अब सिडनी में पाकिस्तानी आतंक का क्रूर साया
(मनोज कुमार अग्रवाल – विनायक फीचर्स)
भारत के पहलगाम की तर्ज पर ऑस्ट्रेलिया में हुए भयावह आतंकी हमले से एक बार फिर पूरी दुनिया सन्न रह गई है। सिडनी के बोंडी बीच पर यहूदी पर्व हनुक्का के दौरान दो आतंकियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाईं, जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में एक 10 वर्षीय बच्ची भी शामिल है, जबकि लगभग 50 लोग घायल बताए जा रहे हैं। खुशियां मना रहे लोगों पर जिस बेरहमी से गोलियां चलाई गईं, उसने पहलगाम आतंकी हमले की खौफनाक यादें ताजा कर दीं।
बोंडी बीच पर हमले के वीडियो सामने आए हैं, जिनमें आतंकी बेखौफ होकर गोलीबारी करते दिख रहे हैं। जिस अंदाज से इस हमले को अंजाम दिया गया, उससे स्पष्ट है कि आतंकियों के पास न केवल अत्याधुनिक हथियार थे, बल्कि उन्हें इन्हें चलाने का बाकायदा प्रशिक्षण भी मिला हुआ था। पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि गोलीबारी के बाद पास की एक सड़क पर खड़ी कार से कई इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) बरामद किए गए। इससे साफ है कि साजिश और भी बड़े पैमाने पर तबाही मचाने की थी।
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जानकारों का मानना है कि आतंकियों का मंसूबा कहीं अधिक खून-खराबा करने का था, जो समय रहते विफल हो गया। एक आतंकी पुलिस की गोली से घटनास्थल पर ही मारा गया, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल है। पुलिस के अनुसार दोनों आतंकी बाप-बेटे थे, जिनके नाम साजिद और नवीद अकरम बताए गए हैं। खबर है कि दोनों मूल रूप से पाकिस्तान के रहने वाले थे।
भारत के बाद अब ऑस्ट्रेलिया में हुए इस हमले में भी पाकिस्तान का नाम सामने आने से प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ की सरकार और सेना प्रमुख असीम मुनीर की मुश्किलें बढ़नी तय हैं। इस घटना में अब ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ इज़रायल भी सीधे तौर पर जुड़ गया है, क्योंकि हमला यहूदी समुदाय को निशाना बनाकर किया गया।

यहूदी समुदाय पर हुए इस आतंकी हमले को लेकर इज़रायल की तीखी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। ऑस्ट्रेलियाई पुलिस ने भी इसे स्पष्ट रूप से यहूदी-विरोधी आतंकवादी हमला करार दिया है। सरकार ने स्वीकार किया है कि देश में यहूदी-विरोधी माहौल बन रहा है। बोंडी बीच इलाका ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े यहूदी बहुल क्षेत्रों में से एक है, जहां लगभग 40,000 यहूदी रहते हैं। हनुक्का उत्सव के पहले दिन आयोजित समुद्र-तटीय कार्यक्रम में करीब 1,000 लोग मौजूद थे। जाहिर है, आतंकियों ने सोच-समझकर ऐसा समय चुना, जब ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा सके।
शांति और आनंद के माहौल में त्योहार मना रहे लोगों से आखिर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन नस्ल और धर्म आधारित नफरत के शैतान हमेशा इंसानियत का कत्ल कर अपनी खूनी प्यास बुझाते रहे हैं। यह हमला पहलगाम की पुनरावृत्ति जैसा प्रतीत होता है। पहलगाम में आतंकी छुट्टियां मना रहे पर्यटकों को निशाना बना रहे थे, वहीं बोंडी बीच पर भी लोग अवकाश का आनंद ले रहे थे। पहलगाम में धर्म पूछकर गोलियां चलाई गईं, जबकि बोंडी बीच पर पहले से ज्ञात था कि यहां यहूदी समुदाय हनुक्का पर्व मना रहा है—इसलिए अंधाधुंध फायरिंग की गई।
