प्रकृति का अनुपम उपहार निर्मल नदियां हुईं अब मैली-मैली

नदियां सभ्यता की जननी ही नहीं, जीवन की निरंतरता और संस्कृति की वाहक भी हैं, लेकिन प्रदूषण, अतिक्रमण और अनियोजित विकास से अस्तित्व पर मंडरा रहा संकट
 
प्रकृति का अनुपम उपहार निर्मल नदियां हुईं अब मैली-मैली

(प्रमोद दीक्षित मलय—विभूति फीचर्स)

नदियां धरातल पर बहने वाले जलस्रोत मात्र नहीं हैं, बल्कि सभ्यताओं की जननी और सांस्कृतिक परंपराओं की साक्षी रही हैं। उनका सतत प्रवाह जीवन का उत्स है, ऊर्जा है और सुख-समृद्धि का आधार भी। नदियां व्यष्टि से समष्टि की यात्रा का प्रस्थान बिंदु हैं। वे भोजन और पोषण का स्रोत होने के साथ-साथ मानव जीवन और प्रकृति के बीच संतुलन की वाहक भी हैं।

सदानीरा सरिताएं धीरता, समता, समरसता, सह-अस्तित्व और निरंतरता की प्रतीक रही हैं। इनके किनारे मानव सभ्यताएं विकसित हुईं, ज्ञान की साधना हुई और संस्कृति ने आकार लिया। नदियां पृथ्वी के प्राकृतिक सौंदर्य का आभूषण हैं तो कृषि, जैव विविधता और मानव जीवन के लिए अनिवार्य आधार भी। लेकिन आज यही जीवनदायिनी नदियां अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं।

इसी चिंता को रेखांकित करने और नदियों के संरक्षण के प्रति वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर वर्ष सितंबर के चौथे रविवार को विश्व नदी दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य नदियों और जलमार्गों के महत्व, उनके संरक्षण तथा नदी पारिस्थितिकी तंत्र के सामने मौजूद चुनौतियों के प्रति लोगों को जागरूक करना है।

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प्रदूषण से सिकुड़ रही नदियों की सांस

नदियों का निरंतर प्रवाहित रहना पर्यावरणीय संतुलन और मानव जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन औद्योगिक कचरे, घरेलू गंदे पानी और सीवेज को बिना पर्याप्त शोधन के नदियों में छोड़े जाने से जलस्रोत लगातार प्रदूषित हो रहे हैं। इसके अलावा अवैध खनन, नदी क्षेत्रों में अतिक्रमण और अनियोजित निर्माण से नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र भी प्रभावित हुए हैं।

कई स्थानों पर नदियों में कचरा और गाद जमा होने से उनकी जलधारण क्षमता तथा प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हुआ है। अनेक छोटे जलस्रोत और बरसाती नदियां गर्मी आने से पहले ही सूख जाती हैं। जिन जलधाराओं में कभी लंबे समय तक पानी बहता था, उनमें अब वर्षा के बाद ही थोड़े समय के लिए पानी दिखाई देता है।

नदियों के उद्गम क्षेत्रों पर भी जलवायु परिवर्तन का असर दिखाई दे रहा है। हिमनदों और ग्लेशियरों में बदलाव का प्रभाव उन नदियों के दीर्घकालिक जलप्रवाह पर पड़ सकता है, जो इन स्रोतों पर निर्भर हैं। दूसरी ओर, अनियोजित शहरी विस्तार और बांधों सहित विभिन्न निर्माण गतिविधियों ने कई क्षेत्रों में प्राकृतिक जलधाराओं को प्रभावित किया है।

जागरूकता से संरक्षण तक

नदियों के संरक्षण के लिए वैश्विक स्तर पर लंबे समय से प्रयास किए जा रहे हैं। विश्व नदी दिवस के अवसर पर विभिन्न देशों में सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें नदी तटों की सफाई, पौधरोपण, शैक्षिक भ्रमण, नदी उत्सव, वाद-विवाद, भाषण, लेख एवं कविता लेखन, पेंटिंग, प्रश्नोत्तरी और जनजागरूकता अभियान जैसे कार्यक्रम शामिल होते हैं।

