गंगा संधि का नया अध्याय: क्या इस बार सुनी जाएगी बिहार की पुकार?

A New Chapter in the Ganga Treaty: Will Bihar's Plea Be Heard This Time?
 
गंगा संधि का नया अध्याय: क्या इस बार सुनी जाएगी बिहार की पुकार?

कुमार कृष्णन-विनायक फीचर्स)

गंगा को दूर से देखना और गंगा के साथ जीवन जीना, दोनों अलग अनुभव हैं। दूर से यह नदी विराट, शांत और आस्था का प्रतीक दिखाई देती है, लेकिन इसके किनारे रहने वाला किसान जानता है कि यही गंगा कभी खेतों को जीवन देती है और कभी बाढ़ के रूप में पूरी फसल बहा ले जाती है। मछुआरे के लिए नदी उसकी रोजी-रोटी है और दियारा क्षेत्र में रहने वाले परिवार के लिए गंगा की धारा का बदलना जमीन, घर और भविष्य—तीनों के संकट का संकेत हो सकता है।

इसीलिए बिहार के लिए गंगा सिर्फ पानी का सवाल नहीं है। यह जल-अधिकार, आजीविका, पर्यावरण और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है।

अब यह मुद्दा इसलिए और महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को हुई गंगा जल संधि की 30 वर्ष की अवधि 12 दिसंबर 2026 को पूरी हो रही है। यह संधि फरक्का पर गंगा के जल को मुख्य रूप से जनवरी से मई के शुष्क मौसम में निर्धारित व्यवस्था के तहत बांटती है।

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फरक्का फिर बहस के केंद्र में

संधि की अवधि समाप्त होने से पहले बिहार में इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता बढ़ गई है। जनता दल (यू) ने 2050 तक बिहार की बढ़ती जल जरूरतों को ध्यान में रखते हुए संधि की समीक्षा और राज्य के हितों को इसमें शामिल करने की मांग तेज कर दी है। पार्टी ने इस मुद्दे पर जनसंवाद अभियान की भी शुरुआत की है।

केंद्र सरकार की ओर से भी बिहार को आश्वासन दिया गया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जदयू सांसद संजय झा को बताया है कि संधि के भविष्य पर निर्णय लेते समय बिहार के जल हितों को ध्यान में रखा जाएगा। केंद्र के अनुसार इस विषय पर बिहार सरकार के प्रतिनिधियों सहित विभिन्न पक्षों के साथ विचार-विमर्श भी हुआ है।

लेकिन राजनीति में आश्वासन और नीति में उसका वास्तविक रूप अलग-अलग चीजें हैं। असली परीक्षा तब होगी, जब नई व्यवस्था की शर्तें सामने आएंगी और यह स्पष्ट होगा कि बिहार की पेयजल, कृषि तथा औद्योगिक जरूरतों के साथ गंगा के पर्यावरणीय प्रवाह और नदी पर निर्भर समुदायों को कितना महत्व मिलता है।

बिहार की आवाज केवल राजनीतिक नहीं

फरक्का का सवाल बिहार में नया नहीं है। गंगा मुक्ति आंदोलन जैसे सामाजिक आंदोलनों ने दशकों से नदी की अविरलता, मछुआरों के अधिकार और नदी पर बने अवरोधों के प्रभाव का मुद्दा उठाया है।

भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों में भी गंगा को लेकर सामाजिक संवाद लगातार होता रहा है। इस बहस की खासियत यह है कि इसमें सवाल केवल इतना नहीं है कि फरक्का से कितना पानी किस दिशा में जाएगा। बड़ा प्रश्न यह है कि गंगा की प्राकृतिक धारा, गाद, मत्स्य संसाधन और नदी पर निर्भर लोगों का भविष्य क्या होगा?

भागलपुर जैसे इलाकों में नदी का सवाल सीधे लोगों की जिंदगी से जुड़ता है। कटाव, गाद, बाढ़ और मछलियों की घटती उपलब्धता जैसी समस्याएं जल नीति को सिर्फ आंकड़ों का विषय नहीं रहने देतीं।

फरक्का और बाढ़—क्या हर समस्या की वजह बराज है?

