MP Politics: मध्य प्रदेश में फिर गूंजा 'तबादला उद्योग' का शोर, डॉ. मोहन यादव सरकार पर कांग्रेस हमलावर; जानें क्या है पूरा विवाद
16 दिनों में 17 हजार से ज्यादा तबादले!
प्रशासनिक नियमों के तहत मध्य प्रदेश में 1 जून से 15 जून तक के लिए तबादलों पर से प्रतिबंध हटाया गया था, जिसे बाद में सरकार ने एक दिन और बढ़ाकर 16 जून की आधी रात तक कर दिया था।
-
असामान्य गति: इन 16 दिनों के भीतर विभिन्न विभागों में अनुमानित रूप से 17 हजार से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादले किए गए।
-
नेताओं का जमावड़ा: प्रतिबंध हटते ही भोपाल स्थित मंत्रालय और मंत्रियों के आवासों पर विधायकों, सांसदों और संगठन के पदाधिकारियों की भारी भीड़ देखी गई, जिसने इस पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया को राजनीतिक रंग दे दिया।
जीतू पटवारी का गंभीर आरोप: 200 करोड़ के लेन-देन का दावा
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (PCC Chief) जीतू पटवारी ने सरकार को घेरते हुए सीधे तौर पर इसे 'तबादला उद्योग' करार दिया है। पटवारी ने आरोप लगाया है कि इन लगभग 20 हजार तबादलों के पीछे 200 करोड़ रुपये का बड़ा लेन-देन हुआ है। हालांकि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है और यह कितना राजनीतिक है, यह जांच का विषय है; लेकिन इस बड़े फेरबदल ने राज्य की राजनीति में भ्रष्टाचार और सिफारिशी संस्कृति की बहस को दोबारा जिंदा कर दिया है।
सत्ता पक्ष के भीतर ही असंतोष की सुगबुगाहट
हजारों की संख्या में हुए इन तबादलों के पीछे भाजपा के स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों की अत्यधिक सक्रियता देखी गई। हर जनप्रतिनिधि चाहता है कि उसके क्षेत्र में पसंदीदा अधिकारी तैनात रहें ताकि जमीनी स्तर पर उनका तालमेल और राजनीतिक प्रभाव बना रहे। लेकिन कड़े राजनीतिक दबाव और अनगिनत सिफारिशों के बीच कई नेताओं की बातें नहीं मानी जा सकीं। नतीजा यह है कि तबादलों का दौर खत्म होते ही खुद सत्ता पक्ष (भाजपा) के भीतर कई विधायकों और प्रभावशाली नेताओं में अपनी उपेक्षा को लेकर भारी असंतोष और नाराजगी की खबरें सामने आ रही हैं।
बदलते दौर के साथ पलट गए राजनीतिक तर्क
मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब किसी सरकार पर ऐसे आरोप लगे हों। इससे पहले अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की कांग्रेस सरकारों के समय भी भाजपा इसी तरह के आरोप लगाती आई थी।
दिलचस्प विरोधाभास: अतीत में विपक्ष में रहते हुए भाजपा जिस व्यवस्था को 'कमाई और राजनीतिक प्रबंधन का जरिया' बताती थी, आज सत्ता में होने पर वही प्रक्रिया उसे 'प्रशासनिक आवश्यकता' लग रही है। वहीं दूसरी तरफ, कांग्रेस आज ठीक उन्हीं तर्कों के साथ भाजपा को कटघरे में खड़ा कर रही है।
आगामी विधानसभा सत्र में मचेगा घमासान
फिलहाल 16 जून की समयसीमा समाप्त होने के बाद तबादलों पर दोबारा प्रतिबंध लग चुका है, जिससे मंत्रालयों और मंत्रियों के बंगलों पर भीड़ कम हो गई है। लेकिन इस मुद्दे पर शुरू हुई राजनीतिक जंग थमती नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस इस मामले को ठंडे बस्ते में डालने के मूड में नहीं है और आगामी 20 से 24 जुलाई 2026 तक होने वाले मध्य प्रदेश विधानसभा के मॉनसून सत्र में इस 'तबादला उद्योग' के मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की रणनीति बना रही है।

