पर्यूषण महापर्व 2025 (20 से 27 अगस्त) आत्मोन्नति और जीवन-जागरण का पर्व

Paryushan Mahaparva 2025 (20 to 27 August) A festival of self-improvement and life-awakening
 
पर्यूषण’ का शाब्दिक अर्थ है – अपने भीतर ठहरना, आत्मा के समीप होना और आत्मा में निवास करना। इस वर्ष यह पर्व 20 से 27 अगस्त 2025 तक मनाया जा रहा है। इन आठ दिनों के दौरान जैन अनुयायी अपने तन-मन को साधना, उपवास और तप से शुद्ध करते हैं। यह अवसर उन्हें बीते हुए पापों का परिमार्जन करने और भविष्य के लिए संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।  पर्यूषण महापर्व केवल किसी विशेष मौसम या परंपरा से जुड़ा उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को शुद्ध और पवित्र बनाने वाला वातावरण निर्मित करता है। यह पर्व जैन समाज तक सीमित न होकर संपूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक है। इसमें आत्मा की उपासना के माध्यम से जीवन को शांतिपूर्ण, स्वस्थ और अहिंसामय बनाने का संदेश निहित है। यही कारण है कि इसे आध्यात्मिक उत्थान और मोक्ष की ओर अग्रसर होने का उत्सव कहा जाता है।  जैन धर्म की त्यागप्रधान संस्कृति में इस पर्व का विशेष महत्व है। जप, तप, ध्यान, आराधना और चिंतन से न केवल मन और आत्मा पवित्र होते हैं, बल्कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य भी स्पष्ट होता है। पर्यूषण हमें आलस्य और प्रमाद की निद्रा से जगाकर अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है।  पर्यूषण का एक गहरा अर्थ है – कर्मों का क्षय। जब तक कर्म-बंधन समाप्त नहीं होता, आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित नहीं हो सकती। इस दृष्टि से पर्यूषण आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित होने की प्रेरणा देता है।  वास्तव में, यह पर्व आत्म-शुद्धि, आत्म-जागरण और जीवन को सार्थक बनाने का एक दिव्य अवसर है।
जैन धर्म में पर्यूषण महापर्व का स्थान अत्यंत विशेष और अद्वितीय है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में उतरने, आत्ममंथन और आत्मशुद्धि का अनुपम अवसर है। जैन संस्कृति ने सदियों से इस पर्व को आत्मकल्याण, तप और साधना का महापथ बनाया है।

पर्यूषण’ का शाब्दिक अर्थ है – अपने भीतर ठहरना, आत्मा के समीप होना और आत्मा में निवास करना। इस वर्ष यह पर्व 20 से 27 अगस्त 2025 तक मनाया जा रहा है। इन आठ दिनों के दौरान जैन अनुयायी अपने तन-मन को साधना, उपवास और तप से शुद्ध करते हैं। यह अवसर उन्हें बीते हुए पापों का परिमार्जन करने और भविष्य के लिए संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

पर्यूषण महापर्व केवल किसी विशेष मौसम या परंपरा से जुड़ा उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को शुद्ध और पवित्र बनाने वाला वातावरण निर्मित करता है। यह पर्व जैन समाज तक सीमित न होकर संपूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक है। इसमें आत्मा की उपासना के माध्यम से जीवन को शांतिपूर्ण, स्वस्थ और अहिंसामय बनाने का संदेश निहित है। यही कारण है कि इसे आध्यात्मिक उत्थान और मोक्ष की ओर अग्रसर होने का उत्सव कहा जाता है।
जैन धर्म की त्यागप्रधान संस्कृति में इस पर्व का विशेष महत्व है। जप, तप, ध्यान, आराधना और चिंतन से न केवल मन और आत्मा पवित्र होते हैं, बल्कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य भी स्पष्ट होता है। पर्यूषण हमें आलस्य और प्रमाद की निद्रा से जगाकर अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है।
पर्यूषण का एक गहरा अर्थ है – कर्मों का क्षय। जब तक कर्म-बंधन समाप्त नहीं होता, आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित नहीं हो सकती। इस दृष्टि से पर्यूषण आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित होने की प्रेरणा देता है।
वास्तव में, यह पर्व आत्म-शुद्धि, आत्म-जागरण और जीवन को सार्थक बनाने का एक दिव्य अवसर है।

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