पाकिस्तान के लिए बढ़ता जल संकट: भारत और अफगानिस्तान से दोहरा दबाव
"बूंद-बूंद पानी को तरसेगा पाकिस्तान! भारत ने रोका सिंधु का पानी, अब तालिबान ने भी लिया बड़ा फैसला!" जी हां, दोस्तों, पाकिस्तान पहले से ही पानी के संकट से जूझ रहा है, और अब दो तरफ से मुसीबत बढ़ गई है। एक तरफ भारत ने सिंधु जल संधि को सस्पेंड कर दिया है, और दूसरी तरफ अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने कुनार नदी का पानी मोड़ने का प्लान आगे बढ़ा दिया है। चलिए, पूरी डिटेल्स में समझते हैं कि क्या हो रहा है और पाकिस्तान पर इसका क्या असर पड़ेगा।
सबसे पहले बात करते हैं भारत की। साल 2025 में अप्रैल महीने में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में एक भयानक आतंकी हमला हुआ था, जिसमें 26 मासूम tourist की जान गई थी। भारत ने इस हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया और बदले में बड़ा कदम उठाया – सिंधु जल संधि को अनिश्चितकाल के लिए सस्पेंड कर दिया। ये 1960 की वो संधि है जो सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के पानी को भारत और पाकिस्तान के बीच बांटती थी। इस संधि के तहत पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों – सिंधु, झेलम और चिनाब का ज्यादातर पानी मिलता था, जो उसके कृषि का 80% और बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा चलाते हैं।अब संधि सस्पेंड होने के बाद भारत ने डेटा शेयरिंग बंद कर दी है, फ्लड वार्निंग नहीं दे रहा, और नए प्रोजेक्ट्स पर कोई पाबंदी नहीं है। भारत अब चिनाब, झेलम और सिंधु पर नए डैम बना सकता है, पानी स्टोर कर सकता है या डायवर्ट कर सकता है।
हालांकि तुरंत पूरा पानी रोकना मुश्किल है क्योंकि बड़े स्टोरेज की जरूरत है, लेकिन लॉन्ग टर्म में पाकिस्तान की Agriculture, पीने का पानी और बिजली पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। पाकिस्तान ने इसे "एक्ट ऑफ वॉर" तक कहा है, लेकिन भारत का स्टैंड क्लियर है – आतंकवाद और पानी एक साथ नहीं चल सकते।अब आते हैं दूसरी तरफ – अफगानिस्तान पर। तालिबान सरकार ने हाल ही में एक बड़ा फैसला लिया है। दिसंबर 2025 में उनकी इकोनॉमिक कमीशन की टेक्निकल कमिटी ने कुनार नदी का पानी नांगरहार प्रांत के दारुंता डैम की तरफ मोड़ने के प्रस्ताव को अप्रूव कर दिया है और इसे फाइनल अप्रूवल के लिए भेज दिया है। यह प्रोजेक्ट लागू होने पर अफगानिस्तान के नांगरहार में सूखी जमीनों को पानी मिलेगा, कृषि बढ़ेगी, लेकिन पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में पानी का फ्लो बहुत कम हो जाएगा।कुनार नदी करीब 500 किलोमीटर लंबी है। यह पाकिस्तान के चित्राल जिले में हिंदूकुश पहाड़ों से निकलती है, फिर अफगानिस्तान में कुनार और नांगरहार प्रांतों से गुजरती है, काबुल नदी में मिलती है और फिर पाकिस्तान में वापस आकर सिंधु में शामिल हो जाती है।
यह नदी पाकिस्तान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है – सिंचाई, पीने का पानी और हाइड्रोपावर का बड़ा सोर्स। अगर तालिबान डैम बनाकर पानी मोड़ लेगा, तो खैबर पख्तूनख्वा में सूखा जैसे हालात हो सकते हैं, और यह असर पंजाब तक पहुंचेगा क्योंकि काबुल नदी सिंधु में मिलती है।सबसे बड़ी बात – भारत के साथ तो सिंधु जल संधि थी, लेकिन पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच कुनार या काबुल नदी पर कोई वॉटर शेयरिंग एग्रीमेंट नहीं है! मतलब तालिबान को रोकने का कोई लीगल तरीका नहीं है। हाल के दिनों में पाक-अफगान बॉर्डर पर तनाव बढ़ा है, क्लैशेस हुए हैं, सैनिक मारे गए हैं। तालिबान कहता है कि यह उनका इंटरनल डेवलपमेंट है, फूड सिक्योरिटी के लिए, लेकिन पाकिस्तान के लिए यह दूसरा बड़ा झटका है।दोस्तों, सोचिए – एक तरफ भारत से सिंधु का पानी प्रभावित, दूसरी तरफ अफगानिस्तान से कुनार-काबुल का पानी कम। पाकिस्तान पहले से वॉटर क्राइसिस में है, उसकी 80% से ज्यादा कृषि इन नदियों पर निर्भर है। अगर यह दोनों प्रोजेक्ट्स आगे बढ़े, तो पाकिस्तान में सूखा, फसलें बर्बाद, पानी की कमी और इकोनॉमिक क्राइसिस बढ़ सकता है।
कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि कुनार डैम से फ्लो 16% तक कम हो सकता है। पाकिस्तान अब दो मोर्चों पर पानी की लड़ाई लड़ रहा है। यह स्थिति दक्षिण एशिया में वॉटर वॉर की तरफ इशारा कर रही है। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर पिघलना और बढ़ती पॉपुलेशन से पानी की डिमांड बढ़ रही है। पाकिस्तान के लिए यह बहुत गंभीर है, और रीजनल टेंशन बढ़ सकता है।दोस्तों, आप क्या सोचते हैं? क्या पाकिस्तान इस डबल वॉटर क्राइसिस से निकल पाएगा? कमेंट में बताएं।
