उत्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा का नया स्वरूप: अब किताबों से परे, अनुभवों से सीखेंगे बच्चे

New format of school education in Uttar Pradesh: Now children will learn from experiences, beyond books
 
उत्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा का नया स्वरूप: अब किताबों से परे, अनुभवों से सीखेंगे बच्चे
लखनऊ,  नवंबर: उत्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा अब एक नए और अधिक व्यावहारिक स्वरूप में दिखाई देगी। बेसिक शिक्षा मंत्री श्री संदीप सिंह की पहल पर, कक्षा 6, 7 और 8 के विद्यार्थियों के लिए प्रत्येक शैक्षिक सत्र में 10 'बैगलेस दिवस' अनिवार्य किए गए हैं। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को केवल किताबों की पढ़ाई तक सीमित न रखकर वास्तविक जीवन की परिस्थितियों को समझने और उनसे सीखने के लिए मंच प्रदान करना है।

आनंदम मार्गदर्शिका और उद्देश्य

राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) की ओर से ‘आनंदम मार्गदर्शिका’ तैयार की गई है, जिसके आधार पर सभी 75 जिलों के बेसिक शिक्षा अधिकारियों (BSA) को विस्तृत निर्देश जारी किए गए हैं।

मुख्य उद्देश्य: बच्चों को आनंदपूर्ण, कौशल आधारित और अनुभवात्मक शिक्षा से जोड़ना।

 बैगलेस दिवस की गतिविधियाँ

इन बैगलेस दिनों में छात्र बिना बैग के स्कूल आएँगे और निम्नलिखित गतिविधियों में भाग लेंगे, जिससे उनकी वास्तविक जीवन की समझ बढ़ेगी:

  • शैक्षिक भ्रमण और प्रयोग: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़े प्रयोग, शैक्षिक भ्रमण और कला-शिल्प गतिविधियाँ।

  • स्थानीय परिचय: स्थानीय व्यवसायों, कारीगरों और उद्योगों से सीधा परिचय।

  • सामुदायिक सहभागिता: प्राकृतिक अन्वेषण और सामुदायिक भागीदारी आधारित गतिविधियाँ।

  • केस स्टडी: छात्र पहली बार केस स्टडी भी करेंगे, जिससे वे पाठ्यपुस्तकों से परे वास्तविक जीवन की समस्याओं को समझेंगे और उनसे सीखेंगे।

 पहल का लक्ष्य: व्यावसायिक सक्षमता और कौशल विकास

बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह का स्पष्ट मानना है कि यह कार्यक्रम बच्चों को भविष्य में व्यावसायिक रूप से सक्षम बनाने वाले कौशल से जोड़ने में अहम भूमिका निभाएगा।

कार्यक्रम के प्रमुख लक्ष्य:

  • बच्चों में अवलोकन क्षमता, विश्लेषण, तर्क और रचनात्मकता को बढ़ावा देना।

  • कौशल विकास, श्रम की गरिमा, आत्मनिर्भरता और स्थानीय संस्कृति से जुड़ाव को मजबूत करना।

 रचनात्मकता और आत्मविश्वास का विकास

महानिदेशक स्कूल शिक्षा, मोनिका रानी ने इस पहल को नवाचार की नई राह बताते हुए कहा कि इससे बच्चों में रचनात्मकता, आत्मविश्वास और राष्ट्र की संस्कृति से गहरा जुड़ाव विकसित होगा।

SCERT के निदेशक डॉ. गणेश कुमार ने बताया कि विभिन्न गतिविधियों की सूची को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, स्थानीय उद्योग-व्यवसाय, तथा कला-संस्कृति-इतिहास श्रेणियों में बाँटा गया है। प्रत्येक गतिविधि में आवश्यकतानुसार कारीगरों, विशेषज्ञों और समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए भी एक समावेशी योजना तैयार की गई है।

 सीखने का तरीका: व्यावहारिक अनुभव

सीखने का क्षेत्र माध्यम एवं लाभ
कौशल आधारित शिक्षा अवलोकन, प्रयोग, विश्लेषण, तर्क और निष्कर्ष निकालने जैसे कौशल का विकास।
वोकल फॉर लोकल स्थानीय कलाकारों और उद्योगों से संवाद; स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को मजबूती।
श्रम की गरिमा कौशल आधारित गतिविधियों से श्रम का महत्व समझना और भविष्य के व्यवसायों का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करना।
सांस्कृतिक जागरूकता स्मारकों, ऐतिहासिक स्थलों और स्थानीय विरासत के भ्रमण से गहरा ज्ञान अर्जित करना।
समुदाय-स्कूल साझेदारी समुदाय, अभिभावकों और विशेषज्ञों की सक्रिय भागीदारी से वास्तविक जीवन से जुड़ी जानकारी प्राप्त करना।

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