आधुनिक व्यवस्था, बौद्धिक शून्यता और नागरिक चेतना: क्या हम सवाल न करने वाले 'सक्षम गुलाम' तैयार कर रहे हैं?

Modern Systems, Intellectual Vacuity, and Civic Consciousness: Are We Creating 'Competent Slaves' Who Do Not Question?
 
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- विवेकानंद

समकालीन भारतीय समाज में कुछ ऐसे यक्ष प्रश्न हैं, जिन्हें आम नागरिकों को किसी राजनीतिक दल या सरकार से नहीं, बल्कि स्वयं अपने आप से और अपने विवेक से पूछना चाहिए। यदि हम इन अनुत्तरित सवालों के ईमानदार जवाब तलाश सके, तो शायद हम यह समझ पाएंगे कि हमारी आने वाली पीढ़ी और बच्चों के भविष्य के साथ वास्तव में क्या हो रहा है। क्या हम उन्हें एक ऐसा पढ़ा-लिखा, कुशल और डिग्रीधारी मजदूर बना रहे हैं जो कभी कोई सवाल नहीं पूछेगा, या फिर हम उनके भीतर रचनात्मकता, नवोन्मेष (Innovation) और स्वतंत्र चेतना के बीज बो रहे हैं? इन सवालों के मर्म में ही यह छिपा है कि हमारा देश भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

तकनीकी और आर्थिक महाशक्ति बनने का दावा, लेकिन वैश्विक विकल्प कहां?

आज भारत के पास टाटा, अंबानी और अडानी जैसे वैश्विक स्तर के विशाल कॉरपोरेट घराने हैं। हमारे पास सूचना प्रौद्योगिकी (IT Sector) में दुनिया भर में डंका बजाने वाली दिग्गज कंपनियां हैं। लेकिन, जब हम वैश्विक डिजिटल संप्रभुता (Digital Sovereignty) की बात करते हैं, तो हमारे पास 'गूगल' (Google) जैसा एक भी वैश्विक स्तर का सर्च इंजन क्यों नहीं है? हालांकि, घरेलू स्तर पर 'आई भारत', 'क्यू-मामू', और 'जस्टडायल' जैसी कोशिशें हुईं और अब 'कॉमेट' नाम के सर्च इंजन पर काम चल रहा है, लेकिन वैश्विक बाजार में इनका प्रभाव न के बराबर है।

यह एक स्थापित मनोवैज्ञानिक और तकनीकी तथ्य है कि दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल का संचालन आज एक भारतीय मूल के सीईओ (सुंदर पिचाई) के हाथों में है। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि हमारे देश की धरती से ऐसी वैश्विक तकनीकी चुनौतियां क्यों नहीं पैदा होतीं? हम कुशल प्रबंधक (Managers) तो तैयार कर पा रहे हैं, लेकिन मौलिक आविष्कारक (Creators) क्यों नहीं बन पा रहे?

राष्ट्रीय विमर्श की दिशा और जनरुचि का सूचक

किसी भी देश के नागरिक किस दिशा में सोच रहे हैं, इसका आकलन इस बात से होता है कि वहां के सार्वजनिक मंचों, मीडिया और चाय की दुकानों पर सबसे ज्यादा बहस किस विषय पर होती है। क्या हमारे यहां मुख्य विमर्श शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण और रोजगार के नए अवसरों पर होता है, या फिर हमारा अधिकांश समय और ऊर्जा केवल धार्मिक-सांस्कृतिक विवादों में खप जाती है?

मनोविज्ञान का यह बुनियादी नियम है कि हमारी रुचि जैसी होगी, हमारे विचार और राष्ट्रीय चेतना भी वैसी ही आकार लेगी। हमें आत्ममंथन करना होगा कि इन अंतहीन और आक्रामक बहसों से देश के युवाओं को क्या हासिल हो रहा है? क्या यह विमर्श उनके लिए प्रगति, अनुसंधान और तार्किक सोच का रास्ता खोल रहा है, या उन्हें एक संकीर्ण दायरे में समेट रहा है?

सरकारी स्कूलों का बंद होना और शिक्षा का बदलता ढांचा

'यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस' (UDISE+) की साल 2024-25 की रिपोर्ट देश की बुनियादी शिक्षा की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार:

  • पिछले 10 वर्षों के भीतर देश में 89,441 सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं, यानी सरकारी स्कूलों की संख्या में लगभग 8 प्रतिशत की गिरावट आई है।

  • इसके विपरीत, इसी अवधि में 42,944 नए प्राइवेट स्कूल खुल गए हैं। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि निजी स्कूलों की संख्या 2,88,164 से बढ़कर 3,31,108 हो गई है।

सरकारी स्कूलों के बंद होने पर व्यवस्था के पास हमेशा की तरह कई तार्किक और प्रशासनिक जवाब हो सकते हैं। लेकिन समाज के रूप में हमें सोचना होगा कि महंगे होते निजी स्कूलों की लोकप्रियता और मजबूरी क्यों बढ़ी? देश की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के खूबसूरत और लोक-कल्याणकारी उद्देश्यों पर देश के बड़े राजनेता, उद्योगपति, शीर्ष नौकरशाह (Bureaucrats) और नव-धनाढ्य वर्ग खुद क्यों भरोसा नहीं दिखाता? वे क्यों अपने बच्चों को उन अंतरराष्ट्रीय या विशिष्ट निजी स्कूलों में भेजते हैं, जो देश के आम नागरिकों के लिए बनाई गई शिक्षा व्यवस्था के दायरों से पूरी तरह मुक्त हैं?

