श्रीमान जी प्रधान तो श्रीमती जी पहलवान
- सुधाकर आशावादी
कहावत है कि नशा शराब में नहीं, बल्कि पीने वाले में होता है। लेकिन सत्ता और कुर्सी का नशा कुछ अलग ही होता है। इसका असर केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, जो पद पर बैठा है, बल्कि उसके परिवार और रिश्तेदारों तक भी पहुंच जाता है। पद किसी एक के पास होता है, लेकिन उसका प्रभाव पूरे परिवार में दिखाई देने लगता है।
हमारे समाज में यह कोई नई बात नहीं है। यदि कोई कलेक्टर है तो उसकी पत्नी को लोग सहज ही "कलेक्टरनी" कहने लगते हैं। स्कूल शिक्षक की पत्नी "मास्टरनी" और दरोगा की पत्नी "दरोगन" के नाम से पहचानी जाती है। पद चाहे किसी एक का हो, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रभाव परिवार तक स्वतः पहुंच जाता है।
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पंचायती राज व्यवस्था और स्थानीय निकायों में आरक्षण लागू होने के बाद तो मानो कई नए "पद" भी जन्म ले चुके हैं। प्रधान पति, प्रधान पुत्र, प्रधान प्रतिनिधि, सांसद पति, मंत्री पुत्र, सभासद प्रतिनिधि जैसे संबोधन अब आम हो गए हैं। चुनाव कोई और जीतता है, लेकिन फैसले लेने और प्रभाव दिखाने की भूमिका अक्सर परिवार का कोई दूसरा सदस्य निभाता दिखाई देता है।
स्थिति कई बार इतनी दिलचस्प हो जाती है कि निर्वाचित प्रतिनिधि गांव या क्षेत्र में कम और उनके परिजन ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं। कहीं प्रधान के बेटे पूरे गांव के फैसले लेते हैं तो कहीं पति सरकारी बैठकों में खुद को निर्वाचित प्रतिनिधि समझकर निर्देश देते दिखाई देते हैं। जनता जिसने वोट दिया, वह कई बार अपने असली प्रतिनिधि का चेहरा तक नहीं देख पाती।
ऐसे ही एक गांव का किस्सा है, जहां ग्राम प्रधान बनीं महिला गांव में रहती तक नहीं थीं। चुनाव उनके बेटे ने लड़ा, प्रचार उसी ने किया और जीत के बाद पंचायत का पूरा संचालन भी वही करने लगा। धीरे-धीरे सरकारी जमीनों पर कब्जे, चुनावी खर्च की भरपाई और स्थानीय विवादों में मध्यस्थ बनकर लाभ कमाने जैसे आरोप भी सामने आने लगे। यानी कुर्सी मां के नाम पर और उसका उपयोग बेटे के हाथों में।
यह स्थिति केवल पंचायतों तक सीमित नहीं है। नगर निकायों से लेकर बड़े राजनीतिक पदों तक अक्सर यही तस्वीर देखने को मिलती है। अधिकार किसी एक के पास होता है, लेकिन प्रभाव और निर्णयों की छाया पूरे परिवार पर दिखाई देती है।
हाल के वर्षों में ऐसे भी उदाहरण सामने आए हैं, जब किसी बड़े जनप्रतिनिधि के परिजन सरकारी संस्थानों का दौरा करते या अधिकारियों को निर्देश देते नजर आए। इससे यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि निर्वाचित या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के परिजन भी अधिकारों का प्रयोग करने लगें, तो फिर प्रशासनिक और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की सीमा आखिर तय कौन करेगा?
व्यंग्य यही है कि लोकतंत्र में जनता किसी एक व्यक्ति को चुनती है, लेकिन कई बार सत्ता का वास्तविक आनंद पूरा परिवार उठाता दिखाई देता है। कुर्सी पर बैठा व्यक्ति एक होता है, पर उसकी हनक अनेक लोगों में बंट जाती है। शायद यही हमारे लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प और सबसे विडंबनापूर्ण तस्वीर है।