ऑस्ट्रेलियाई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार एक हमलावर का नाम नवीद अकरम है, जिसे पाकिस्तानी मूल का बताया जा रहा है। यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। ऑस्ट्रेलिया को आमतौर पर एक शांत और सुरक्षित देश माना जाता रहा है, लेकिन पिछले तीन दशकों में प्रवासन नीति में दिखाई गई अत्यधिक उदारता के दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं। श्रमशक्ति की जरूरत के चलते ऑस्ट्रेलियाई सरकारों ने पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, बांग्लादेश, सीरिया और लीबिया जैसे देशों के नागरिकों के लिए दरवाजे खोले। यह नीति अपने आप में गलत नहीं थी, लेकिन जिन लोगों को प्रवेश दिया गया, उनकी पृष्ठभूमि की गहन जांच जरूरी थी।
ऑस्ट्रेलिया में कई इलाके ऐसे हैं, जहां पाकिस्तानी आबादी बड़ी संख्या में रहती है। स्थानीय लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि इनमें से कुछ लोग असंतोष फैलाते हैं, अधिक अधिकारों की मांग करते हैं, नियम-कानूनों की अनदेखी करते हैं और अपनी मर्जी थोपने की कोशिश करते हैं। स्थानीय नागरिक लंबे समय से यह चिंता जता रहे हैं कि देश में कट्टरपंथ बढ़ता जा रहा है, लेकिन सरकार गंभीर नहीं दिखती।
बोंडी बीच हमले के बाद यदि जांच एजेंसियों को इसके पीछे कोई संगठित पाकिस्तानी नेटवर्क मिलता है, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान में यहूदियों के प्रति गहरी घृणा फैलाई जाती रही है। वहां के कट्टरपंथी उपदेशक खुलेआम यहूदियों के खिलाफ जहर उगलते हैं। दुर्भाग्यवश, ऐसी मानसिकता भारत में भी लंबे समय तक देखी गई है।
जब बोंडी बीच हमले की खबरें पाकिस्तानी चैनलों के सोशल मीडिया पेजों पर प्रसारित हुईं, तो कई पाकिस्तानी नागरिकों ने टिप्पणियों में खुशी जताई। कुछ ने इसे गाजा, फिलिस्तीन, लेबनान और ईरान से जोड़कर सही ठहराने की कोशिश की। आम नागरिकों की हत्या पर कोई कैसे खुश हो सकता है? यही मानसिकता पहलगाम हमले के बाद भी देखने को मिली थी।
ऑस्ट्रेलियाई एजेंसियों को सच्चाई स्वीकार करनी होगी। देश सुरक्षित रहेगा, तभी लोकतंत्र और नागरिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे। सरकार को कट्टरपंथ के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे। पाकिस्तान जैसे देशों, जहां कट्टरपंथ गहराई से जड़ें जमा चुका है, वहां के नागरिकों को वीज़ा और नागरिकता देने में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। सोशल मीडिया गतिविधियों को गंभीरता से जांचा जाए और जो व्यक्ति ऑस्ट्रेलिया में रहकर उसके कानून, संस्कृति और मूल्यों का सम्मान नहीं करता, उसे वापस भेजने की ठोस व्यवस्था हो।
ऑस्ट्रेलिया के पास अपनी पुरानी गलतियों को सुधारने का अवसर है। यूरोप के कई देशों ने अति-उदारवाद दिखाकर गंभीर समस्याएं मोल ले ली हैं और अब वे कानूनों की जटिलताओं के कारण चाहकर भी ठोस कार्रवाई नहीं कर पा रहे। वोटबैंक की राजनीति भी इसमें बड़ी बाधा है।
भारत लंबे समय तक कट्टरपंथी आतंकवाद का दंश झेल चुका है। कश्मीर में जिस तरह एक ही रात में मस्जिदों से ऐलान कर हिंदुओं को पलायन के लिए मजबूर किया गया, वह इसी तथाकथित सेकुलर उदार सोच का भयावह परिणाम था। ऐसी घटनाएं स्थानीय समाज में आक्रोश पैदा करती हैं और भविष्य में गंभीर टकराव का कारण बन सकती हैं।
ऑस्ट्रेलिया समेत यूरोपीय देशों में जिस तरह कुछ कट्टरपंथी समुदाय उदार नीतियों का दुरुपयोग कर सुनियोजित तरीके से अपनी जड़ें जमा रहे हैं, वह भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। हाल ही में फ्रांस ने भी कट्टरपंथी हिंसा का सामना किया है। अब दुनिया को अपनी नीतियों और सोच की समीक्षा करनी होगी, ताकि कोई भी ताकत जनसांख्यिकी बदलने और कट्टरपंथी विचारधारा थोपने के षड्यंत्र में सफल न हो सके।पाकिस्तान का चरित्र एक बार फिर दुनिया के सामने उजागर हुआ है। उसके आतंकी तत्व वैश्विक स्तर पर खून-खराबे को अंजाम दे रहे हैं। अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस सच्चाई से आंखें नहीं मूंदनी चाहिए।