'संतोष' और 'मौन' का सुनियोजित चक्र

क्या देश का एक बड़ा मध्यमवर्ग अनजाने में ही एक ऐसे सुनियोजित चक्र का हिस्सा बनता जा रहा है, जिस पर उसकी मूक सहमति है? सरकारी स्कूलों की बदहाली और अव्यवस्था से तंग आकर अभिभावक अपने बच्चों के लिए बजट फ्रेंडली निजी स्कूलों की तलाश करते हैं। लेकिन इन स्कूलों में और हमारे बदलते पाठ्यक्रमों में बच्चों को क्या सिखाया जा रहा है? विज्ञान, तर्क और इतिहास के अध्यायों में जो बदलाव किए जा रहे हैं, वे बच्चों के मानस को किस तरह प्रभावित करेंगे?

बाजार को आज ऐसे योग्य, अनुशासित और सस्ते श्रमबल (Labor) की आवश्यकता है जो बिना किसी शिकायत के 'बैल' की तरह काम कर सके, और राजनीति को केवल एक वफादार 'वोटर' चाहिए। तो क्या हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली और सामाजिक ताना-बाने की बुनियाद ही ऐसी तैयार की जा रही है, जिसमें:

  • अनुशासन के नाम पर 'मौन' सिखाया जाए?

  • अधिकारों की बात करने पर 'संतोष' का पाठ पढ़ाया जाए?

  • वर्तमान की कमियों को छिपाने के लिए इतिहास पर 'अंध-आत्ममुग्धता' का भाव भरा जाए?

और जो कोई भी इस निर्धारित दायरे या लीक से बाहर निकलकर तार्किक सवाल पूछने का दुस्साहस करे, उसे व्यवस्था विरोधी या अपराधी की तरह देखने की प्रवृत्ति बढ़ने लगे।

बॉम्बे हाई कोर्ट की गंभीर टिप्पणी: नागरिक बनाम गुलाम

हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट के माननीय न्यायाधीश जस्टिस माधव जामदार ने एक मामले की सुनवाई के दौरान बेहद तीखी और आंखें खोल देने वाली टिप्पणी की थी। उन्होंने न्यायपीठ से कहा कि आज केवल सरकार की नीतियों का शांतिपूर्ण विरोध करने के कारण नागरिकों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं, उन्हें तड़ीपार किया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि—"यह क्या हो रहा है? क्या सभी नागरिकों को गुलाम बनाया जा रहा है?"

न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया कि नागरिकों के प्रदर्शन करने या आंदोलन करने के लोकतांत्रिक अधिकार को इस तरह कुचलना उनके मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) का सीधा उल्लंघन है। आज देश में इतने पेपर लीक हो रहे हैं, युवाओं का भविष्य अधर में है, लेकिन जब पीड़ित छात्र या नागरिक इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो उन पर आपराधिक मुकदमे लाद दिए जाते हैं। हाई कोर्ट ने पुलिस प्रशासन को याद दिलाया कि "पुलिस किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की निजी नौकर नहीं है, बल्कि वह जनता की सेवक है।"

 चेतना के जागृत होने की प्रतीक्षा

हैरानी की बात यह है कि सोशल मीडिया पर छोटी-छोटी और गैर-जरूरी बातों पर राष्ट्रव्यापी विमर्श खड़ा कर देने वाले समाज ने हाई कोर्ट की इतनी बड़ी और गंभीर संवैधानिक टिप्पणी पर कोई बड़ी बहस नहीं की। तो क्या यह मान लिया जाए कि हमें यह बदलती हुई डरावनी हकीकत दिखाई नहीं दे रही है? या फिर हम 'अनुशासन' और 'संस्कार' के नाम पर पूरी तरह मौन हो चुके हैं?

यदि हमारे भीतर अपने ही बच्चों के अधिकारों और उनके हक की लड़ाई में खड़े होने के बजाय, सवाल उठाने वालों को ही दोषी ठहराने की 'आत्ममुग्धता' आ गई है, तो यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। इतिहास गवाह है कि जब कोई समाज सवाल पूछने की अपनी मौलिक क्षमता को खो देता है, तो वह अनजाने में गुलामी के सबसे ऊंचे सोपान पर कदम रख चुका होता है। अब हमें तय करना है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक स्वतंत्र, तार्किक और जागरूक नागरिक बनाना चाहते हैं या सिर्फ 'सर्वगुण संपन्न गुलाम'।

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