चल संन्यासी अखाड़े में: अभिनय पड़ा भारी, अब जवाब की बारी
कहावत है—जिसका काम उसी को शोभा देता है। जिस व्यक्ति के पास किसी कला या विषय का ज्ञान न हो और वह उसी क्षेत्र में विशेषज्ञ बनने का प्रयास करे, तो परिणाम अक्सर हास्यास्पद ही होता है। अभिनय भी ऐसी ही कला है, जिसमें केवल वेशभूषा बदल लेना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि संवेदनशीलता, समझ और जिम्मेदारी भी आवश्यक होती है।
हमारे एक महाशय का स्वभाव कुछ ऐसा ही है। बिना बुलाए हर मंच पर पहुंच जाना, हर विषय पर टिप्पणी करना और स्वयं को हर मामले का जानकार समझना उनकी पुरानी आदत है। आत्ममंथन से उनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं, लेकिन दूसरों पर उंगली उठाने का कोई अवसर वे नहीं छोड़ते।
एक दिन उन्हें पता चला कि एक सांस्कृतिक प्रस्तुति होने वाली है। बस फिर क्या था, उन्होंने भी उसमें अपनी भूमिका तय कर ली। साधु का वेश धारण किया, गले और हाथों में मालाएं पहन लीं, माथे पर लंबा तिलक लगाया और सामने दान-पात्र रखकर बैठ गए। उनके साथ कुछ ऐसे लोग भी शामिल हो गए, जिन्हें चर्चा में बने रहने के लिए किसी भी तरह का प्रदर्शन करने में संकोच नहीं होता।
समस्या तब पैदा हुई, जब मनोरंजन के नाम पर प्रस्तुति का केंद्र साधु-संतों का उपहास बन गया। व्यंग्य की आड़ में संन्यास परंपरा को कटाक्ष का विषय बनाया गया। यह भी ध्यान देने योग्य रहा कि निशाना केवल उन्हीं पर साधा गया, जिनके विरोध की आशंका अपेक्षाकृत कम समझी गई। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दिया गया, लेकिन यह भूल गए कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
स्वाभाविक रूप से इस प्रस्तुति पर साधु-संतों में नाराजगी पैदा हुई। उन्होंने इसे अपनी परंपरा और सम्मान पर आघात माना और विरोध दर्ज कराया। विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि किसी भी परंपरा या धार्मिक पहचान का उपहास समाज में अनावश्यक तनाव पैदा कर सकता है।
कहते हैं कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। मंच पर जो सहज प्रतीत हो रहा था, उसके सामाजिक परिणाम सामने आने लगे। जो लोग उस प्रस्तुति में साथ खड़े थे, वे भी धीरे-धीरे दूरी बनाने लगे। अब मुख्य पात्र स्वयं असमंजस में हैं कि जिस अभिनय को उन्होंने हल्के में लिया था, उसकी कीमत इतनी भारी पड़ सकती है।
व्यंग्य का उद्देश्य किसी व्यक्ति, समाज या आस्था का अपमान नहीं, बल्कि सोचने के लिए प्रेरित करना होना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन उसका उपयोग विवेक, संवेदनशीलता और परस्पर सम्मान के साथ ही समाज के हित में माना जाता है।
