MP Politics: पीतांबरा माई के धाम दतिया में CM मोहन यादव की बड़ी परीक्षा! जानिए क्यों साख का सवाल बना यह उपचुनाव
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नरोत्तम मिश्रा की सीट पर बदली सियासी तस्वीर
दतिया विधानसभा सीट लंबे समय तक पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का मजबूत राजनीतिक गढ़ रही है। संगठन और प्रशासन दोनों स्तरों पर उनकी मजबूत पकड़ रही है। हालांकि 2023 के विधानसभा चुनाव में उनकी हार ने प्रदेश की राजनीति का समीकरण बदल दिया। उसी चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए कई वरिष्ठ नेताओं के नाम चर्चा में थे, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने डॉ. मोहन यादव को प्रदेश की कमान सौंप दी।
मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव ने संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की। वरिष्ठ नेताओं को सरकार और संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर भाजपा ने सामंजस्य का संदेश दिया। अब दतिया उपचुनाव उसी नेतृत्व की अग्निपरीक्षा बन गया है।
नए उम्मीदवार पर भाजपा का दांव
इस उपचुनाव में भाजपा ने पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट देने के बजाय आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया है। इसके साथ ही चुनाव की पूरी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री और संगठन के नेतृत्व पर आ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिणाम को मुख्यमंत्री के नेतृत्व और संगठनात्मक रणनीति की सफलता के रूप में देखा जाएगा।
संगठन ने झोंकी पूरी ताकत
भाजपा ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का विषय मानते हुए व्यापक चुनाव अभियान चलाया। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल समेत संगठन के कई वरिष्ठ नेता लगातार दतिया में सक्रिय रहे। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी कई जनसभाएं, रोड शो और विभिन्न समाजों के प्रतिनिधियों से संवाद कर चुनाव प्रचार को गति दी।
उपचुनावों का रिकॉर्ड भी बढ़ा रहा अहमियत
मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा ने पहला उपचुनाव अमरवाड़ा में जीता था, जहां कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए कमलेश शाह ने जीत दर्ज की। इसे मुख्यमंत्री की पहली बड़ी राजनीतिक सफलता माना गया।
हालांकि इसके बाद बुधनी और विजयपुर उपचुनावों ने अलग तस्वीर पेश की। बुधनी में भाजपा जीत तो दर्ज कर सकी, लेकिन जीत का अंतर पहले की तुलना में काफी कम रहा। वहीं विजयपुर में भाजपा उम्मीदवार और तत्कालीन मंत्री रामनिवास रावत को हार का सामना करना पड़ा। इन परिणामों ने यह संकेत दिया कि उपचुनावों में सत्ता पक्ष के लिए जीत हमेशा आसान नहीं होती।
कांग्रेस ने भी झोंकी पूरी ताकत
दूसरी ओर कांग्रेस ने भी इस चुनाव को सरकार के खिलाफ जनमत के रूप में पेश करने की कोशिश की। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने लगातार चुनाव प्रचार किया। कांग्रेस स्थानीय मुद्दों और जनसंपर्क के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने में जुटी रही।
71 प्रतिशत मतदान, बढ़ी उत्सुकता
दतिया उपचुनाव में लगभग 71 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। राजनीतिक जानकारों के अनुसार यह आंकड़ा संतोषजनक जरूर है, लेकिन करीब 29 प्रतिशत मतदाताओं का मतदान से दूर रहना चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है। स्थानीय समीकरण, उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि, जातीय संतुलन और संगठन की सक्रियता इस चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे।
संगठन बनाम व्यक्तित्व की भी परीक्षा
इस चुनाव के जरिए भाजपा ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि पार्टी में संगठन व्यक्ति से बड़ा है। वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा की जगह नए चेहरे को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने बदलाव का संकेत दिया है। यदि आशुतोष तिवारी जीत दर्ज करते हैं तो इसे संगठन के फैसले पर जनता की मुहर माना जाएगा। वहीं हार की स्थिति में उम्मीदवार चयन पर सवाल उठ सकते हैं।
आस्था और राजनीति का अनोखा संगम
दतिया की राजनीति की एक विशेषता यह भी है कि चुनावी माहौल के बीच लगभग सभी प्रमुख नेता मां पीतांबरा के दरबार में मत्था टेकते नजर आए। यहां धार्मिक आस्था और राजनीतिक गतिविधियां हमेशा साथ-साथ चलती रही हैं और इस उपचुनाव में भी वही तस्वीर देखने को मिली।
परिणाम पर टिकी प्रदेश की नजर
दतिया विधानसभा उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व, भाजपा संगठन की चुनावी रणनीति और कांग्रेस की राजनीतिक चुनौती की भी बड़ी परीक्षा बन चुका है। 3 अगस्त को आने वाला परिणाम न केवल दतिया बल्कि मध्य प्रदेश की आगामी राजनीति की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
