ओवैसी के बयानों से मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल, बांग्लादेश संकट और चीन की भूमिका पर बढ़ी बहस
आज हम बात करने वाले हैं AIMIM चीफ और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी के उन बयानों की, जिन्होंने एक बार फिर मोदी सरकार की विदेश नीति पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला सिर्फ राजनीति का नहीं है, बल्कि भारत की सुरक्षा, पड़ोसी देशों की स्थिरता और चीन जैसी ताकतवर शक्ति की चालों से जुड़ा हुआ है।
दरअसल, 2025 के आखिरी महीनों में बांग्लादेश की situation लगातार बिगड़ती जा रही है। देश में political instability बढ़ रही है और हिंसा की घटनाओं ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। खासतौर पर अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों की खबरें सामने आने के बाद भारत में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। इसी बीच चीन ने भारत-पाकिस्तान तनाव में खुद को Mediator बताने का दावा कर दिया, जिस पर ओवैसी भड़क उठे। इस वीडियो में हम ओवैसी के बयान, बांग्लादेश की मौजूदा हालत, ऑपरेशन सिंदूर का कनेक्शन और भारत सरकार के रुख—सब कुछ detail से समझेंगे।
सबसे पहले बात करते हैं बांग्लादेश की। साल 2025 में बांग्लादेश गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। सरकार में instability, सड़कों पर विरोध प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था की कमजोर situation ने हालात को और बिगाड़ दिया है। इसी माहौल में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा की खबरें सामने आईं। कई इलाकों में तनाव, आगजनी और हमलों की घटनाओं ने भारत को अलर्ट कर दिया है। क्योंकि बांग्लादेश सिर्फ हमारा पड़ोसी देश नहीं है, बल्कि उसकी स्थिति का सीधा असर भारत के नॉर्थ-ईस्ट राज्यों—असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम—पर पड़ता है।
असदुद्दीन ओवैसी ने इसी मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की स्थिरता भारत की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है, खासकर नॉर्थ-ईस्ट के लिहाज़ से। ओवैसी का कहना है कि बांग्लादेश के साथ मजबूत और भरोसेमंद रिश्ते बनाए रखना मोदी सरकार के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती बन चुका है। उन्होंने इशारों-इशारों में शेख हसीना के कार्यकाल का ज़िक्र किया, जब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते बेहतर थे और दोनों देशों ने मिलकर कई मुद्दों पर काम किया था। लेकिन मौजूदा हालात में भारत को ज्यादा सतर्क और सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत है, वरना हालात बिगड़ने पर शरणार्थी संकट और सुरक्षा समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।
अब आते हैं उस मुद्दे पर, जिस पर ओवैसी सबसे ज्यादा नाराज़ दिखे—चीन का मध्यस्थता दावा। चीन के विदेश मंत्री ने हाल ही में दावा किया कि 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने में चीन ने भूमिका निभाई। यह दावा उस वक्त आया, जब भारत और पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिंदूर के बाद हालात पहले से ही संवेदनशील थे। चीन का कहना था कि उसने दोनों देशों के बीच बातचीत और शांति प्रक्रिया में मदद की।
ओवैसी ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि पहले अमेरिका और अब चीन—दोनों भारत-पाक मुद्दे में मध्यस्थ बनने का दावा कर रहे हैं, जो भारत की संप्रभुता और विदेश नीति का अपमान है। ओवैसी ने साफ कहा कि चीन, जो पाकिस्तान को हथियार और खुफिया जानकारी देता है, वह खुद को न्यूट्रल मध्यस्थ कैसे बता सकता है। उनका आरोप है कि चीन भारत और पाकिस्तान को एक ही स्तर पर रखकर दक्षिण एशिया में अपनी धाक जमाना चाहता है। उन्होंने मोदी सरकार से सवाल पूछा कि क्या प्रधानमंत्री की चीन यात्रा के दौरान इस तरह की किसी भूमिका पर सहमति बनी थी।
इस पूरे विवाद पर भारत सरकार ने भी प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा कि भारत पहले भी ऐसे दावों को खारिज कर चुका है और आज भी उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट है—भारत-पाकिस्तान मामलों में किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की जाएगी। सरकार के इस बयान से ओवैसी की मांग तो पूरी होती दिखी, लेकिन उनका कहना है कि सिर्फ बयान देना काफी नहीं है, बल्कि भारत को और सख्त और स्पष्ट संदेश देना चाहिए।
दोस्तों, कुल मिलाकर ओवैसी के ये बयान इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भारत की विदेश नीति आज कितनी जटिल और चुनौतीपूर्ण हो गई है। एक तरफ बांग्लादेश की अस्थिरता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा है, तो दूसरी तरफ चीन जैसे देश भारत की रणनीतिक सीमाओं को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। अब सवाल आपसे है—क्या ओवैसी की चिंताएं जायज़ हैं? क्या मोदी सरकार को इस पूरे मामले में और कड़ा रुख अपनाना चाहिए?
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