फरक्का को लेकर सबसे अधिक सावधानी वैज्ञानिक दृष्टिकोण में बरतने की जरूरत है। बिहार में बाढ़ और कटाव की समस्या गंभीर है, लेकिन पूरी समस्या का कारण केवल फरक्का बराज या गंगा जल संधि को मान लेना उचित नहीं होगा।

अत्यधिक वर्षा, हिमालयी नदियों का व्यवहार, गाद का जमाव, तटबंध, नदी की बदलती धारा, जल निकासी की सीमाएं और जलवायु परिवर्तन जैसे कई कारक बाढ़ की स्थिति को प्रभावित करते हैं। हाल के दिनों में भी बिहार के कई हिस्सों में गंगा और अन्य नदियों के जलस्तर को लेकर प्रशासन को बड़े पैमाने पर राहत एवं बचाव अभियान चलाने पड़े हैं।

इसलिए फरक्का, गाद और नदी के प्रवाह के बीच संबंधों की विस्तृत वैज्ञानिक समीक्षा जरूरी है। निष्कर्ष राजनीतिक धारणा के आधार पर नहीं, बल्कि दीर्घकालीन हाइड्रोलॉजिकल और पर्यावरणीय अध्ययन के आधार पर निकाला जाना चाहिए।

धार्मिक रंग से बचाना होगा गंगा का सवाल

फरक्का और गंगा जल संधि की बहस को धार्मिक पहचान से जोड़ना इस पूरे मुद्दे को कमजोर कर सकता है।

गंगा की बाढ़ किसी के घर में प्रवेश करने से पहले उसकी धार्मिक पहचान नहीं पूछती। गाद खेत को नुकसान पहुंचाती है तो वह किसान की जाति या धर्म नहीं देखती। मछुआरे की आजीविका नदी के प्रवाह पर निर्भर है और गंगा डॉल्फिन के लिए भी नदी का स्वास्थ्य ही मायने रखता है।

इसलिए इस विषय को सांप्रदायिक बहस में बदलने के बजाय विज्ञान, संघीय अधिकार, पर्यावरण और मानवीय जरूरतों के आधार पर देखना ज्यादा जरूरी है।

बांग्लादेश के हित भी हैं महत्वपूर्ण

भारत-बांग्लादेश के बीच जल संबंधों को बिहार बनाम बांग्लादेश के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा। बांग्लादेश में भी गंगा के जल पर बड़ी आबादी की कृषि, मत्स्य और अन्य आजीविकाएं निर्भर हैं।

भारत को अपने पड़ोसी के साथ जल संबंधों में सहयोग और विश्वास बनाए रखना होगा। लेकिन पड़ोसी देश के साथ समझौते का अर्थ भारत के भीतर प्रभावित राज्यों की चिंताओं को नजरअंदाज करना भी नहीं हो सकता।

इसलिए भविष्य की व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी तीन स्तरों पर होनी चाहिए—

बांग्लादेश के साथ न्याय, बिहार के साथ न्याय और गंगा के साथ न्याय।

2050 की जरूरतों को आज की नीति में शामिल करना होगा

1996 की परिस्थितियां आज जैसी नहीं हैं। पिछले तीन दशकों में आबादी बढ़ी है, कृषि और शहरीकरण का स्वरूप बदला है, उद्योगों की पानी की जरूरत बढ़ी है और भूजल पर दबाव भी बढ़ा है।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव जलवायु से जुड़ा है। भारतीय परिषद विश्व मामलों की 2026 की एक अध्ययन रिपोर्ट ने भी इस ओर ध्यान दिलाया है कि 1996 की संधि जिन पुराने हाइड्रोलॉजिकल अनुमानों पर आधारित थी, उनमें जलवायु परिवर्तन और नदी के बदलते व्यवहार के कारण बदलाव आया है।

ऐसे में नई व्यवस्था केवल पुरानी संधि की अवधि बढ़ाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें भविष्य की जल जरूरतों, बदलते वर्षा पैटर्न और नदी के दीर्घकालीन व्यवहार को शामिल करना होगा।

