बांग्लादेश की राजनीति में उबाल: यूनुस सरकार के खिलाफ उभरता विद्रोह और कट्टरपंथ की बढ़ती लहर
आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसे मुद्दे की जो न सिर्फ बांग्लादेश की राजनीति को हिला रहा है, बल्कि पूरे South Asia में तनाव पैदा कर रहा है। imagine कीजिए, एक देश जहां छात्रों की क्रांति ने एक तानाशाही सरकार को उखाड़ फेंका, लेकिन अब वही क्रांतिकारी सड़कों पर उतर आए हैं – इस बार नई अंतरिम सरकार के खिलाफ। और क्यों? क्योंकि एक फैसला, जो मुसलमानों को 'इस्लाम के खिलाफ' लग रहा है, उसने पूरे देश में बवाल मचा दिया है। हां, हम बात कर रहे हैं बांग्लादेश के नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस की सरकार के उस controversial फैसले की – gender reform आयोग की सिफारिशें, जो कट्टर इस्लामी समूहों को 'इस्लाम विरोधी' लग रही हैं। हिफाजत-ए-इस्लाम जैसे रैडिकल ग्रुप्स ने चेतावनी जारी कर दी है – 'शेख हसीना जैसा हश्र होगा!'। क्या ये विद्रोह बांग्लादेश को इस्लामी कट्टरवाद की ओर धकेल देगा? या ये लोकतंत्र की नई जंग है ?
हसीना से यूनुस तक का सफर दोस्तों, सब कुछ शुरू होता है जुलाई 2024 से। बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में 30% कोटा सिस्टम को लेकर छात्रों ने विरोध शुरू किया। ये कोटा फ्रीडम फाइटर्स के बच्चों के लिए था, लेकिन छात्रों को लगा ये discriminatory है। प्रोटेस्ट बढ़े, सरकार ने दमन किया – गोलीबारी, गिरफ्तारियां। अनुमान है कि 1,400 से ज्यादा लोग मारे गए। आखिरकार, 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को भागना पड़ा। भारत में शरण ली। अब सवाल था – अगला लीडर कौन ? छात्र लीडर्स, जैसे नाहिद इस्लाम और आसिफ महमूद, ने नोबेल पीस प्राइज विजेता मोहम्मद यूनुस को चुना। यूनुस, जो माइक्रोफाइनेंस के जनक हैं, हसीना के समय परेशान किए गए थे। 8 अगस्त 2024 को वो अंतरिम सरकार के चीफ एडवाइजर बने। 17 सदस्यीय कैबिनेट में छात्र लीडर्स भी शामिल हुए। यूनुस ने वादा किया – सुधार, चुनाव, लोकतंत्र। लेकिन क्या हुआ? आज, सितंबर 2025 में, यूनुस सरकार पर ही विद्रोह हो रहा है। क्यों? चलिए समझते हैं।
अच्छे इरादे या गलत कदम ? यूनुस सरकार ने कई बड़े कदम उठाए। सबसे पहले, हसीना के समय बैन जमात-ए-इस्लामी पर हटा दिया। ये इस्लामी पार्टी 2013 से चुनाव लड़ ही नहीं सकती थी, क्योंकि कोर्ट ने कहा था ये सेकुलर संविधान के खिलाफ है। यूनुस ने इसे रिवर्स किया, ताकि राजनीतिक समावेश हो। लेकिन ये फैसला minorities– खासकर हिंदुओं – के लिए खतरा बन गया। हमले बढ़े, मंदिर तोड़े गए। फिर, मई 2025 में अवामी लीग पर बैन लगाया, क्योंकि हसीना सरकार पर प्रोटेस्टर्स पर अत्याचार के आरोप। लेकिन असली बवाल मचा अप्रैल-मई 2025 में, जब महिला मामलों के सुधार आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसमें gender equality के लिए सिफारिशें थीं – जैसे महिलाओं के अधिकार, तलाक के नियमों में बदलाव, और फैमिली लॉ में सुधार। लेकिन कट्टर ग्रुप्स ने इसे 'इस्लाम विरोधी' करार दिया। क्यों? क्योंकि ये शरिया के कुछ पारंपरिक नियमों को चुनौती दे रही थीं।
