श्रद्धांजलि: उर्दू गज़ल के 'आफ़ताब' डॉ. बशीर बद्र का भोपाल में अवसान, थम गया शायरी का एक सुनहरा दौर
अयोध्या की ऐतिहासिक सरज़मीं पर जन्मे और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से उच्च शिक्षा हासिल कर प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं देने वाले डॉ. बशीर बद्र ने ताउम्र शब्दों की अनवरत साधना की। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने भारी-भरकम और क्लिष्ट उर्दू शब्दों के बजाय आम बोलचाल की जुबान को अपनी गज़लों का आभूषण बनाया। यही वजह है कि उनकी लिखी पंक्तियां सीधे रूह में उतर जाती हैं।

ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर सच हुईं उनकी ही पंक्तियां
बशीर बद्र साहब की विदाई के इस गमगीन मौके पर उनके द्वारा बरसों पहले लिखे गए शेर आज हमारी आँखों के आंसुओं और जज्बात को ज़बान दे रहे हैं:
"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।"
आज वाकई बशीर साहब की जिंदगी की शाम हो गई है, लेकिन वे जाते-जाते अदब की दुनिया को अपनी गजलों के ऐसे चिराग सौंप गए हैं, जिनकी रोशनी कभी मद्धम नहीं पड़ेगी। उनका यह सफरनामा हमें उनकी उस कालजयी गज़ल की याद दिलाता है, जिसे फिल्म 'मसान' में भी बेहद शिद्दत के साथ पिरोया गया था:
"मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।"
मानवीय संवेदनाओं और मोहब्बत के अमर हस्ताक्षर: उनके कुछ शाहकार शेर
समाज का दर्द हो, रिश्तों की कशिश हो या फिर इंसानी मिजाज का बदलता दौर, बशीर साहब ने अपनी कलम से हर रंग को मुकम्मल किया। आइए, उनके कुछ बेहद मकबूल शेरों के जरिए उनके फन को नमन करें:
1. आधुनिक समाज और रिश्तों की नाजुकता पर:
"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।"
2. सियासत और बस्तियां जलने के दर्द पर:
"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।"
3. रिश्तों के बिखराव में भी सलीका रखने पर:
"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।"
भोपाल की साहित्यिक त्रिवेणी: दुष्यंत, शरद जोशी और बशीर बद्र
बशीर बद्र साहब ने अपने जीवन के आखिरी तीन दशक मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की आबो-हवा में गुजारे। भोपाल की इस साहित्यिक सरज़मीं की यह तासीर रही है कि इसने शब्दों के कई बड़े सुल्तानों को अपने आंचल में संवारा है। जब हम बशीर बद्र के योगदान को याद करते हैं, तो भोपाल के उन समकालीन दिग्गजों का अक्स स्वतः ही सामने आ जाता है जिन्होंने अपने लेखन से देश की चेतना को जगाया।
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दुष्यंत कुमार: एक तरफ जहाँ दुष्यंत कुमार ने इसी भोपाल की ज़मीन से हिंदी गज़ल को आम आदमी के गुस्से और व्यवस्था के खिलाफ तल्खी का हथियार बनाया और कहा कि— 'सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए'।
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शरद जोशी: दूसरी तरफ शरद जोशी ने अपने तीखे और बेबाक व्यंग्य से सत्ता और समाज की विसंगतियों को आईना दिखाया।
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बशीर बद्र: जहाँ दुष्यंत की गज़ल में इंकलाब की तड़प थी और शरद जोशी के लेखन में अचूक तंज था, वहीं बशीर बद्र ने इस त्रिवेणी में अपनी मखमली, रूमानी और सीधे दिल को छू लेने वाली गज़लियत का रंग घोला था। इन तीन महारथियों की उपस्थिति ने भोपाल को अदब का एक ऐसा वैश्विक केंद्र बना दिया, जिसकी चमक हमेशा बरकरार रहेगी।
अंतहीन सफर पर 'अमर' शायर
बशीर साहब के जाने से भोपाल की साहित्यिक विरासत का एक विशाल स्तंभ ढह गया है। वे केवल पन्नों पर लिखे जाने वाले रचनाकार नहीं थे, बल्कि मुशायरों की जान और महफिलों की धड़कन थे। उनका काव्य हिंदी और उर्दू की साझी तहजीब (गंगा-जमुनी संस्कृति) का ऐसा अनमोल दस्तावेज है, जो आने वाली पीढ़ियों के दिलों को आपस में जोड़ने का काम करता रहेगा।
कहा जाता है कि रचनाकार कभी मरते नहीं, वे अपनी रचनाओं के जरिए कायनात के हर जर्रे में हमेशा के लिए विलीन हो जाते हैं। बशीर साहब भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन दुष्यंत और शरद जोशी की तरह वे भी अपने कालजयी शब्दों के जरिए भोपाल की फिजाओं और यहाँ के बड़े तालाब की लहरों में हमेशा के लिए रचे-बसे रहेंगे। उर्दू अदब के इस बेताज बादशाह को भावभीनी और कोटि-कोटि श्रद्धांजलि।
