आपदा प्रबंधन नहीं, आपदा से पहले प्रबंधन जरूरी
डॉ. शैलेश शुक्ला–विनायक फीचर्स)
भारत में मौसम का बदलना कोई नई घटना नहीं है। गर्मी, बारिश और सर्दी का क्रम सदियों से चलता आया है। लेकिन आज विज्ञान और तकनीक के दौर में भी हर मौसम आम जनता के लिए परेशानी और खतरे का कारण क्यों बन जाता है, यह गंभीर सवाल है। गर्मी आते ही पेयजल संकट, बिजली की समस्या और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ जाती हैं। मानसून में जलभराव, बंद नालियां और बाढ़ जैसी स्थितियां सामने आती हैं, जबकि सर्दी में गरीब, बेघर और खुले में काम करने वाले लोगों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से अधिकांश संकट अचानक पैदा नहीं होते। प्रशासन को पहले से पता होता है कि किन क्षेत्रों में कौन-सी समस्या उत्पन्न हो सकती है, फिर भी तैयारी अक्सर संकट आने के बाद शुरू होती है।
मौसम की मार को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है। तेज गर्मी, भारी बारिश, शीतलहर या बाढ़ प्राकृतिक घटनाएं हैं, लेकिन इनके कारण होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यही प्रशासन की वास्तविक जिम्मेदारी है। यदि किसी इलाके में हर वर्ष गर्मी के दौरान पानी का संकट रहता है, तो गर्मी शुरू होने से पहले वैकल्पिक व्यवस्था तैयार होनी चाहिए। यदि किसी सड़क पर हर मानसून जलभराव होता है, तो बारिश से पहले जल निकासी की समस्या का स्थायी समाधान किया जाना चाहिए। इसी तरह सर्दी शुरू होने से पहले ही बेघर और जरूरतमंद लोगों के लिए आश्रय स्थलों की व्यवस्था हो जानी चाहिए।
भारत मौसम विज्ञान विभाग सहित विभिन्न संस्थाएं लगातार मौसम संबंधी पूर्वानुमान और चेतावनियां जारी करती हैं। लेकिन चेतावनी तभी सार्थक है, जब उसके आधार पर समय रहते कार्रवाई भी हो। अत्यधिक गर्मी की संभावना हो तो अस्पतालों, पेयजल केंद्रों और सार्वजनिक स्थलों को तैयार किया जाए। भारी बारिश की चेतावनी हो तो नालियों की सफाई, जल निकासी पंप, राहत दल और आवश्यक संसाधन पहले से तैयार रहें। शीतलहर की संभावना पर रैन बसेरों, कंबल और स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था पहले ही सुनिश्चित की जाए।
गर्मी के दिनों में प्रशासन की ओर से लोगों को अधिक पानी पीने, धूप से बचने और दोपहर में बाहर न निकलने की सलाह दी जाती है। यह जरूरी है, लेकिन उन लोगों के लिए पर्याप्त नहीं है जो रोजी-रोटी के लिए खुले में काम करने को मजबूर हैं। निर्माण श्रमिक, रिक्शा चालक, ठेला विक्रेता, डिलीवरी कर्मचारी, सड़क कर्मी और खेतिहर मजदूर गर्मी से बचने के लिए घर में नहीं रह सकते। उनके लिए काम के समय में बदलाव, छायादार स्थान, पीने के पानी और प्राथमिक चिकित्सा जैसी व्यवस्थाएं पहले से होनी चाहिए।
इसी तरह गर्मियों में पानी की समस्या वाले क्षेत्रों में मानसून या गर्मी के चरम पर टैंकर भेजना स्थायी समाधान नहीं है। प्रशासन के पास पहले से ऐसे क्षेत्रों की जानकारी होती है। वहां वैकल्पिक जल स्रोत, पाइपलाइन व्यवस्था, टैंकरों की उपलब्धता और नियमित जलापूर्ति की योजना पहले ही बनाई जा सकती है। हर वर्ष एक ही समस्या का दोहराना और हर बार संकट के बाद समाधान तलाशना प्रशासनिक तैयारी की कमी को दर्शाता है।
सर्दियों में भी यही स्थिति दिखाई देती है। ठंड बढ़ने के बाद रैन बसेरे खोजने और कंबल बांटने के बजाय ठंड शुरू होने से पहले ही सभी तैयारियां पूरी होनी चाहिए। फुटपाथ पर रहने वाले लोग, मजदूर, वृद्ध और गरीब परिवार सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनके लिए सुरक्षित, स्वच्छ और पर्याप्त रैन बसेरे, गर्म कपड़े, कंबल तथा आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से उपलब्ध कराई जानी चाहिए। केवल रैन बसेरे खोल देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वहां पानी, शौचालय, रोशनी, सुरक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाएं मौजूद हों।
बारिश प्रशासनिक तैयारी की सबसे बड़ी परीक्षा
मानसून प्रशासनिक तैयारियों की सबसे बड़ी परीक्षा होता है। हर वर्ष बारिश से पहले नालियों की सफाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन पहली तेज बारिश में अनेक शहरों की सड़कें जलमग्न हो जाती हैं। यातायात बाधित होता है, बिजली आपूर्ति प्रभावित होती है और निचले इलाकों में घरों तथा दुकानों तक पानी पहुंच जाता है।
भारी बारिश को रोका नहीं जा सकता, लेकिन शहरों को जलभराव से बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं। नालियों की समय पर सफाई, जल निकासी की क्षमता बढ़ाना, प्राकृतिक जलमार्गों को सुरक्षित रखना, संवेदनशील क्षेत्रों में पंप की व्यवस्था और कमजोर पुलों-सड़कों की जांच जैसे कार्य मानसून से काफी पहले पूरे किए जा सकते हैं।
