मिनरल वाटर के नाम पर खुली लूट
Open loot in the name of mineral water
Mon, 1 Sep 2025
(सुभाष आनंद – विनायक फीचर्स)
कुछ वर्षों पहले तक भारत में मिनरल वाटर को सिर्फ अमीर और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग ही इस्तेमाल करते थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। आज मिनरल वाटर का प्रयोग हर वर्ग – गरीब से अमीर और आम से खास – तक फैल चुका है।
अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार मिनरल वाटर वह पानी है, जिसे प्राकृतिक स्रोत से निकालकर सीधे बोतलों में भरा जाता है। सामान्यत: इसमें किसी अतिरिक्त रासायनिक प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती। केवल कुछ मामलों में इसमें मौजूद आयरन या सल्फर को हटाने के लिए छानना पड़ता है। शुद्धिकरण के लिए अल्ट्रावायलेट किरणों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इसकी प्राकृतिक संरचना से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाती।

1996 में अमेरिकी और यूरोपीय मानकों के आधार पर मिनरल वाटर को कई श्रेणियों में बांटा गया।
हल्की श्रेणी: प्रति लीटर 500 मिलीग्राम तक घुलनशील खनिज।
मध्यम श्रेणी: 500 से 1500 मिलीग्राम तक खनिज।
उच्च श्रेणी: 1500 से 2000 मिलीग्राम तक खनिज।
लेकिन भारत में "मिनरल वाटर" शब्द का जमकर दुरुपयोग हो रहा है। ज़्यादातर कंपनियां बोतलबंद साधारण पानी पर "मिनरल वाटर" का लेबल लगाकर उपभोक्ताओं से मनमाना दाम वसूल रही हैं। सेवानिवृत्त खाद्य कंट्रोलर कंवलप्रीत सिंह के अनुसार, देश में बिकने वाला पानी असली मिनरल वाटर न होकर प्रोसेस्ड या संशोधित पानी है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि असली मिनरल वाटर में खनिजों का अनुपात उस भूगर्भीय संरचना पर निर्भर करता है, जहां से पानी गुजरता है। उदाहरण के लिए – चूना पत्थर से होकर बहने वाला पानी कैल्शियम से भरपूर होता है, जबकि डोलोमाइट से होकर आने वाले पानी में मैग्नीशियम की मात्रा अधिक मिलती है। कई बार मिनरल वाटर में फ्लोराइड की मात्रा भी पाई जाती है, जो दांतों के लिए हानिकारक साबित हो सकती है।
दरअसल, खनिजों का अनुपात ही पानी के स्वाद को बदलता है। बिना खनिज वाला पानी बेस्वाद होता है, जबकि खनिज युक्त पानी का स्वाद अलग-अलग होता है। यही कारण है कि अलग-अलग जगहों का पानी अलग स्वाद देता है।
भारत में बोतलबंद पानी के नाम पर उपभोक्ताओं को बड़े पैमाने पर गुमराह किया जा रहा है। सड़कों और गाड़ियों में बिकने वाली पानी की बोतलों में अकसर खाली बोतलों को दोबारा भरकर बेच दिया जाता है। बड़े जारों में मिलने वाले पानी की शुद्धता भी संदिग्ध है। कई जगह पानी में जाले, बदबू और गंदगी पाई जाती है। कई बार जार या कैम्परों की सफाई हफ्तों तक नहीं की जाती, जिससे पानी दूषित हो जाता है।
दुर्भाग्य से स्वास्थ्य विभाग इस दिशा में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा पा रहा है। नतीजा यह है कि लोगों को खुलेआम अशुद्ध पानी बेचा जा रहा है। इस स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को पहले से कहीं ज्यादा सतर्क और सक्रिय होने की आवश्यकता है।
