्थापित करने के लिए बेहद जरूरी हैं।
इस सफल आयोजन पर होटल मैनेजमेंट के अधिष्ठाता (Dean) डॉ. प्रदीप खटकर ने कार्यक्रम को सफल बनाने वाले सभी शिक्षक और गैर-शिक्षक स्टाफ सदस्यों को बधाई दी। महर्षि मार्कण्डेश्वर विश्वविद्यालय की यह पहल शिक्षा, हुनर और सामाजिक सरोकार का एक बेजोड़ उदाहरण है।
