भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी नायक नेताजी सुभाषचंद्र बोस
(अतिवीर जैन ‘पराग’ – विनायक फीचर्स) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में नेताजी सुभाषचंद्र बोस का नाम अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और क्रांतिकारी विचारधारा का प्रतीक है। वे उन विरले नेताओं में से थे, जिन्होंने केवल राजनीतिक आंदोलनों तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से भी देश को स्वतंत्र कराने का प्रयास किया।
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उदय
वर्ष 1938 में गुजरात के हरिपुरा अधिवेशन में सुभाषचंद्र बोस को सर्वसम्मति से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रीय योजना समिति का गठन कर भारत के औद्योगिक और आर्थिक विकास की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत की।

इसके बाद 1939 में त्रिपुरी (जबलपुर) अधिवेशन में वे पुनः कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए। यह चुनाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि महात्मा गांधी सीतारमैया को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। बावजूद इसके, बोस ने 1580 मत प्राप्त कर 1377 मत पाने वाले सीतारमैया को 203 मतों से पराजित किया।
गांधीजी से मतभेद और फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ होते ही नेताजी ने अंग्रेजों को छह माह के भीतर भारत छोड़ने का अल्टीमेटम दिया। इस रुख का महात्मा गांधी ने विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप सुभाषचंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया।
नेताजी भारत को पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र बनाना चाहते थे, जबकि कांग्रेस नेतृत्व का एक वर्ग ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत ‘डोमिनियन स्टेट’ की अवधारणा से सहमत था। इस मतभेद के चलते बोस ने 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। शीघ्र ही उन्हें कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया और फॉरवर्ड ब्लॉक एक स्वतंत्र राजनीतिक दल के रूप में उभरा।
नजरबंदी से जर्मनी तक का साहसिक सफर
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत के संसाधनों के दोहन का नेताजी ने तीव्र विरोध किया और जनआंदोलन छेड़ दिया। इसके परिणामस्वरूप उन्हें कोलकाता स्थित आवास में नजरबंद कर दिया गया। 1941 में वे अंग्रेजों की कैद से निकलकर अफगानिस्तान के मार्ग से जर्मनी पहुंचे और लंबे समय तक गुप्त जीवन बिताया।
फ्री इंडिया सेंटर और ‘जय हिंद’ का उद्घोष
बर्लिन में नेताजी ने फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की और ‘जन गण मन’ को भारत का राष्ट्रगान घोषित किया। यहीं से उन्होंने देश को “जय हिंद” का अमर नारा दिया, जिसने भारतीयों में नई चेतना का संचार किया। इसी दौरान उन्हें ‘नेताजी’ की उपाधि प्राप्त हुई।
1942 में उन्होंने जर्मनी में एडोल्फ हिटलर से भी मुलाकात की, किंतु वहां से उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। इसी कालखंड में उनकी भेंट एमिली शेंकल से हुई, जो उनकी सचिव रहीं और बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं। उनसे उनकी पुत्री अनिता बोस का जन्म हुआ।
जापान और आजाद हिंद फौज का नेतृत्व
26 जनवरी 1943 को बर्लिन में भारतीय स्वाधीनता दिवस मनाने के बाद नेताजी जापान पहुंचे। जून 1943 में जापानी प्रधानमंत्री ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए बिना शर्त समर्थन की घोषणा की, जो उस समय एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि थी।
जुलाई 1943 में नेताजी सिंगापुर पहुंचे, जहां रासबिहारी बोस और आजाद हिंद फौज के अधिकारियों ने उनका भव्य स्वागत किया। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हॉल में उन्होंने आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति के रूप में सलामी ली और ऐतिहासिक नारा दिया—“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।”
अंतरिम आजाद हिंद सरकार और ऐतिहासिक घोषणाएँ
21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में नेताजी ने अंतरिम आजाद हिंद सरकार की स्थापना की घोषणा की। इस सरकार को जापान, जर्मनी और इटली सहित नौ देशों की मान्यता प्राप्त हुई। आजाद हिंद सरकार ने अमेरिका और ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।
22 अक्टूबर 1943 को उन्होंने रानी झांसी रेजीमेंट का उद्घाटन किया, जिसमें भारतीय महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रही। आजाद हिंद सरकार ने अपनी मुद्रा भी जारी की, जिनमें ₹10 से ₹1,00,000 तक के नोट शामिल थे। सबसे बड़े नोट पर नेताजी की तस्वीर अंकित थी।
अंडमान से रंगून तक
29 दिसंबर 1943 को नेताजी अंडमान पहुंचे और जिमखाना मैदान में राष्ट्रीय तिरंगा फहराया। उन्होंने अंडमान को “शहीद द्वीप” और निकोबार को “स्वराज द्वीप” नाम दिया। जनवरी 1944 में उन्होंने अपना मुख्यालय सिंगापुर से रंगून स्थानांतरित किया। 18 मार्च 1944 को आजाद हिंद फौज ने इंफाल के मार्ग से भारत में प्रवेश किया, किंतु प्रतिकूल मौसम और जापान की पराजय के कारण अभियान सफल नहीं हो सका।
रहस्यमयी अंत और अमर विरासत
ऐसा माना जाता है कि 18 अगस्त 1945 को जापान जाते समय नेताजी का विमान ताइवान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, किंतु उनका पार्थिव शरीर कभी नहीं मिला। इसी कारण उनकी मृत्यु आज भी रहस्य और विवाद का विषय बनी हुई है।
नेताजी की अमर प्रेरणा
नेताजी सुभाषचंद्र बोस का “जय हिंद” का उद्घोष आज भी राष्ट्रप्रेम और उत्साह का प्रतीक है। उनकी क्रांतिकारी सोच और अद्वितीय साहस ने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। वे भारतीय जनमानस में एक ऐसे नेता के रूप में सदैव जीवित रहेंगे, जिन्होंने आज़ादी के लिए हर संभव बलिदान देने का साहस दिखाया।
