राष्ट्र का सहयोग: संकट के समय नागरिक दायित्व ही सबसे बड़ी शक्ति; अफवाहों और जमाखोरी से बचने की अपील
लेखक: डॉ. सुधाकर आशावादी (विभूति फीचर्स) संपादन: वेब डेस्क | 28 मार्च 2026
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच बढ़ते तनाव का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है, विशेषकर कच्चे तेल की कीमतों और आपूर्ति को लेकर। लेकिन विडंबना यह है कि अंतरराष्ट्रीय संकट से ज्यादा नुकसान देश के भीतर फैली अफवाहें, मुनाफाखोरी और नकारात्मक राजनीति पहुँचा रही हैं। ऐसे समय में यह समझना आवश्यक है कि राष्ट्र के प्रति सहयोग देना प्रत्येक नागरिक का प्रथम और परम दायित्व है।
आपदा में अवसर की नकारात्मक प्रवृत्ति
लेखक डॉ. सुधाकर आशावादी के अनुसार, युद्ध या किसी भी वैश्विक आपदा के समय भारत में कुछ अवसरवादी तत्व 'आपदा में अवसर' तलाशने लगते हैं।
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अफवाहों का बाजार: पेट्रोलियम पदार्थों और रसोई गैस की कमी की झूठी खबरों ने आम जनता को चिंता में डाल दिया है, जिससे पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों पर लंबी कतारें लग गई हैं।
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सियासी बयानबाजी: राजनीतिक दल सरकार को घेरने और उसे कमजोर सिद्ध करने के चक्कर में अक्सर नकारात्मक दृष्टिकोण अपना लेते हैं, जो देश की एकता के लिए घातक है।
सोशल मीडिया और कालाबाजारी का चक्रव्यूह
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर गैस सिलेंडर की कालाबाजारी और ईंधन की जमाखोरी के वीडियो 'आग में घी' का काम कर रहे हैं।
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अराजक तत्वों की भूमिका: देश को अस्थिर करने वाली शक्तियां भीड़ को उकसाकर अव्यवस्था फैलाने का प्रयास करती हैं।
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प्रशासनिक चुनौती: सरकार और प्रशासन के लिए हर अफवाहबाज पर नजर रखना कठिन हो जाता है, जब समाज का एक बड़ा हिस्सा खुद ही इस आपाधापी में शामिल हो जाए।
नागरिक कर्तव्य: आलोचना से पहले आत्म-चिंतन
लेखक का तर्क है कि व्यवस्था पर नाकामी का ठीकरा फोड़ने से पहले प्रत्येक व्यक्ति को अपने नागरिक कर्तव्यों को पहचानना होगा।
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अफवाहों पर विराम: एक जागरूक नागरिक का कर्तव्य है कि वह बिना पुष्टि के किसी भी जानकारी को साझा न करे और न ही उससे घबराए।
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सहयोग की भावना: यदि कहीं अव्यवस्था हो रही है, तो उसे दूर करने में सरकार और प्रशासन का सहयोग करना अपेक्षित है, न कि उसे और बढ़ाना।
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राष्ट्र सर्वोपरि: घर, परिवार और राष्ट्र की समृद्धि तभी संभव है जब हम संकट के समय व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर देश के साथ खड़े हों।
: चिंतन की आवश्यकता
ईरान प्रकरण हो या कोई अन्य वैश्विक संकट, भारत की आंतरिक मजबूती हमारे सामूहिक व्यवहार पर निर्भर करती है। मुनाफाखोरों के मंसूबों को ध्वस्त करने के लिए आम आदमी की सक्रिय भूमिका अनिवार्य है। यह समय आपसी खींचतान का नहीं, बल्कि एकजुट होकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का है।राष्ट्र की सुरक्षा और स्थिरता केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि नागरिकों के धैर्य और उनके दायित्व बोध में निहित है।"
