“कर्ज मांगते हुए शर्म आती है”: शहबाज़ शरीफ का बयान और पाकिस्तान की सत्ता की असली तस्वीर
दोस्तों, क्या आपने कभी सोचा है कि कोई देश का प्रधानमंत्री खुले मंच से ये कबूल करे कि उसे कर्ज मांगते हुए शर्म आती है?
आमतौर पर नेता आर्थिक हालात पर गोल-मोल बातें करते हैं, आंकड़ों में खेलते हैं, या पिछली सरकारों को दोष दे देते हैं। लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने जो कहा, वो चौंकाने वाला भी है और सोचने पर मजबूर करने वाला भी। उन्होंने न सिर्फ कर्ज मांगने की मजबूरी मानी, बल्कि ये भी स्वीकार किया कि जब वो और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर दुनिया भर में पैसे मांगने जाते हैं, तो उन्हें शर्म आती है। आज के इस वीडियो में हम इसी बयान के पीछे की राजनीति, अर्थव्यवस्था और असली पावर गेम को समझने की कोशिश करेंगे।
ये बयान इस्लामाबाद में एक मीटिंग के दौरान आया, जहां शहबाज़ शरीफ निर्यातकों और बिज़नेसमैन से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा, “जब हम दुनिया भर में पैसे की भीख मांगते फिरते हैं, तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। कर्ज हमारे आत्मसम्मान पर बोझ है। वे हमसे जो भी काम करवाना चाहते हैं, हम मना नहीं कर पाते।”
दोस्तों, ये शब्द सिर्फ एक प्रधानमंत्री के नहीं हैं, ये पाकिस्तान की मौजूदा हालत की कबूलनामा हैं। खास बात ये है कि उन्होंने अपने साथ सेना प्रमुख का नाम लिया — और यहीं से इस बयान का राजनीतिक मतलब शुरू होता है।
असल में, शहबाज़ शरीफ ने बिना सीधे कहे ये बता दिया कि पाकिस्तान में असली ताकत किसके पास है। कर्ज की बातचीत हो, आईएमएफ से डील हो, या विदेशी देशों को भरोसा दिलाना हो — हर जगह सेना की मौजूदगी जरूरी मानी जाती है। नागरिक सरकार सिर्फ चेहरा है, जबकि गारंटी सेना देती है। यही वजह है कि पाकिस्तान में चाहे इमरान खान हों या नवाज़ शरीफ, सत्ता के असली सूत्र हमेशा वर्दी के हाथ में रहे हैं।
अब अगर आर्थिक हालात देखें, तो तस्वीर और भी गंभीर है। मार्च 2025 तक पाकिस्तान का कुल सार्वजनिक कर्ज 76,000 अरब रुपये से ज़्यादा हो चुका है — जो पिछले चार सालों में लगभग दोगुना हो गया। देश इस वक्त आईएमएफ के 23वें प्रोग्राम में फंसा हुआ है। नया कर्ज इसलिए नहीं लिया जा रहा कि विकास होगा, बल्कि इसलिए कि पुराने कर्ज का ब्याज चुकाया जा सके। ये एक ऐसा चक्र है जिससे निकलना हर साल और मुश्किल होता जा रहा है।
पाकिस्तान ने दशकों तक अपनी भू-राजनीतिक अहमियत बेचकर पैसा कमाया — कभी शीत युद्ध में, कभी आतंकवाद के खिलाफ जंग में। लेकिन अब दुनिया बदल चुकी है। “रणनीतिक साझेदारी” का वो दौर खत्म हो रहा है। इसके बावजूद, पाकिस्तान की सरकारें सुधार करने के बजाय सेना की छाया में सुरक्षित रहना पसंद करती हैं। शहबाज़ शरीफ ने चीन, सऊदी अरब, यूएई और कतर को “हर मौसम के दोस्त” कहा। चीन ने अरबों डॉलर की जमा राशि बढ़ाई, CPEC में भारी निवेश किया। सऊदी और यूएई ने भी अरबों डॉलर की मदद दी। लेकिन सवाल ये है — क्या ये मदद पाकिस्तान को आत्मनिर्भर बना रही है, या सिर्फ सिस्टम को ज़िंदा रख रही है?
इस संकट का सबसे बड़ा बोझ आम जनता पर पड़ा है। आज पाकिस्तान की लगभग 45% आबादी गरीबी रेखा के नीचे जी रही है। 2018 में ये आंकड़ा आधा भी नहीं था। 2022 की बाढ़, महंगाई और बेरोज़गारी ने हालात और बिगाड़ दिए। 80 लाख से ज़्यादा लोग बेरोज़गार हैं। पढ़े-लिखे युवा सड़कों पर हैं। लेकिन राजनीति का खेल ऐसा है कि जमींदारों, बड़े व्यापारियों और रिटेल सेक्टर पर टैक्स लगाने की हिम्मत कोई नहीं करता, क्योंकि ये वोट बैंक हैं। सेना का बजट छूना तो जैसे पाप माना जाता है।
सबसे दिलचस्प और contradictory बात ये है कि पाकिस्तान कथित तौर पर विदेशी लॉबिंग और अंतरराष्ट्रीय “इमेज बिल्डिंग” पर करोड़ों खर्च करता है। एक तरफ देश आईएमएफ से कर्ज मांग रहा है, दूसरी तरफ global forums पर सीट पाने के लिए भारी रकम उड़ाई जा रही है। ये दिखाता है कि priorities जनता नहीं, बल्कि सत्ता की धारणा हैं।
तो सवाल ये है — क्या शहबाज़ शरीफ की ये “शर्म” किसी बदलाव की शुरुआत है? या ये भी बस एक भावनात्मक बयान है, जो कुछ दिनों में भुला दिया जाएगा? इतिहास बताता है कि जब तक सेना राजनीति से पीछे नहीं हटती, टैक्स सुधार नहीं होते, और निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था पर ईमानदारी से काम नहीं होता — तब तक ऐसे बयान सिर्फ सुर्खियां बनते रहेंगे।
दोस्तों, पाकिस्तान की कहानी हमें ये सिखाती है कि आर्थिक आज़ादी के बिना राजनीतिक आज़ादी सिर्फ एक भ्रम है। अब आपकी राय क्या है? क्या ये बयान सिस्टम को बदल पाएगा, या ये भी एक और राजनीतिक ड्रामा है?