गंगा को सिर्फ पानी की मात्रा से नहीं मापा जा सकता

जल बंटवारे की चर्चा में अक्सर यह सवाल प्रमुख रहता है कि कितना पानी किसे मिलेगा। लेकिन गंगा का जीवन केवल पानी की मात्रा से तय नहीं होता।

नदी का प्राकृतिक प्रवाह, गाद का परिवहन, मत्स्य संसाधन, गंगा डॉल्फिन, भूजल पुनर्भरण और नदी किनारे की जैव-विविधता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

नदी का पानी बांटते समय कहीं ऐसा न हो कि नदी का जीवन ही बांट दिया जाए।

यदि समझौते के आंकड़े पूरे हो जाएं लेकिन नदी का पारिस्थितिक स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता जाए, तो उस व्यवस्था को पूरी तरह न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

बिहार में राजनीतिक सहमति के संकेत

फरक्का का मुद्दा बिहार की राजनीति में भी एक दिलचस्प स्थिति पैदा कर रहा है। सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा जदयू राज्य के जल हितों को लेकर केंद्र पर दबाव बना रहा है, जबकि विपक्ष की ओर से भी संधि पर पुनर्विचार और बिहार के हितों की बात उठाई जा रही है।

जदयू का दबाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह केंद्र की सत्ता में साझेदार है। ऐसे में बिहार की जल चिंता को केवल राजनीतिक विरोध की आवाज मानकर खारिज करना आसान नहीं होगा।

हालांकि, राजनीतिक सहमति तभी सार्थक होगी जब वह ठोस वैज्ञानिक अध्ययन, नीति प्रस्ताव और दीर्घकालीन जल प्रबंधन योजना में बदल सके।

दिसंबर 2026 में क्या होगा?

अब सबसे बड़े सवाल यही हैं—

क्या नई व्यवस्था में 2050 तक बिहार की जल जरूरतों का स्पष्ट आकलन शामिल होगा?

क्या गंगा के पर्यावरणीय प्रवाह को जल बंटवारे का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाएगा?

क्या गाद, कटाव और बाढ़ की समस्या को समग्र नदी प्रबंधन नीति से जोड़ा जाएगा?

क्या नदी पर निर्भर मछुआरों, किसानों और दियारा क्षेत्र के समुदायों की आवाज नीति निर्माण में शामिल होगी?

और क्या बदलती जलवायु एवं नदी-विज्ञान के अनुरूप समझौते की समय-समय पर समीक्षा का प्रावधान होगा?

असली सवाल फरक्का नहीं, गंगा का भविष्य है

दिसंबर 2026 सिर्फ एक संधि की 30 वर्ष की अवधि पूरी होने की तारीख नहीं है। यह भारत की जल नीति को नए सिरे से देखने का अवसर भी है।

फरक्का बराज रहेगा या उसमें कोई बदलाव होगा, यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है—गंगा को स्वस्थ और जीवंत कैसे रखा जाए?

यदि किसी संरचना में बदलाव जरूरी है तो उसका फैसला वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। यदि सुधार से समस्या का समाधान संभव है तो उसे लागू किया जाना चाहिए। नीति का आधार राजनीतिक सुविधा नहीं, बल्कि नदी और समाज का दीर्घकालीन हित होना चाहिए।

बिहार को पानी चाहिए। बांग्लादेश को भी पानी चाहिए। लेकिन गंगा को भी अपना पानी चाहिए।

इसीलिए फरक्का की बहस को किसी राजनीतिक या धार्मिक पहचान की लड़ाई बनाने के बजाय विज्ञान, संघीय अधिकार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नदी के पारिस्थितिक न्याय की कसौटी पर देखना होगा।

यदि ऐसा हुआ तो दिसंबर 2026 किसी पुरानी संधि की अवधि समाप्त होने की तारीख भर नहीं होगी। यह गंगा के साथ एक नई समझ की शुरुआत बन सकती है—ऐसी समझ, जिसमें बांग्लादेश का हित, बिहार का जल-अधिकार और गंगा का जीवन, तीनों के बीच संतुलन कायम करने की कोशिश हो।

(विनायक फीचर्स)

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