स्वच्छता में नंबर वन का ‘अमृत’ और नरक का ड्रेनेज

The number one in sanitation is 'Amrit' and the drainage of hell
 
The number one in sanitation is 'Amrit' and the drainage of hell

(विवेक रंजन श्रीवास्तव — विभूति फीचर्स)  इंदौर में इन दिनों गजब का द्वंद्व चल रहा है। एक तरफ आसमान से टपकती स्वच्छता में ‘नंबर वन’ की ट्रॉफियाँ हैं और दूसरी तरफ ज़मीन फाड़कर बाहर आता भागीरथपुरा का सच। प्रशासन ने अपनी चिर-परिचित फुर्ती दिखाते हुए कुछ अधिकारियों का स्थानांतरण कर दिया है। वाह! क्या गजब का इलाज है—जैसे किसी का अपेंडिक्स फट गया हो और डॉक्टर उसका बिस्तर बदल दे। साहब यहाँ से वहाँ हुए नहीं कि सिस्टम का पाप धुल गया! सुना है, नए साहब के आते ही पुरानी पाइपलाइन ने शर्म के मारे ज़हर उगलना बंद कर दिया है।

भागीरथपुरा—नाम कितना पवित्र है। महाराज भगीरथ ने गंगा लाने के लिए अंगूठे पर खड़े होकर तपस्या की थी ताकि पूर्वजों को तार सकें। पर हमारे आधुनिक भगीरथों (इंजीनियरों) ने पाइपलाइन बिछाते समय ऐसी तपस्या की कि अमृत योजना की नली को सीधे ड्रेनेज की नाली से कनेक्ट कर दिया। अब पुरखे तरें न तरें, मोहल्ले वाले सीधे इस लोक को छोड़ मोक्ष की यात्रा पर निकल पड़े। यह सरकारी मोक्ष है—बस फर्क इतना कि यह यमराज नहीं, नगर निगम द्वारा स्पॉन्सर्ड है।

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इस पूरी त्रासदी के पीछे जो महान कलाकार छिपा है, वह है सरकारी ठेकेदार। यह वह प्रजाति है जो लोहे के पाइप को कागज़ की तरह मोड़ सकती है और कंक्रीट में इतनी रेत मिला सकती है कि रेगिस्तान भी शर्मा जाए। ठेकेदार साहब का गणित साफ है—
“ऊपर की सड़क ऐसी बनाओ कि मुख्यमंत्री का काफ़िला निकले तो झटका न लगे,और नीचे पाइप ऐसा डालो कि अगली बारिश तक गायब हो जाए।”

टेंडर की मलाई और कमीशन के खेल में पाइपलाइन की मोटाई इतनी कम रह गई कि सीवेज के कीड़ों ने उसे डोरस्टेप डिलीवरी का रास्ता समझ लिया। ठेकेदार के लिए ‘अमृत’ वह प्रसाद है जो फाइल पास होने के बाद मिलता है; जनता का गला सूखे या सड़े—उसके बैंक बैलेंस का फ्लो नहीं रुकना चाहिए।

शहर का चेहरा इतना चमकीला है कि आप अपनी शक्ल डिवाइडर पर देख लें। दीवारों पर नाचते मोर, स्वच्छता के गान गाती गाड़ियाँ, हर खंभे पर मुस्कराते नेताओं के पोस्टर। पर इस चमक-धमक के नीचे शहर क्या पाल रहा है, यह तब पता चलता है जब अस्पतालों में बेड कम पड़ जाते हैं। मोहल्ला राजनीति का भी अपना स्वैग है—“हमारे भाईसाहब” का वोट बैंक बना रहे, इसलिए पाइपलाइन चाहे गटर से निकले या शौचालय के नीचे से, बस नल चलता रहे। पार्षद जी की चिंता पानी में बैक्टीरिया की नहीं, उद्घाटन-पट्ट पर नाम की फॉन्ट-साइज़ की होती है। चुनावी गणित में शुद्ध पेयजल से ज़्यादा ज़रूरी मुफ़्त का टैंकर है—ताकि संकट में मसीहा बना जा सके।

जब जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँचा, नेताओं ने अचूक ब्रह्मास्त्र निकाला—स्थानांतरण। कलेक्टर साहब हटे, कमिश्नर साहब विदा। जनता दुख भूलकर खुश! उसे लगा न्याय हो गया। अरे भाई, साहब बदल गए—पर वह सड़ा हुआ सिस्टम और वह लीकेज वाली पाइपलाइन तो वहीं है, जो पिछले दस सालों से ड्रेनेज को चूम रही है। यह वही कहानी है—इंजन खराब है और आप ड्राइवर बदल रहे हैं। राजनेता जानते हैं कि पब्लिक की याददाश्त और पानी का स्वाद—दोनों जल्दी बदल जाते हैं।

समाधान किसी फाइल या तबादले में नहीं, बल्कि इस स्मार्ट चश्मे को उतारने में है। मजबूर जनता जीने के लिए अपने घरों में यूरेका के असरदार वाटर फ़िल्टर लगा ही लेगी। तब तक बिसलेरी की बोतलों से नहाने का सौभाग्य मिलेगा।असल अमृत तब बरसेगा, जब ड्रेनेज और पेयजल लाइनों के बीच की दूरी कम से कम उतनी कर दी जाएगी,

जितनी एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच नेता और जनता की होती है। बेहतर होगा कि अगली बार स्मार्ट सिटी का तमगा देने से पहले दीवारों के पेंट की जगह पाइपों के प्रेशर की जाँच की जाए। समाधान यह भी है कि जिस ठेकेदार और इंजीनियर ने यह महान जुगलबंदी की है, उन्हें तब तक उसी मोहल्ले का पानी पिलाया जाए, जब तक वे खुद न मान लें कि अमृत योजना में विष का मिश्रण सरकारी गाइडलाइन का हिस्सा नहीं है।

बड़े अधिकारियों के तबादलों के इस सर्कस को बंद कर अगर जवाबदेही को भी नंबर वन बना दिया जाए, तो शायद किसी और भगीरथ को अपने मोहल्ले के पुरखों को तारने के लिए श्मशान न जाना पड़े। वरना याद रखिए—इतिहास सिर्फ आपके रंगे-पुते डिवाइडर नहीं, उन पाइपों को भी लिखेगा जिन्होंने शहर की साख को गटर में बहा दिया।आज इंदौर—कल कोई और शहर। लीकेज का माइलेज अख़बार की इबारत बनता रहेगा, जब तक तकनीकी परियोजनाओं को राजनीति से दूर नहीं रखा जाएगा।

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