हर जलभराव को केवल प्राकृतिक आपदा मान लेना उचित नहीं होगा। यदि नाली कूड़े से भरी है, पानी के निकास का रास्ता बंद है या प्राकृतिक जलमार्ग पर अनियोजित निर्माण हुआ है, तो इसके पीछे प्रशासनिक और नागरिक दोनों स्तरों की जिम्मेदारी हो सकती है। जिस स्थान पर हर वर्ष जलभराव होता है, वहां स्थायी समाधान तलाशना जरूरी है। जनता को बार-बार उसी समस्या का सामना करने के लिए छोड़ देना सुशासन की पहचान नहीं हो सकता।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी पूर्व तैयारी उतनी ही आवश्यक है। भारी बारिश से सड़क संपर्क टूट सकता है, नदियों और नालों का जलस्तर बढ़ सकता है तथा बिजली और संचार सेवाएं बाधित हो सकती हैं। संवेदनशील गांवों और क्षेत्रों की पहले से पहचान होनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की कार्ययोजना तैयार रहनी चाहिए। स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायतों को स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि आपात स्थिति में किसकी क्या जिम्मेदारी होगी।
विभागों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी
मौसम संबंधी तैयारी किसी एक अधिकारी या विभाग की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। नगर निकाय, स्वास्थ्य विभाग, जलकल विभाग, बिजली विभाग, लोक निर्माण विभाग, पुलिस, अग्निशमन और आपदा प्रबंधन से जुड़े विभागों को मिलकर काम करना होगा। प्रत्येक विभाग की जिम्मेदारी और समय-सीमा पहले से तय होनी चाहिए और काम पूरा होने के बाद उसकी वास्तविक स्थिति की जांच भी होनी चाहिए।
हर जिले में मौसम शुरू होने से पहले एक सरल तैयारी सूची बनाई जा सकती है। उसमें गर्मी, बारिश और सर्दी से पहले किए जाने वाले कार्यों को स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए। अधिकारियों को केवल कागजी रिपोर्ट पर निर्भर रहने के बजाय मौके पर जाकर स्थिति की जांच करनी चाहिए। यदि नाले की सफाई का दावा किया गया है तो यह भी देखा जाए कि नाला वास्तव में साफ है या नहीं। यदि रैन बसेरा तैयार है तो वहां मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं।
तकनीक भी पूर्व आपदा प्रबंधन को प्रभावी बना सकती है। मौसम संबंधी चेतावनियां मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल माध्यमों से लोगों तक पहुंचाई जा सकती हैं। लेकिन संदेश केवल इतना नहीं होना चाहिए कि भारी बारिश या गर्मी की संभावना है। लोगों को यह भी बताया जाना चाहिए कि किन क्षेत्रों से बचना है, क्या सावधानी बरतनी है और जरूरत पड़ने पर सहायता कहां उपलब्ध होगी। स्थानीय भाषा में सरल और स्पष्ट संदेश अधिक प्रभावी साबित होंगे।
जनता और मीडिया की भी भूमिका
आपदा से पहले की तैयारी में जनता की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। लोगों को नालियों में कूड़ा नहीं डालना चाहिए, पानी की बर्बादी रोकनी चाहिए और प्रशासन की चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए। लेकिन नागरिकों से जिम्मेदारी की अपेक्षा करने से पहले प्रशासन को भी अपनी जिम्मेदारियां पूरी करनी होंगी।
मीडिया और नागरिक समाज को भी केवल आपदा के बाद तस्वीरें और समस्याएं सामने लाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि बारिश से पहले नालियों की सफाई क्यों नहीं हुई, जलभराव वाले क्षेत्रों की पहचान पहले क्यों नहीं की गई, गर्मी से प्रभावित इलाकों में वैकल्पिक जल व्यवस्था क्यों नहीं बनी और सर्दी शुरू होने से पहले रैन बसेरों की तैयारी क्यों नहीं हुई।
प्रशासन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि आपदा आने के बाद राहत कितनी तेजी से पहुंचाई गई। वास्तविक सफलता यह है कि आपदा आने से पहले कितना नुकसान रोका गया। समय पर साफ किया गया नाला, पहले से दुरुस्त किया गया कमजोर पुल, सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया जरूरतमंद परिवार या संकटग्रस्त क्षेत्र में पहले से उपलब्ध कराया गया पेयजल—ये छोटे कदम आपदा के समय बड़े नुकसान को रोक सकते हैं।
भारत को अब ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता है जो मौसम के अनुरूप पहले से तैयार रहे। गर्मी से पहले गर्मी की तैयारी, बारिश से पहले बारिश की तैयारी और सर्दी से पहले सर्दी की तैयारी होनी चाहिए। संकट आने के बाद भाग-दौड़ करने के बजाय कई सप्ताह और कई महीने पहले कार्ययोजना लागू की जानी चाहिए। इससे सरकारी संसाधनों की बचत होगी, जनता की परेशानी घटेगी और प्रशासन पर विश्वास बढ़ेगा।
प्रकृति को रोका नहीं जा सकता। गर्मी आएगी, बारिश होगी और सर्दी पड़ेगी। लेकिन प्राकृतिक घटनाओं के प्रभाव को प्रशासनिक लापरवाही से और गंभीर बनाना उचित नहीं है। यदि खतरे का अनुमान पहले से है तो तैयारी भी पहले से होनी चाहिए। जनता को हर मौसम में प्रकृति और व्यवस्था, दोनों से अकेले संघर्ष करने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।
अब समय है कि प्रशासन अपनी कार्यशैली में बदलाव करे। आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना जरूरी है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है आपदा आने से पहले नुकसान को रोकने की तैयारी करना। यही जिम्मेदार शासन, सुशासन और जनता के प्रति वास्तविक जवाबदेही की पहचान है।
