सामाजिक बदलाव, राष्ट्रीय एकता और समावेशी विकास के लिए संकीर्ण पहचान से आगे बढ़ने की जरूरत
(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
समाज निरंतर परिवर्तनशील है। कुछ सार्वभौमिक सत्य अपनी जगह स्थिर रहते हैं, लेकिन देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप सामाजिक जीवन में बदलाव आवश्यक होता है। जिस प्रकार लंबे समय तक ठहरा हुआ पानी अपनी स्वच्छता खो देता है, उसी तरह विचारों और सामाजिक व्यवस्थाओं का लंबे समय तक एक ही ढर्रे पर टिके रहना विकास की गति को बाधित कर सकता है। मानव सभ्यता का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि समय-समय पर हुए बदलावों और नए विचारों ने समाज को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
यदि मनुष्य आदिम जीवन पद्धतियों तक ही सीमित रहता, तो आज विज्ञान, तकनीक और आधुनिक सुविधाओं का वह संसार अस्तित्व में नहीं आता, जिसने जीवन को अनेक स्तरों पर आसान बनाया है। पहिए से लेकर आधुनिक डिजिटल तकनीक तक प्रत्येक आविष्कार ने मानव जीवन को नई दिशा दी है। हालांकि हर परिवर्तन को समाज ने सहजता से स्वीकार नहीं किया। नए विचारों और व्यवस्थाओं का विरोध भी हुआ और इसी प्रक्रिया में शोषण, सामंतवाद तथा दासत्व जैसी सामाजिक विसंगतियां भी लंबे समय तक बनी रहीं।
इतिहास बताता है कि आर्थिक और सामाजिक शक्ति जब कुछ परिवारों या समूहों तक सीमित हो जाती है, तो असमानता की खाई बढ़ने लगती है। सामंती सोच केवल सत्ता और संपत्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार को भी प्रभावित करने लगती है। ऐसी मानसिकता में व्यक्ति अपनी सामाजिक पहचान को व्यापक मानवीय और राष्ट्रीय पहचान से ऊपर रखने लगता है।
जाति आधारित राजनीति भी इसी चुनौती का एक रूप बन सकती है, जब सामाजिक पहचान को राजनीतिक स्वार्थ का माध्यम बना दिया जाए। किसी भी वंचित या पिछड़े समुदाय के अधिकारों और अवसरों की रक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है, लेकिन सामाजिक न्याय का उद्देश्य लोगों को स्थायी रूप से जातीय खांचों में बांटना नहीं, बल्कि उन्हें समान अवसर और सम्मान के साथ मुख्यधारा में आगे बढ़ने का रास्ता देना होना चाहिए।
समस्या तब गंभीर हो जाती है जब जाति या धर्म की पहचान को राजनीतिक लाभ के लिए समाज में स्थायी विभाजन का आधार बनाया जाता है। इससे नागरिकों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है और सामाजिक समरसता कमजोर पड़ सकती है। लोकतंत्र में विभिन्न समुदायों की आवाज का सम्मान जरूरी है, लेकिन इन विविधताओं के बीच राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक मूल्यों की साझा जमीन को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है।

देश का विकास तभी व्यापक और टिकाऊ हो सकता है, जब नागरिक अपनी व्यक्तिगत, जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय पहचानों के साथ-साथ एक व्यापक राष्ट्रीय पहचान को भी महत्व दें। विविधता भारत की ताकत है और इसे समाप्त करना नहीं, बल्कि समान नागरिकता और परस्पर सम्मान के आधार पर मजबूत करना आवश्यक है।
आज आवश्यकता ऐसे राजनीतिक और सामाजिक विमर्श की है, जिसमें अधिकारों के साथ कर्तव्यों की चर्चा भी हो। नागरिकों को केवल अपने समुदाय के हितों तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, वैज्ञानिक सोच, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक अवसर जैसे साझा मुद्दों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे जातीय और धार्मिक भावनाओं को भड़काने के बजाय लोकतांत्रिक संवाद और सामाजिक सहयोग को बढ़ावा दें। असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन असहमति को सामाजिक वैमनस्य में बदल देना राष्ट्रहित में नहीं हो सकता।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। अलग-अलग जातियों, धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के बावजूद संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार और गरिमा प्रदान करता है। इसलिए राष्ट्रीय एकता का अर्थ विविधताओं को मिटाना नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ना है।
आज जरूरत इस बात की है कि देश में ऐसा व्यापक विमर्श विकसित हो जिसमें राष्ट्रहित, संविधान, सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानव गरिमा को प्राथमिकता मिले। जाति और धर्म व्यक्ति की पहचान के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित और नागरिक कर्तव्य की भावना उनसे ऊपर होनी चाहिए।
जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी समझेंगे और राजनीतिक विमर्श विभाजन के बजाय विकास तथा सहयोग पर केंद्रित होगा, तभी भारत अपनी पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ सकेगा।
अंततः राष्ट्र सर्वोपरि की भावना का अर्थ किसी पहचान का निषेध नहीं, बल्कि सभी पहचानों को एक व्यापक राष्ट्रीय उद्देश्य से जोड़ना है। यही दृष्टिकोण सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक मजबूती और भारत के रचनात्मक विकास की आधारशिला बन सकता है।
(विनायक फीचर्स)
