आधुनिक शादियां : भव्यता की चकाचौंध में खोती आत्मीयता

Modern weddings: Intimacy lost in the glare of grandeur
 
Modern weddings: Intimacy lost in the glare of grandeur

(डॉ. पंकज भारद्वाज — विनायक फीचर्स)

भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और संस्कृतियों का संगम माना गया है। यह एक ऐसा सामाजिक संस्कार है, जिसमें प्रेम, अपनापन, परंपरा और सामूहिकता की भावना प्रमुख होती है। किंतु बदलते समय के साथ विवाह समारोहों की प्रकृति में व्यापक परिवर्तन आया है। आज शादियां सामाजिक उत्सव कम और प्रदर्शन का मंच अधिक बनती जा रही हैं।

एक समय था जब विवाह समारोह सादगी और आत्मीयता से परिपूर्ण होते थे। सीमित संख्या में मेहमान बुलाए जाते—कुछ पड़ोसी, निकट संबंधी और व्यवहारिक रिश्तों से जुड़े लोग। गांवों और कस्बों में विवाह का अर्थ था सामूहिक सहयोग। रिश्तेदार कई दिन पहले पहुंच जाते, घर के आंगन में चहल-पहल रहती, महिलाएं मंगलगीत गातीं और पुरुष व्यवस्थाओं में हाथ बंटाते। भोजन पत्तलों पर परोसा जाता, लोग पंगत में बैठकर खाते और हर निवाले के साथ आत्मीयता का स्वाद भी मिलता।

आज परिदृश्य बदल चुका है। हजारों निमंत्रण पत्र भेजे जाते हैं। भव्य बैंक्वेट हॉल, आलीशान रिसॉर्ट, महंगी फूलों की सजावट, आकर्षक लाइटिंग और डीजे की धुनों के बीच विवाह समारोह एक चमकदार आयोजन बन गया है। कैटरिंग कंपनियां दर्जनों व्यंजन परोसती हैं, जिनमें कई ऐसे पकवान होते हैं जिन्हें लोग पहचान तक नहीं पाते। लेकिन इस पूरे वैभव के बीच जो सबसे अधिक कमी खलती है, वह है आत्मीय सत्कार का भाव।

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अक्सर देखा जाता है कि मेजबान मंच पर औपचारिकताओं में व्यस्त रहते हैं और मेहमान भी केवल शिष्टाचार निभाकर लौट जाते हैं। न बैठकर हालचाल पूछने का समय है और न आत्मीय संवाद का अवसर। रिश्तेदारों का कई दिनों तक ठहरना अब लगभग समाप्त हो गया है। शादी एक-दो दिन का कार्यक्रम बनकर रह गई है, जिसमें अपनत्व की जगह दिखावा अधिक दिखाई देता है।

इस बढ़ती फिजूलखर्ची का सामाजिक प्रभाव भी चिंताजनक है। मध्यमवर्गीय और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार भी सामाजिक दबाव में आकर भव्य आयोजन करने को विवश हो जाते हैं। कर्ज लेकर शादियां करना, केवल प्रतिष्ठा बचाने के लिए अनावश्यक खर्च करना—यह प्रवृत्ति एक अनुचित प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। इससे आर्थिक असंतुलन बढ़ता है और विवाह जैसा पवित्र संस्कार बाहरी आडंबर तक सीमित हो जाता है।

विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या विवाह की सफलता उसकी सजावट, व्यंजनों की संख्या या मेहमानों की भीड़ से तय होती है? या फिर वह आत्मीयता, पारिवारिक सहयोग और सादगी से मापी जानी चाहिए? यदि हम अपने संस्कारों की मूल भावना को समझें, तो पाएंगे कि विवाह का सौंदर्य उसकी सरलता और आत्मीयता में ही निहित है।

समय की मांग है कि समाज इस दिशा में आत्ममंथन करे। दिखावे की इस दौड़ से बाहर निकलकर सादगीपूर्ण, गरिमामय और आत्मीय विवाह की परंपरा को पुनर्जीवित किया जाए। सीमित मेहमान, आत्मीय सत्कार, पारंपरिक रीति-रिवाज और सामूहिक सहयोग—यही वे तत्व हैं जो विवाह को वास्तव में यादगार बनाते हैं।विवाह उत्सव है, प्रतिस्पर्धा नहीं; संस्कार है, प्रदर्शन नहीं। यदि हम इस मूल भाव को पुनः स्थापित कर सकें, तो न केवल अनावश्यक फिजूलखर्ची रुकेगी, बल्कि समाज में आत्मीयता और संतुलन भी सुदृढ़ होगा।

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