शहरी क्षेत्रों में वृक्ष आच्छादित सरकारी भूमियों पर बनें 'प्राकृतिक पशु व गौ संरक्षण केंद्र': जनहित में एक अभिनव पहल

'Natural Animal and Cattle Conservation Centers' on Tree-Covered Government Land in Urban Areas: An Innovative Initiative in the Public Interest
 
संदीप अधिकारी अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ खंडपीठ

शहरों और कस्बों में बेघर पशुओं, आवारा कुत्तों और गौ-वंश की दयनीय स्थिति आज एक गंभीर विषय बन चुकी है। वर्तमान में अधिकांश गौ-शालाओं या पशु आश्रय स्थलों में न तो पर्याप्त छायादार पेड़ हैं, न ही पीने व नहाने के लिए साफ पानी के पोखर, और न ही पर्याप्त हरा चारा। इसके परिणामस्वरूप, भीषण गर्मी और पोषण के अभाव में आए दिन बेजुबान पशु तड़पकर दम तोड़ देते हैं।

दूसरी ओर, शहरी बस्तियों में जगह की कमी और संकरी गलियों के कारण आम नागरिक चाहकर भी गाय या अन्य पशु नहीं पाल पाते। भोजन की तलाश में ये बेजुबान कचरे के ढेरों से हानिकारक पॉलिथीन और अपशिष्ट खाने को मजबूर हैं।

यही विषैले तत्व दूध और पर्यावरण के माध्यम से मानव स्वास्थ्य को भी गंभीर नुकसान पहुँचा रहे हैं। भूख और मानवीय क्रूरता का शिकार होकर कई बार क्षेत्र के कुत्ते भी आक्रामक हो जाते हैं। इस जटिल मानवीय, सामाजिक और पर्यावरणीय समस्या का समाधान प्रकृति के सिद्धांतों पर आधारित एक सरल और व्यावहारिक योजना में छिपा है।

 मुख्य समाधान एवं कार्ययोजना

1. छायादार व वृक्ष आच्छादित भूमियों का आवंटन

शहरों व वार्डों के आसपास वन विभाग, नगर निगम या राजस्व/बंजर विभाग की ऐसी खाली ज़मीनें जहाँ पहले से घने और छायादार पेड़ मौजूद हैं, उन्हें चिन्हित कर 'पशु व गौ संरक्षण केंद्र' के लिए आवंटित या आरक्षित किया जाए।

2. प्राकृतिक सुविधाओं का विकास

  • बाउंड्रीवॉल व सुरक्षा: चयनित ज़मीन की चारों तरफ से सुरक्षित घेराबंदी कराई जाए।

  • जलाशय/तालाब: पशुओं के पीने और गर्मी से राहत पाने के लिए क्षमता अनुसार कृत्रिम तालाब का निर्माण हो।

  • हरा चारा व नाद व्यवस्था: परिसर के एक हिस्से में नियमित रूप से हरी घास व बरसीन बोई जाए और चारा खिलाने के लिए पक्की नाद बनवाई जाए।

3. सामाजिक संस्थाओं व NGOs की भागीदारी

इन केंद्रों के सुचारू संचालन, देखरेख और स्वच्छता का जिम्मा स्थानीय प्रकृति प्रेमी नागरिकों, पशु-पक्षी कल्याण समितियों और पंजीकृत गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को सौंपा जाए।

4. हरियाली की सुरक्षा और अतिक्रमण पर रोक

अक्सर देखा जाता है कि घने पेड़ों वाली जमीनों को भू-माफिया या असामाजिक तत्व कटवाकर कब्जा लेते हैं या पार्कों/इमारतों के नाम पर हरे पेड़ काट दिए जाते हैं। इन भूमियों को पशु संरक्षण केंद्र में बदलने से पेड़ों की कटाई रुकेगी और अवैध कब्जों पर भी अंकुश लगेगा।

 योजना से होने वाले दूरगामी लाभ

  • गौ-वंश को प्राकृतिक जीवन: गायों को छाया, शुद्ध पानी और हरा चारा मिलेगा, जिससे वे पॉलिथीन खाने से बचेंगी और जन-सामान्य को भी पौष्टिक व शुद्ध दूध मिलेगा।

  • बेघर पशुओं व पक्षियों को आश्रय: आवारा कुत्तों और पक्षियों को सुरक्षित व शांतिपूर्ण ठिकाना मिलेगा, जिससे मानव-पशु संघर्ष (Animal-Human Conflict) में कमी आएगी।

  • पर्यावरण व स्वास्थ्य संरक्षण: शहरी क्षेत्रों में वृक्षारोपण और हरियाली का दायरा बढ़ेगा, जिससे वायु गुणवत्ता में सुधार होगा।

 यदि सरकार और स्थानीय प्रशासन वार्ड स्तर पर वृक्ष आच्छादित भूमियों को इस मॉडल के तहत पशु संरक्षण केंद्रों में परिवर्तित करने की नीति अपनाते हैं, तो यह न केवल पशु कल्याण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होगा, बल्कि पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य की रक्षा भी सुनिश्चित करेगा।

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