इन गतिविधियों का उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि नदियां केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। नदी जल में रहने वाले जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का संरक्षण भी नदी संरक्षण का ही अभिन्न हिस्सा है।

नदी तटों पर पौधरोपण, सीवेज एवं औद्योगिक अपशिष्ट के शोधन और जल के विवेकपूर्ण उपयोग जैसे प्रयास महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, नदियों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए इन प्रयासों को व्यापक और निरंतर बनाए रखने की आवश्यकता है।

नदियों की दुर्दशा की तस्वीर

हमारे आसपास की अनेक नदियां इस संकट की तस्वीर प्रस्तुत करती हैं। वाराणसी के नामकरण से जुड़ी वरुणा और असी नदियों का उदाहरण अक्सर नदी प्रदूषण की चर्चा में सामने आता है। दिल्ली में यमुना का प्रदूषण भी लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है। गंगा जैसी महत्वपूर्ण नदी के संरक्षण के लिए भी निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

पिछले वर्ष अपने ही जनपद के एक गांव में नदी के संबंध में बातचीत के दौरान ग्रामीणों ने बताया कि गांव से होकर बहने वाली कड़ैली नदी बांध बनने के बाद लगभग सूख गई। ग्रामीणों के अनुसार, पहले इसमें वर्षभर जरूरत भर पानी उपलब्ध रहता था। आसपास की अन्य बरसाती नदियों की स्थिति भी ऐसी ही बताई गई।

भारत नदियों की दृष्टि से समृद्ध देश है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और महानदी जैसी अनेक नदियां देश की कृषि, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और जनजीवन से जुड़ी हैं। उमंगोट नदी जैसे स्वच्छ जलस्रोत इस बात का उदाहरण हैं कि संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी से नदी पारिस्थितिकी को बेहतर बनाए रखा जा सकता है।

दुनिया की प्रमुख नदियों में नील नदी को सामान्यतः सबसे लंबी नदियों में गिना जाता है, जबकि कांगो नदी अपनी गहराई के लिए प्रसिद्ध है। बांग्लादेश को भी नदियों की बहुलता के कारण नदीप्रधान देश के रूप में जाना जाता है। भारत में छोटी-बड़ी अनेक नदियां हैं, जिनका महत्व केवल जल उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है।

नदियों से जुड़ी रही है हमारी सभ्यता

प्राचीन काल से ही नदियों के किनारे मानव बस्तियां और सभ्यताएं विकसित होती रही हैं। ऋषि-मुनियों ने नदी तटों पर आश्रम स्थापित कर ज्ञान और साधना की परंपरा को आगे बढ़ाया। धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों का आयोजन भी नदियों के तट पर होता रहा है। कुंभ जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों का नदी और मानव जीवन के संबंध से गहरा जुड़ाव है।

भारतीय साहित्य और संस्कृति में भी नदियों का विशेष स्थान रहा है। नदी केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि आस्था, स्मृति, संस्कृति और जीवन का हिस्सा रही है। इसी कारण नदियों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से भी जुड़ा प्रश्न है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नदी को केवल पानी के स्रोत के रूप में न देखकर उसे एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में समझा जाए। औद्योगिक और घरेलू अपशिष्ट का शोधन, अवैध खनन पर नियंत्रण, नदी क्षेत्रों को अतिक्रमण से मुक्त रखना, जल के विवेकपूर्ण उपयोग और नदी तटों पर हरित आवरण बढ़ाने जैसे प्रयासों को निरंतर आगे बढ़ाना होगा।

नदियां रहेंगी तो खेतों में हरियाली रहेगी, जैव विविधता सुरक्षित रहेगी और मानव जीवन की निरंतरता बनी रहेगी। प्रकृति के इस अनुपम उपहार को बचाना केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की साझा जिम्मेदारी है। कामना है कि धरती पर नदियों का निर्मल प्रवाह फिर से जीवन, शांति और समृद्धि का संदेश देता रहे और उनकी कलकल ध्वनि आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहे।

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