मोदी की गारंटी, मोहन सरकार की तैयारी

Modi's guarantee, Mohan government's preparation
 
Modi's guarantee, Mohan government's preparation
(पवन वर्मा – विभूति फीचर्स)
केंद्र सरकार द्वारा लाया गया ‘विकसित भारत ग्राम रोजगार गारंटी अधिनियम, 2025’, जिसे आम भाषा में ‘जी राम जी’ कहा जा रहा है, अब मध्यप्रदेश में केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं रह गया है। यह कानून प्रदेश में शासन की मंशा, संगठन की सक्रियता और प्रशासनिक प्रतिबद्धता की वास्तविक परीक्षा बनता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर लाए गए इस अधिनियम को ज़मीन पर उतारने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ रही है।

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संदेश स्पष्ट है— 125 दिन की मजदूरी गारंटी केवल कागज़ी घोषणा बनकर नहीं रहेगी। मुख्यमंत्री इसे एक अधिकार के रूप में लागू कराने के लिए सरकार और संगठन, दोनों स्तरों पर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि यह कानून मध्यप्रदेश में अब सिर्फ एक रोजगार योजना नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकता बनता जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि जब गांव मजबूत होंगे, तभी देश आगे बढ़ेगा। उसी सोच से जन्मा यह अधिनियम अब राज्यों के माध्यम से साकार होना है। मध्यप्रदेश सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए संकेत दे दिए हैं कि कानून का पालन गांव-गांव तक सुनिश्चित किया जाएगा।
सरकारी स्तर पर विभागीय निर्देश जारी हो चुके हैं, अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा रही है और समयबद्ध कार्ययोजना पर काम शुरू हो चुका है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार इस अधिनियम को बोझ नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में देख रही है— ऐसा अवसर, जिससे ग्रामीण मजदूरों को अस्थायी राहत के बजाय स्थायित्व मिल सके।
इस अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन में केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि सरकार के मंत्री और भारतीय जनता पार्टी का संगठन भी पूरी ताकत से जुटने की तैयारी में है। मंत्रियों को अपने-अपने प्रभार वाले जिलों में निगरानी और संवाद की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। संगठन स्तर पर मंडल से लेकर जिला इकाइयों तक कार्यकर्ताओं को योजना की जानकारी देने और लाभार्थियों तक पहुंच सुनिश्चित करने का दायित्व दिया जाएगा।
यह केवल सरकारी योजना का प्रचार नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने का प्रयास है कि कहीं भी कानून के पालन में ढिलाई न हो। सरकार और संगठन का यह साझा प्रयास बताता है कि मोहन यादव का नेतृत्व इस अधिनियम को केवल प्रशासनिक औपचारिकता तक सीमित नहीं रखना चाहता।
मध्यप्रदेश में ग्रामीण रोजगार को लेकर पहले भी कई योजनाएं आईं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती हमेशा क्रियान्वयन की रही। भुगतान में देरी, काम की अनुपलब्धता और शिकायतों की अनदेखी ने योजनाओं की साख को नुकसान पहुंचाया। ‘जी राम जी’ के माध्यम से सरकार यह संदेश देना चाहती है कि अब ऐसी लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी।
अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान है कि समय पर काम न मिलने की स्थिति में बेरोजगारी भत्ता देना होगा। इसका सीधा अर्थ है कि प्रशासनिक ढिलाई का असर सरकार की साख पर पड़ेगा। मोहन यादव सरकार इसी दबाव को अपनी ताकत में बदलने का प्रयास कर रही है।
इस कानून का प्रभाव केवल मजदूरी तक सीमित नहीं है। जब गांव में यह भरोसा बनता है कि काम अधिकार है और सरकार उसके साथ खड़ी है, तो सामाजिक वातावरण बदलता है। पलायन पर अंकुश लगता है, खेती और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है और ग्रामीण जीवन में स्थायित्व आता है।
सरकार की सक्रियता यह संकेत देती है कि वह इस भरोसे को प्रशासनिक जिम्मेदारी के रूप में देख रही है। इसी कारण संगठन और सरकार, दोनों स्तरों पर संवाद और निगरानी को प्राथमिकता दी जा रही है।
मध्यप्रदेश सरकार यह भी समझती है कि इतनी बड़ी योजना में पारदर्शिता ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। काम की निगरानी, भुगतान की स्पष्ट व्यवस्था और शिकायतों के त्वरित समाधान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इससे सरकार के सामने एक साफ तस्वीर होगी— कहां काम हुआ, किसे लाभ मिला और कहां कमी रह गई। यह पारदर्शिता सरकार के लिए राहत भी है और चुनौती भी, क्योंकि अब हर चूक सामने होगी और उसका जवाब देना पड़ेगा।

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