हिफाजत-ए-इस्लाम, जो 2010 में बना एक रैडिकल ग्रुप है, ने प्रोटेस्ट शुरू कर दिए। ये ग्रुप पहले भी ब्लास्फेमी लॉ की मांग कर चुका है, और 2013 में एक ब्लॉगर की हत्या से जुड़ा था। उनके नेता खालिद हुसैन यूनुस कैबिनेट में ही हैं! हिफाजत ने चेतावनी दी – अगर ये सिफारिशें लागू हुईं, तो यूनुस का अंत हसीना जैसा होगा। खिलाफत मजलिस ने तो आयोग ही बंद करने की मांग कर दी। ये फैसले मुसलमानों को क्यों लग रहे हैं इस्लाम के खिलाफ? बांग्लादेश में 90% आबादी मुस्लिम है। कट्टर ग्रुप्स का दावा है कि ये सुधार 'पश्चिमी एजेंडा' हैं, जो इस्लामी मूल्यों को कमजोर करेंगे। सोशल मीडिया पर #IslamAgainstYunus ट्रेंड कर रहा है। एक्स (ट्विटर) पर पोस्ट्स दिखाते हैं कि हिजब उत तहरीर जैसे बैन ग्रुप्स अब खुलकर रैलियां कर रहे हैं। यूनुस सरकार ने 174 मिलिटेंट्स को रिहा किया, होली आर्टिसन अटैकर्स की सजा कम की। ये सब 'कम्प्रोमाइज' लग रहा है, लेकिन मुसलमानों को लगता है ये उनकी आस्था पर हमला है।
अब आते हैं विद्रोह पर। दिसंबर 2024 में ही छात्रों ने जुलाई विद्रोह की घोषणा पर असहमति जताई। नाहिद इस्लाम, जो यूनुस कैबिनेट में थे, ने इस्तीफा दे दिया। क्यों? क्योंकि उन्हें लगा यूनुस 'फॉरेन एजेंट्स का रबर स्टैंप' बन गए। फरवरी 2025 में नाहिद को ही पीट दिया गया – पब्लिक, पुलिस, आर्मी ने। मई 2025 में प्रोटेस्ट्स बढ़े। प्राइमरी टीचर्स, पब्लिक सेक्टर वर्कर्स सड़कों पर। आर्मी चीफ ने दिसंबर में चुनाव की मांग की। लेकिन जून 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने जमात को वैध ठहराया। जुलाई में यूनुस ने संविधान बदलने की बात की, लेकिन कट्टर ग्रुप्स ने इसे 'इस्लामी राज्य' के खिलाफ बताया। सितंबर 2025 तक, प्रोटेस्ट्स हिंसक हो गए। हिंदुओं पर 1,254 अटैक्स, लेकिन मुसलमानों पर भी – अहमदिया संप्रदाय पर। यूनुस ने कहा – ये पॉलिटिकल एजेंडा है, लेकिन कट्टर ग्रुप्स का कहना है ये 'इस्लाम की रक्षा' है। 5 अगस्त 2025 को रेवोल्यूशन की एनिवर्सरी पर यूनुस ने फरवरी 2026 में चुनाव का ऐलान किया, लेकिन रमजान से पहले। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी – हिफाजत ने 'Butchering of Hindus' जैसे नारे लगाए।
ये सिर्फ बांग्लादेश की कहानी नहीं। भारत के लिए खतरा – हिंदू माइनॉरिटी पर अटैक्स, नॉर्थईस्ट में तनाव। पाकिस्तान ISI का हाथ माना जा रहा है – यूनुस को सपोर्ट। अमेरिका का डीप स्टेट भी। चीन-इंडिया बैलेंस बिगड़ सकता है। यूनुस ने कहा – हम सुधार करेंगे, लेकिन कट्टरता रोकेंगे। लेकिन क्या? हिजब उत तहरीर खुलकर खिलाफत मांग रहा है। चुनाव जून 2026 तक, लेकिन तब तक सिविल वॉर का खतरा। ये फैसला – लैंगिक सुधार – अच्छा था, लेकिन टाइमिंग गलत। कट्टर ग्रुप्स ने इसे हथियार बना लिया। यूनुस की सरकार सुधारों की उम्मीद थी, लेकिन अब विद्रोह का शिकार। क्या ये जुलाई रेवोल्यूशन का अंत है? या नई शुरुआत? कमेंट्स में बताएं।
