विदेशी आंकड़ों पर नाचते देशी किटाणु
Native germs dancing to foreign figures
Tue, 12 May 2026
(सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स)
अपनी एक पुरानी आदत है—अपन को अपने ऊपर भरोसा ही नहीं। जब तक कोई विदेशी संस्था, विदेशी अख़बार या विदेशी विशेषज्ञ हमारे बारे में राय न दे दे, तब तक हमें अपनी आँखों देखी बात पर भी विश्वास नहीं होता। विदेशी धरती से कोई छींक भी दे दे कि “भारत में सब गड़बड़ है”, तो यहाँ बैठे कुछ लोग तुरंत रूमाल लेकर नाक पोंछने दौड़ पड़ते हैं।
दुनिया में न जाने कितनी संस्थाएँ हैं, जो हर साल कोई न कोई सूचकांक निकालती रहती हैं। कोई खुशी मापता है, कोई भुखमरी, कोई भ्रष्टाचार, कोई लोकतंत्र। मज़े की बात यह है कि इन सूचकांकों में भारत को अक्सर उन देशों से भी नीचे दिखा दिया जाता है, जिनकी आधी अर्थव्यवस्था भारत की सहायता पर टिकी होती है। समझ में नहीं आता कि इनके शोध का तरीका क्या है? आँकड़े कहाँ से आते हैं? फंडिंग कौन करता है? और सबसे बड़ा सवाल—इनके चश्मे का नंबर कितना है, जो भारत में उन्हें केवल अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देता है?
विदेशी अख़बारों और मंचों पर बैठे कुछ महानुभाव भारत के आंतरिक मामलों पर ऐसे भाषण देते हैं, मानो मोहल्ले की चौपाल उन्हीं के नाम लिखी हो। और इधर देश में बैठे कुछ “बौद्धिक कीटाणु” उनकी हर बात को वेदवाक्य मानकर सिर पर उठा लेते हैं। प्रमाण हो या न हो, तथ्य हों या न हों—विदेशी मुहर लग गई, बस बात सौ फीसदी सत्य हो गई
मुफ्त राशन पाने वाले करोड़ों लोगों के चेहरे पर मुस्कान दिखाई दे जाए, तो भी विदेशी शोधकर्ता बताते हैं कि भारतीय बहुत दुखी हैं। महंगाई का रोना ऐसा रोया जाता है, जैसे पड़ोसी देशों में टमाटर और प्याज मुफ्त में मिलते हों। भुखमरी के सूचकांक में भारत को उन देशों से नीचे दिखाया जाता है, जिन्हें भारत समय-समय पर अनाज और आर्थिक मदद देता रहा है। नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान जैसे देशों को कई बार भारत से अधिक “खुशहाल” बताया जाता है। लगता है वहाँ लोग रोटी नहीं, खुशी का हलवा खाते हैं। हाँ, अगर कोई “मुफ्त का माल खाकर उसी को गाली देने” का सूचकांक बन जाए, तो भारत शायद उसमें विश्वगुरु बन जाए। लेकिन अफसोस, विदेशी शोधकर्ताओं को ऐसे विषयों में कोई रुचि नहीं होती। भारत की उपलब्धियों पर शोध करने से शायद उनकी लैब की मशीनें बंद हो जाती होंगी।
वैसे भारतीयों की भी तारीफ करनी पड़ेगी। हम अपने अनुभव पर कम और विदेशी प्रमाणपत्र पर ज़्यादा भरोसा करते हैं। राजनीति में भी ऐसे तत्वों की कमी नहीं, जो अपने देश की कमियाँ ढूँढ़ने में इतने मग्न रहते हैं कि उपलब्धियाँ उन्हें एलर्जी की तरह लगती हैं। वे हर विदेशी आलोचना में सुर मिलाकर ऐसा गाते हैं, मानो राष्ट्रहित नहीं, “सेल्फ गोल” प्रतियोगिता चल रही हो।ऐसे लोगों को देखकर इतिहास के जयचंद याद आने लगते हैं। फर्क बस इतना है कि तब तलवारें थीं, अब ट्वीट और टीवी डिबेट हैं। देश वही है, किरदार वही हैं—सिर्फ़ मंच बदल गया है।
