ओपिनियन: राजनीति की डिक्शनरी से विलोपित होता विपक्ष; स्व-विनाश के कल्पवृक्ष और आत्मघाती रणनीतियों का चरम

Opinion: The Opposition Vanishing from the Dictionary of Politics; The Zenith of Self-Destructive Tendencies and Suicidal Strategies.
 
ओपिनियन: राजनीति की डिक्शनरी से विलोपित होता विपक्ष; स्व-विनाश के कल्पवृक्ष और आत्मघाती रणनीतियों का चरम

लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव (विभूति फीचर्स)

संपादकीय डेस्क (18 जून 2026):

शब्दकोशों की धूल फांकती पुरानी पांडुलिपियों में 'विपक्ष' नाम का एक शब्द अब भी जीवित है। इसे कभी लोकतंत्र का सजग प्रहरी कहा जाता था, जो आज के दौर में एक नितांत भ्रम प्रतीत होता है। यथार्थ तो यह है कि अब राजनीति में विपक्ष का अर्थ बदल चुका है—अब इसका मतलब है, अनायास ही स्व-विनाश का कल्पवृक्ष बनना।

भारतीय राजनीति ने इस नए अर्थ को इतनी शिद्दत और कलात्मकता से जिया है कि अब डिक्शनरी से इस शब्द को ससम्मान विलोपित कर देना ही जनहित में जान पड़ता है। जो दल स्वयं को राजनीतिक रूप से नुकसान पहुँचाने में ही अपना पुरुषार्थ समझता हो, उसे 'विपक्ष' कहना शब्द-ब्रह्म का अपमान है; उन्हें तो आत्मघाती श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए।

बिखराव नहीं, यह तो इच्छा-मृत्यु का सौंदर्यपूर्ण मॉडल है

भारतीय राजनीति की हालिया टूटन किसी सर्कस के उस मयूर-नृत्य जैसी है, जिसमें पक्षी अपने पंख फैलाने की जगह खुद के ही पर नोचने में व्यस्त हो। विपक्ष का यह बिखराव कोई त्रासदी नहीं है, बल्कि यह इच्छा-मृत्यु का एक नवाचारी और सौंदर्यपूर्ण मॉडल है। यह एक ऐसा अद्भुत आत्मघाती तालमेल है, जहाँ हर घटक दल इस होड़ में लगा है कि कौन सबसे पहले इतिहास के कूड़ेदान में अपनी जगह सुरक्षित करता है।

नेताओं की भूमिका: 'सेल्फ-गोल' की कठिन तपस्या

इस स्व-विनाश यज्ञ में मुख्य नेताओं की भूमिका किसी दूरदर्शी मंत्र-द्रष्टा की भांति है, फर्क सिर्फ इतना है कि उनके हर ब्रह्मास्त्र का निशाना उनके अपने ही पाँव होते हैं। उनकी इस 'सेल्फ-गोल' करने की प्रवृत्ति को यदि हम राजनीतिक योग की संज्ञा दें, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।

  • अस्तित्व के शून्य की ओर: जिस प्रकार प्राचीन तपस्वी अपनी देह को विस्मृत कर शून्य में लीन होने की चेष्टा करते थे, वैसे ही शीर्ष नेतृत्व अपनी पार्टी को अस्तित्व के शून्य में विलीन करने की कठिन तपस्या में जुटा है। उनके एक-एक वक्तव्य के बाद पार्टी का ग्राफ जिस तरह पाताल-लोक की गुफाओं में अन्वेषण करता है, वह किसी दैवीय करिश्मे से कम नहीं लगता।

  • वाणी के यज्ञ में अपनों की ही समिधा: कुछ विशिष्ट नेताओं का तो कहना ही क्या! ये वे विलोमभाषी ऋषि हैं जो अपनी वाणी के यज्ञ में विपक्ष की ही समिधाएं डाल देते हैं। जब भी पार्टी को संजीवनी की अपेक्षा होती है, तब-तब ये महामहिम अपनी वाक्-पटुता से अपनी ही लंका दहन कर देते हैं। ये ऐसे तीरंदाज हैं जो लक्ष्य की ओर देखते हैं, प्रत्यंचा खींचते हैं, लेकिन तीर को अपनी ही छाती में उतारने का अनूठा आनंद लेते हैं। वे अखबारों के लिए सिर्फ फ्रंट पेज का मैटेरियल बनकर रह गए हैं।

क्षेत्रीय राजनीति की उलट-बांसी: बंगाल और आम आदमी का हाल

इधर बंगाल की राजनीति तो उलट-बांसी का चरमोत्कर्ष पेश करती है। वहाँ विपक्ष का होना एक ऐसा अघोषित संन्यास है, जहाँ विरोध करने का अर्थ स्वयं के राजनीतिक अंत्येष्टि संस्कार की तैयारी करना है। बंगाल का विपक्ष आजकल लुका-छिपी के उस खेल में संलग्न है, जिसमें वे खुद को ही नहीं ढूंढ पा रहे।वहाँ की राजनीति उस चित्रकार की भांति है, जो श्वेत कैनवस पर अपना अस्तित्व उकेरना चाहता है, किंतु अंत में केवल काली स्याही से अपना ही नाम काट देता है। वहाँ का विपक्ष सत्ता के विरुद्ध खड़ा तो होता है, पर सूरज ढलते-ढलते वह स्वयं सत्ता के अवसान गान की प्रार्थना सभा में मुख्य अतिथि बन जाता है। यह राजनीतिक रूपांतरण का वह विरल दृश्य है, जहाँ विपक्ष की इल्ली सत्ता के फूल पर बैठते ही तितली बनने के बजाय गायब हो जाती है। दूसरी तरफ, कुछ दलों का सर्वपांग विलय इस तरह हो रहा है जैसे मक्खन निकाल कर बिलाए हुए मठे (मट्ठा) में फिर से उसी मक्खन को मिला दिया जाए।

: यह राजनीति नहीं, राजनीतिक सती-प्रथा है

अब समय आ गया है कि हम शब्दों के इस बोझ को हल्का करें। शब्दकोश में 'विपक्ष' के स्थान पर 'स्वयं-विनाशक' शब्द को जगह मिलनी चाहिए। जो दल सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के बजाय, अपनी ही पार्टी की नींव की ईंटें निकाल-निकाल कर अपने ही घर पर बरसाने में निपुण हो, उसे विपक्ष कहना व्याकरण का स्पष्ट उल्लंघन है।

वे जो कर रहे हैं, वह राजनीति नहीं, बल्कि एक प्रकार की राजनीतिक सती-प्रथा है, जहाँ वे अपनी ही पार्टी की चिता पर शान से बिराजे हैं। बस फर्क इतना है कि यहाँ अग्नि प्रज्वलित करने के लिए किसी बाहरी शत्रु की आवश्यकता नहीं है; उनके स्वयं के अमूल्य वचन और आत्मघाती रणनीतियां ही इसके लिए पर्याप्त हैं। आने वाली पीढ़ियां जब इतिहास में 'विपक्ष' शब्द का अर्थ ढूंढेंगी, तो उन्हें कोई ठोस परिभाषा नहीं मिलेगी, बस एक लंबी हंसी सुनाई देगी।

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