बसंत पंचमी पर बाबा वैद्यनाथ धाम में निभाई जाती है तिलकहरुवा की अनूठी परंपरा

On Basant Panchami, a unique tradition of Tilakharuwa is observed at Baba Vaidyanath Dham.
 
बसंत पंचमी पर बाबा वैद्यनाथ धाम में निभाई जाती है तिलकहरुवा की अनूठी परंपरा

(कुमार कृष्णन – विनायक फीचर्स)  झारखंड के देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम में बसंत पंचमी का पर्व विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। इस दिन न केवल मां सरस्वती की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है, बल्कि भगवान भोलेनाथ को विवाह पूर्व तिलक अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाती है। यह परंपरा देश में अपने आप में अनोखी मानी जाती है।

मान्यता के अनुसार, भगवान शिव का विवाह महाशिवरात्रि को माता पार्वती से हुआ था। विवाह से पूर्व होने वाली रस्मों के अंतर्गत बसंत पंचमी के दिन बाबा वैद्यनाथ का तिलक किया जाता है। जैसे सनातन परंपरा में विवाह से पहले वर का तिलक होता है, उसी भाव के साथ देवघर में भगवान शिव को दूल्हे के रूप में तिलक चढ़ाया जाता है।

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मिथिलांचल की परंपरा से जुड़ा तिलकहरुवा संस्कार

बसंत पंचमी के दिन मिथिलांचल क्षेत्र के श्रद्धालु सदियों पुरानी ‘तिलकहरुवा’ परंपरा का निर्वहन करते हैं। लोक मान्यता है कि माता पार्वती पर्वतराज हिमालय की पुत्री थीं और मिथिला क्षेत्र हिमालय की तराई में स्थित है। इसी कारण मिथिलावासी भगवान शिव को अपना दामाद और स्वयं को उनका साला मानते हैं। इसी भाव से लाखों श्रद्धालु देवघर पहुंचकर बाबा भोलेनाथ को तिलक अर्पित करते हैं।

बिहार और नेपाल के मिथिलांचल क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रद्धालु देसी घी के मालपुए बनाकर लाते हैं और उन्हें बाबा को अर्पित करते हैं। श्रृंगार के दौरान शिवलिंग पर अबीर, नए धान की बालियां और आम के मंजर चढ़ाए जाते हैं। यह विशेष श्रृंगार परंपरा करीब डेढ़ महीने तक हरिहर मिलन तक जारी रहती है।

शिव-पार्वती विवाह की पहली रस्म का साक्षी बनता है देवघर

बसंत पंचमी के दिन बाबा वैद्यनाथ धाम को शिव-पार्वती विवाह की पहली रस्म का साक्षी माना जाता है। इस अवसर पर महिला श्रद्धालु पारंपरिक विधि से भगवान शिव को तिलक लगाकर बारात लाने का प्रतीकात्मक निमंत्रण देती हैं। इसी दिन मां सरस्वती की पूजा भी वैदिक विधि से की जाती है और गर्भगृह में शिवलिंग को बेलपत्र व पुष्पों से भव्य रूप से सजाया जाता है। मान्यता है कि यह परंपरा त्रेतायुग से चली आ रही है।

तिलक-अभिषेक के बाद पूरा देवघर अबीर-गुलाल की भक्ति मस्ती में रंग जाता है और श्रद्धालु उल्लासपूर्वक इस पर्व को मनाते हैं।

वैद्यनाथ धाम: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक अद्वितीय स्थान

बाबा वैद्यनाथ धाम का उल्लेख शिवपुराण में मिलता है। यह भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसे ‘वैद्यनाथ चिताभूमि’ के नाम से वर्णित किया गया है। मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सती का हृदय गिरा था और यहीं उनका दाह-संस्कार हुआ था। माता सती के वियोग में भगवान शिव ने इसी भस्म से अपने शरीर को विभूषित किया, इसलिए यहां भस्म का विशेष धार्मिक महत्व है।

श्रद्धालुओं को यहां प्रसाद के रूप में भस्म प्रदान की जाती है। मान्यता है कि इसे ललाट पर धारण करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। तीर्थपुरोहितों के अनुसार, सावन और भादो मास में यज्ञ से प्राप्त भस्म विशेष रूप से यजमानों को दी जाती है।

रावणेश्वर वैद्यनाथ और मनोकामना लिंग की कथा

बाबा वैद्यनाथ के प्रादुर्भाव की कथा भी अत्यंत रोचक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, असुरराज रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की और अपने नौ सिर शिवलिंग पर अर्पित कर दिए। जब वह दसवां सिर चढ़ाने को तत्पर हुआ, तब भगवान शिव प्रकट हुए और उसे वरदान दिया। रावण की इच्छा पर शिवलिंग को लंका ले जाने की अनुमति दी गई, किंतु मार्ग में शिवलिंग पृथ्वी पर रखे जाने के कारण वह वहीं स्थिर हो गया। यही शिवलिंग आगे चलकर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

रावण द्वारा स्थापित होने के कारण इसे ‘रावणेश्वर वैद्यनाथ’ भी कहा जाता है। शुद्ध मन से की गई पूजा से बाबा शीघ्र प्रसन्न होते हैं, इसी कारण यह मनोकामना लिंग के नाम से भी प्रसिद्ध है।

सरल पूजा, अपार आस्था

बाबा वैद्यनाथ की पूजा अत्यंत सरल मानी जाती है। उत्तरवाहिनी गंगा जल, बेलपत्र और पुष्प अर्पित करने मात्र से भगवान शिव भक्तों की कामनाएं पूर्ण करते हैं। यही कारण है कि श्रावण मास में देश-विदेश से लाखों कांवरिए देवघर पहुंचते हैं।

देवघर का शाब्दिक अर्थ ‘देवताओं का घर’ है। प्राचीन ग्रंथों में इसे हृदयपीठ, रावण वन, हरितिकी वन और वैद्यनाथ जैसे नामों से भी जाना गया है। यह स्थान तांत्रिक साधना के लिए भी विशेष महत्व रखता है और कामाख्या के बाद प्रमुख साधना स्थलों में गिना जाता है।

मां सरस्वती का मंदिर भी है विशेष आकर्षण

बाबा वैद्यनाथ मंदिर परिसर में 22 देवी-देवताओं के अलग-अलग मंदिर स्थित हैं, जिनमें मां सरस्वती का मंदिर भी शामिल है। यहां ओझा परिवार द्वारा मंदिर स्टेट की ओर से मां सरस्वती की पूजा की जाती है। बसंत पंचमी पर यह मंदिर विशेष श्रद्धा और आस्था का केंद्र बन जाता है।

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