भारत में वृद्ध समाज की नई चुनौतियां और तैयारियां
(ओ.पी. पाल—विभूति फीचर्स)
दुनियाभर में 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि तेजी से बदलती जनसांख्यिकी और बढ़ती उम्र की आबादी से जुड़ी चुनौतियों पर विचार करने का भी अवसर है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, 2050 तक दुनिया में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या बढ़कर करीब 2.1 अरब हो सकती है। इसका अर्थ है कि वैश्विक आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा इस आयु वर्ग में होगा।
मानव जीवन प्रत्याशा में वृद्धि को आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं और बेहतर जीवन परिस्थितियों की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है। हालांकि, लंबी होती उम्र के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि बुजुर्गों को जीवन के इस पड़ाव पर स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और आत्मनिर्भरता किस तरह उपलब्ध कराई जाए।
संयुक्त राष्ट्र का जोर भी पीढ़ियों के बीच सहयोग और एकजुटता बढ़ाने पर रहा है। सरकार, समाज और परिवार मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करें, जिसमें लंबा जीवन केवल वर्षों की संख्या न हो, बल्कि वह सुरक्षित, सम्मानजनक और व्यक्ति की गरिमा तथा पसंद के अनुरूप भी हो।
भारतीय समाज में बुजुर्गों की महत्वपूर्ण भूमिका
भारतीय सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था में बुजुर्गों को लंबे समय से अनुभव, मार्गदर्शन और पारिवारिक मूल्यों के वाहक के रूप में देखा जाता रहा है। वे परिवारों और समुदायों के लिए ज्ञान और अनुभव का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। ऐसे में वृद्धजन दिवस वरिष्ठ नागरिकों के योगदान, अधिकारों और जरूरतों पर नए सिरे से ध्यान देने का अवसर प्रदान करता है।
अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाने का निर्णय संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 14 दिसंबर 1990 को लिया था और पहली बार यह दिवस 1 अक्टूबर 1991 को मनाया गया। इसका उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों के योगदान को पहचानने, उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उम्र बढ़ने से जुड़ी चुनौतियों पर समाज का ध्यान आकर्षित करना था।
भारत में तेजी से बढ़ रही बुजुर्ग आबादी
यह जनसांख्यिकीय बदलाव भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। युवा आबादी वाले देश के रूप में पहचाने जाने वाले भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नीति आयोग और अन्य संस्थानों के अनुमानों में आने वाले दशकों में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना जताई गई है।
बढ़ती बुजुर्ग आबादी के साथ स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा की चुनौतियां भी बढ़ेंगी। विशेष रूप से अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों, बुजुर्ग महिलाओं और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले वृद्धों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं, नियमित आय और सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
भारत में बड़ी संख्या में लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। ऐसे श्रमिकों के पास अक्सर नियमित पेंशन, भविष्य निधि या सेवानिवृत्ति के बाद आय का पर्याप्त स्रोत नहीं होता। ऐसे में उम्र बढ़ने के साथ आर्थिक निर्भरता और असुरक्षा की समस्या गंभीर रूप ले सकती है।
स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर जोर
वरिष्ठ नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य कवरेज का प्रावधान किया गया है। पात्र लाभार्थियों को योजना के तहत अस्पताल में इलाज के लिए निर्धारित सीमा तक स्वास्थ्य कवर मिलता है।
वहीं वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (SCSS) 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए सरकार समर्थित बचत विकल्प उपलब्ध कराती है। इसका उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को नियमित ब्याज आय के लिए एक सुरक्षित निवेश माध्यम उपलब्ध कराना है।
इसके अलावा अटल वयो अभ्युदय योजना के माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण, देखभाल और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है। राज्यों में वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाओं के जरिए पात्र और जरूरतमंद बुजुर्गों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है।वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं के समाधान और मार्गदर्शन के लिए एल्डरलाइन जैसी हेल्पलाइन भी संचालित है, जहां बुजुर्ग सहायता और परामर्श प्राप्त कर सकते हैं।
परिवार और समाज की भी जिम्मेदारी
सरकारी योजनाएं बुजुर्गों की जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन वृद्धावस्था से जुड़ी चुनौतियां केवल आर्थिक या स्वास्थ्य संबंधी नहीं हैं। अकेलापन, सामाजिक अलगाव, डिजिटल सेवाओं तक सीमित पहुंच और परिवार में बदलती भूमिकाएं भी वरिष्ठ नागरिकों के जीवन को प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए जरूरी है कि परिवार बुजुर्गों को केवल आश्रित व्यक्ति के रूप में न देखे, बल्कि उनके अनुभव और निर्णय क्षमता को भी महत्व दे। समाज को भी ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जिसमें वरिष्ठ नागरिक सक्रिय रूप से सामाजिक और सामुदायिक जीवन का हिस्सा बने रहें।
भारत में बढ़ती बुजुर्ग आबादी एक चुनौती के साथ-साथ अवसर भी है। यदि स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन के लिए समय रहते पर्याप्त तैयारियां की जाएं तो बढ़ती उम्र की आबादी को बोझ के बजाय समाज की अनुभव-संपदा के रूप में देखा जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस इसी सोच को मजबूत करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक संवेदनशील व्यवस्था तैयार करने का अवसर है।

