राष्ट्र सर्वोपरि या धार्मिक और जातीय पहचान
डॉ. सुधाकर आशावादी (विनायक फीचर्स) ऐसा प्रतीत होता है कि भारत पर षड्यंत्रकारी शक्तियों की कुदृष्टि पड़ गई है। सबका साथ, सबका विकास का नारा देने वाले दिशानायक जब विघटनकारी नीतियों को लागू कर आम नागरिक को जातियों में विभाजित करने का कार्य करने लगते हैं, तब स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो जाती है। जिन पर सत्य सनातन की रक्षा का दायित्व है, वे अपने पद के अहंकार में स्वयं को सामान्य जन का प्रतिनिधि मानने को तैयार नहीं दिखते। वे व्यवस्था और व्यवस्थापकों के विरुद्ध सियासी तत्वों की भाँति अनर्गल प्रलाप करते प्रतीत होते हैं।
विडंबना यह है कि उनके समर्थन में वे राजनीतिक दल भी खड़े दिखाई देते हैं, जिन्होंने न तो कभी सनातन परंपराओं को मान्यता दी और न ही अतीत में उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया। कहीं किसी दल का पदाधिकारी किसी विशेष जाति के नेताओं के साथ बैठने पर आपत्ति जताता है, तो कहीं विभेदकारी प्रावधानों पर वे लोग मौन साध लेते हैं, जिनसे निष्पक्ष और संतुलित चिंतन की अपेक्षा की जाती है।
समाज को बाँटने वाली नीतियों के समर्थन में ऐसे तत्वों की भीड़ एकत्र होती जा रही है, जिनका न तो कोई स्पष्ट वैचारिक आधार है और न ही आत्मचिंतन की क्षमता। जिनका मानसिक स्तर इतना विकसित नहीं कि वे अपने हित-अहित का विवेकपूर्ण आकलन कर सकें। स्वतंत्रता के उपरांत उन्हें आगे बढ़ने के अनेक अवसर प्राप्त हुए, किंतु वे आज भी अपने पैरों पर खड़े होने में असमर्थ दिखाई देते हैं।

स्थिति दिन-प्रतिदिन और अधिक विकट होती जा रही है। जातिगत पूर्वाग्रह न तो हीनता को समाप्त कर पा रहे हैं और न ही सामाजिक समरसता स्थापित कर पा रहे हैं। इसके विपरीत, एक अंध भीड़ को भ्रमित करने में वे तत्व सक्रिय हैं, जिन्हें न तर्क से सरोकार है और न ही सत्य स्वीकार करने की प्रवृत्ति। समाज में अलगाव उत्पन्न करने वाली प्रयोगशालाओं में निरंतर नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं, जहाँ मनुष्य के मन में मनुष्य के प्रति वैमनस्यता बोई जा रही है।
कहीं किसी राजनीतिक दल में किसी दिशानायक की बढ़ती लोकप्रियता से असहज होकर उसी दल के अन्य लोग अपना कद ऊँचा करने के लिए दूसरों का कद घटाने में जुटे हैं। वस्तुतः कोई भी अपने आप में संतुष्ट नहीं है। सबके अपने-अपने स्वार्थ सर्वोपरि हो गए हैं और राष्ट्र कहीं पीछे छूटता जा रहा है।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब समाज धार्मिक उन्माद और जातीय भेदभाव के माध्यम से विघटन की ओर बढ़ रहा हो, तब हम अपनी तथाकथित भौतिक समृद्धि पर गर्व कैसे करें? यह चिंतन का विषय होना चाहिए कि समाज में विभाजन के बीज बोने वाला यह सिलसिला देश को किस दिशा में ले जा रहा है।
शिक्षा संस्थानों में भारतीय होने की पहचान के स्थान पर जातीय पहचान को प्राथमिकता देने के लिए प्रवेश प्रपत्रों में जातीय कॉलम का होना क्या स्वयं में जातीय भेदभाव का प्रमाण नहीं है? जब पहचान का आधार ही विभाजन पर टिका हो, तो समरस समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है?
अतः मूल प्रश्न यही है—
व्यक्ति के लिए राष्ट्र सर्वोपरि है या उसकी धार्मिक और जातीय पहचान?
