मकर संक्रांति पर आस्था, स्मृति और जीवनदायिनी बेतवा नदी में डुबकी
(पवन वर्मा – विनायक फीचर्स) मकर संक्रांति भारतीय जीवन परंपरा का ऐसा पर्व है, जो सूर्य के उत्तरायण होने के साथ प्रकृति, जल और जीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव भी जाग्रत करता है। नदियों में स्नान की परंपरा केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रकृति से आत्मीय जुड़ाव का प्रतीक है। मेरे जीवन में मकर संक्रांति का अर्थ सदैव पुण्यसलिला माँ बेतवा में डुबकी रहा है—एक ऐसी डुबकी, जिसमें श्रद्धा, स्मृतियाँ और जीवन-मूल्य एक साथ प्रवाहित होते हैं।
मैंने बचपन से देखा और गहराई से महसूस किया कि मेरे पूज्य पिताजी श्री दिनेश चंद्र वर्मा की माँ बेतवा में अपार आस्था थी। वे मन से बेतवा को विदिशा की जीवनदायिनी माँ मानते थे। उनके लिए बेतवा केवल जलधारा नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक विरासत और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत थी। वे प्रायः कहा करते थे—“नगर तभी जीवित रहता है, जब उसकी नदी जीवित रहती है।”
बेतवा तट पर स्थित चरण तीर्थ, जहाँ भगवान श्रीराम के चरण विराजमान हैं, उनके लिए विशेष श्रद्धा का केंद्र था। इसी प्रकार त्रिवेणी पर स्थित वह विलक्षण मंदिर—जहाँ भगवान राम और लक्ष्मण तो हैं, किंतु माँ सीता नहीं—उन्हें भारतीय धार्मिक परंपरा की अद्भुत विविधता का प्रतीक प्रतीत होता था। संभवतः यह देश का एकमात्र ऐसा मंदिर है, और पिताजी इसे केवल आस्था नहीं, बल्कि गहन चिंतन का स्थल मानते थे। इसके साथ ही बड़ वाले घाट पर खुले में विराजमान भगवान गणेश और सरिए वाले हनुमानजी में भी उनकी गहरी श्रद्धा थी, जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा सौंदर्य है।

मकर संक्रांति के दिन वे प्रायः प्रातःकाल ही बड़ वाले घाट पहुँच जाते और मुझे भी अपने साथ ले जाते। ठंडी हवा, हल्का कोहरा और उगते सूर्य की सुनहरी किरणों के बीच माँ बेतवा में स्नान करना एक अविस्मरणीय अनुभूति होती थी। वर्ष 2000 तक यह क्रम निरंतर चलता रहा। पिताजी तैरते हुए नदी के भीतर कुछ दूर तक चले जाते, मानो माँ बेतवा से मौन संवाद कर रहे हों। वह दृश्य आज भी स्मृतियों में उतना ही जीवंत है।
माँ बेतवा के प्रति उनकी आस्था केवल भावनात्मक नहीं थी, बल्कि लेखन और सार्वजनिक चेतना के रूप में भी अभिव्यक्त होती थी। उन्होंने बेतवा से जुड़े विषयों पर निरंतर, निर्भीक और तथ्यपरक लेखन किया। नदी की धार्मिक महत्ता, सांस्कृतिक पहचान और उसके संरक्षण की आवश्यकता को वे समाज और प्रशासन के समक्ष बार-बार उठाते रहे। देश की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित उनके लेख ‘बिन सीता के राम’ और ‘चरण तीर्थ’ बेतवा तट की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विशिष्टता को गंभीरता से प्रस्तुत करते हैं।
जब बेतवा में जहरीला और दूषित पानी छोड़े जाने का मामला सामने आया, तो उन्होंने सोम डिस्टलरी के विरुद्ध खुलकर कलम उठाई। उनके इसी निर्भीक लेखन के कारण विदिशा के तत्कालीन कलेक्टरों से कई बार उनका टकराव हुआ, किंतु उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। जो अधिकारी प्रशासनिक उदासीनता के कारण बेतवा को क्षति पहुँचने देते थे, उनकी जिम्मेदारी उजागर करने में वे कभी नहीं हिचके। उनके लिए यह संघर्ष व्यक्तिगत नहीं, बल्कि माँ बेतवा के प्रति कर्तव्य था।
आज जब मकर संक्रांति आती है और मैं माँ बेतवा के तट पर खड़ा होता हूँ, तो यह केवल स्नान का अवसर नहीं रह जाता। यह स्मृतियों में उतरने और संकल्प लेने का क्षण बन जाता है। पिताजी की आस्था, उनका साहस और उनका निर्भीक लेखन—सब कुछ मानो आज भी बेतवा की लहरों में प्रवाहित हो रहा हो।
माँ बेतवा केवल एक नदी नहीं, बल्कि संस्कृति, संघर्ष और संकल्प की अविरल धारा है। मकर संक्रांति पर उसमें ली गई डुबकी मुझे यह स्मरण कराती है कि नदियों को बचाना केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और अपने भविष्य—दोनों की रक्षा है। यही मेरे पिताजी की सच्ची विरासत है।
