NEET-UG री-एग्जाम: लकीर की फकीर प्रशासनिक व्यवस्था और टूटता युवाओं का भरोसा
ओपिनियन डेस्क (अमृत उजाला): देश की सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा प्रवेश परीक्षा 'नीट-यूजी' (NEET-UG) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा में हुई धांधलियों के बाद आयोजित की गई पुनर्परीक्षा (Re-exam) ने सुरक्षा दावों की पोल खोलने के साथ-साथ हमारी प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाल ही में सोशल मीडिया पर मध्य प्रदेश के विदिशा जिले का एक बेहद भावुक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कुछ होनहार बच्चे परीक्षा केंद्र के भीतर जाने के लिए रोते-बिलखते दिखे। एनटीए (NTA) की आंतरिक खामियों के कारण पहली परीक्षा रद्द होने के बाद इन बच्चों ने 50 दिनों तक मानसिक तनाव झेलते हुए दोबारा तैयारी की थी। लेकिन परीक्षा केंद्र पर महज 30 सेकेंड से लेकर 2-5 मिनट की देरी होने पर सख्त नियमों की दुहाई देकर उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। चंद मिनटों की देरी से नियमों का पहाड़ नहीं टूट जाता, लेकिन हमारी अफसरशाही 'लकीर की फकीर' नजर आई। यह देखकर सहज ही महसूस होता है कि इस देश में बड़ी गलतियां अक्सर रसूखदारों की माफ होती हैं, और सारी सख्ती गरीब व मध्यमवर्गीय छात्रों पर ही आजमाई जाती है।
हाईटेक इंतजामों में भी सुराख: बिहार में 24 लोगों का 'सॉल्वर गैंग' गिरफ्तार
एक तरफ जहाँ निर्दोष बच्चों को समय की पाबंदी के नाम पर प्रताड़ित किया गया, वहीं दूसरी तरफ सरकार के तमाम बड़े सुरक्षा दावे धरे के धरे रह गए। बिहार के लखीसराय में परीक्षा के दौरान एक बहुत बड़े 'सॉल्वर गैंग' का भंडाफोड़ हुआ है। पुलिस जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि असली अभ्यर्थियों की जगह परीक्षा देने के लिए देश के नामी मेडिकल कॉलेजों के छात्रों के साथ 30 से 40 लाख रुपये में सौदेबाजी तय हुई थी।
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प्रतिष्ठित संस्थानों के छात्र शामिल: पुलिस ने इस रैकेट के सरगना समेत पीएमसीएच (PMCH), गया मेडिकल कॉलेज, एम्स रायबरेली (AIIMS Raebareli) और बीएचयू (BHU) के मेडिकल छात्रों सहित कुल 24 आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
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बायोमेट्रिक लूपहोल: सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस फर्जीवाड़े में सरकार द्वारा तैनात की गई बायोमेट्रिक जांच कंपनी के कर्मचारी भी संलिप्त पाए गए।
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पुराने तार: रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस गैंग का मास्टरमाइंड अर्पित राज साल 2024 के मुख्य पेपर लीक मामले में भी आरोपी रहा है, जिससे सीबीआई (CBI) ने पूर्व में लंबी पूछताछ की थी। ऐसे में सुरक्षा तंत्र के भीतर ही सुराख होना एनटीए और सरकार के लिए एक बड़ा झटका है।
जब तंत्र के भीतर ही हो कमजोरी, तो बाहर सख्ती का क्या लाभ?
अब यह यक्ष प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि केंद्र और राज्य सरकारों की भारी-भरकम प्रशासनिक मशीनरी और खुफिया तंत्र के सक्रिय होने के बावजूद इन शिक्षा माफियाओं को इतनी बड़ी धोखाधड़ी करने का साहस कहाँ से मिलता है? इसका सीधा उत्तर है—पुराने अपराधियों पर लचर कानूनी कार्रवाई। सख्त सजा न मिलने के कारण इनके हौसले इस कदर बुलंद हैं कि वे हर बार नई सुरक्षा प्रणाली को धता बता देते हैं।
सीबीआई की शुरुआती जांच में जो सच सामने आया है, वह बेहद डरावना है। पुणे के एक रसायन विज्ञान (Chemistry) के प्रोफेसर, जो एनटीए के पेपर सेटर पैनल में शामिल थे, उनकी पहुंच बेहद गोपनीय परीक्षा सामग्री तक थी। उन्होंने चुनिंदा कोचिंग सेंटरों के माध्यम से कुछ छात्रों के लिए विशेष क्लासेस आयोजित कीं और उन्हें पहले ही प्रश्न-उत्तर लीक कर दिए। साफ है कि बीमारी एनटीए के आंतरिक ढांचे में है, लेकिन इसका इलाज परीक्षा केंद्र के बाहर बच्चों की अंगूठी, चूड़ी, हेयर क्लिप, स्कार्फ और पानी की बोतलें छीनकर ढूंढा जा रहा है।
व्यापमं' की विरासत और डिजिटल समाधान की आवश्यकता
मध्य प्रदेश का कुख्यात 'व्यापमं घोटाला' परीक्षाओं में होने वाले भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। उम्मीद थी कि सरकारें इस विरासत से सीख लेकर परीक्षाओं को तकनीकी रूप से फूलप्रूफ (Foolproof) बनाने के लिए बड़े कदम उठाएंगी। लेकिन करोड़ों रुपये का वेतन लेने वाले नौकरशाहों की फौज आज भी पारंपरिक और दमनकारी तरीकों पर निर्भर है। सुरक्षा के नाम पर बच्चों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना कतई स्वीकार्य नहीं है।
जब देश डिजिटल इंडिया की ओर बढ़ रहा है, तो शिक्षा व्यवस्था में निम्नलिखित क्रांतिकारी कदम उठाने की जरूरत है:
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पूर्णतः ऑनलाइन परीक्षाएं: मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रशासनिक और बैंकिंग जैसी सभी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं को पूरी तरह से सुरक्षित ऑनलाइन मोड में स्थानांतरित किया जाना चाहिए।
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ब्लॉकचेन और डिजिटल डिग्री सिक्योरिटी: डिग्रियों और प्रमाण पत्रों को आधुनिक डिजिटल सुरक्षा एवं बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन से जोड़ा जाए, ताकि फर्जी डिग्रियों के सिंडिकेट को जड़ से खत्म किया जा सके।
'विश्व गुरु' बनने के दावों पर पुनर्विचार
नई शिक्षा नीति (NEP) का प्रचार-प्रसार जितने जोर-शोर से किया गया, यदि उसका आधा प्रयास भी परीक्षाओं को पारदर्शी और साफ-सुथरा बनाने में किया जाता, तो आज देश का भविष्य सड़कों पर आंसू बहाने को मजबूर न होता। अगर देश में एक भी राष्ट्रीय परीक्षा बिना धांधली और बिना छात्रों को प्रताड़ित किए संपन्न नहीं हो सकती, तो हमें 'विश्व गुरु' बनने जैसी बड़ी बहसों पर विराम लगा देना चाहिए।
रोजगार और शिक्षा पर लंबे-चौड़े भाषण देने वाले नीति-निर्माताओं को सबसे पहले उन लाखों युवाओं के मानसिक दर्द को समझना होगा, जो पूरी ईमानदारी से परीक्षा देने के बाद भी सालों-साल इस डर के साए में जीते हैं कि कहीं उनका पेपर लीक न हो जाए, परीक्षा रद्द न हो जाए या मामला किसी अदालत की फाइलों में न अटक जाए।

