राजनीतिक शुचिता और कानून का सदुपयोग
Political correctness and the application of law
Fri, 2 Jan 2026
डॉ. सुधाकर आशावादी (विनायक फीचर्स)
सत्ता यदि चाहे तो वह असंभव को भी संभव कर सकती है। चाहे तो भू-माफियाओं के साम्राज्य को चंद मिनटों में ध्वस्त कर दे, और भ्रष्ट कार्यपालिका के अधिकारियों व कर्मचारियों को मात्र दो या पाँच हजार रुपये की रिश्वत लेते ही जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा दे। लेकिन यदि सत्ता न चाहे, तो वही सत्ता लाखों रुपये का कमीशन खाकर सरकार को बदनाम करने वाले भ्रष्टाचार के अजगरों को देखकर भी आँखें मूँद लेती है। वस्तुतः प्रश्न केवल राजनीतिक शुचिता और कानून के निष्पक्ष सदुपयोग के संकल्प का है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के इंदिरा नगर क्षेत्र में सेना के मेजर बिपिन चंद्र भट्ट के उत्तराधिकारियों ने स्वप्न में भी यह कल्पना नहीं की होगी कि उनके पिता के निधन के लगभग बत्तीस वर्ष बाद किसी मुख्यमंत्री के कठोर और संवेदनशील रुख के चलते उनका मकान दबंग संपत्ति माफिया से मुक्त होकर उन्हें वापस मिल जाएगा। किंतु यह हुआ—मुख्यमंत्री से शिकायत किए जाने के चौबीस घंटे के भीतर ही कार्रवाई पूरी कर दी गई। सुशासन का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है? यह घटना केवल एक उदाहरण नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति से संचालित शासन की जीवंत मिसाल है।
आज उत्तर प्रदेश में भूमाफियाओं और अराजक तत्वों में मुख्यमंत्री का स्पष्ट खौफ है। इसे आम नागरिक भी जानता है और कार्यपालिका भी भली-भाँति समझती है, फिर भी अनेक अधिकारी अपनी भ्रष्ट प्रवृत्तियों से बाज नहीं आते। राजस्व विभाग में भूमि की पैमाइश, नाम की त्रुटि सुधार या अन्य प्रक्रियाओं के नाम पर फाइलें वर्षों तक लेखपाल, कानूनगो और उच्चाधिकारियों के बीच भटकती रहती हैं। इनके निस्तारण को लेकर एक संगठित खेल चलता रहता है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि भ्रष्ट कर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं होती—कार्रवाई होती है, लेकिन वह उदाहरण नहीं बन पाती। नतीजतन, किसी को सबक नहीं मिलता। भ्रष्टाचार के चलते आम आदमी अपने वैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में स्वयं को असहाय महसूस करता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि आम नागरिक की सीधी पहुँच सत्ता के शीर्ष तक नहीं हो पाती। मुख्यमंत्री पोर्टल पर की गई शिकायतें भी कई बार समयबद्ध समाधान के अभाव में दम तोड़ देती हैं और अधिकारी लीपापोती कर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलते हैं।
यह स्थिति केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है; कमोबेश पूरे देश में यही हाल है। सरकारें अपनी सुदृढ़ छवि बनाए रखने के लिए सजग तो रहती हैं, लेकिन उनके अधीन कुछ भ्रष्ट विधायक और मंत्री प्रशासन को अपने इशारों पर चलाने का प्रयास करते हैं, जिससे जनसमस्याओं के समाधान में अनावश्यक अवरोध उत्पन्न होते हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता बिना किसी दबाव के कठोर और निष्पक्ष निर्णय लेने का साहस दिखाए। एक सेना अधिकारी के परिवार को अपनी ही संपत्ति वापस पाने के लिए तीन दशक तक कितना संघर्ष करना पड़ा होगा, इसका अनुमान वही परिवार लगा सकता है। किंतु यह घटना यह भी सिद्ध करती है कि यदि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों को सत्ता का साथ मिल जाए, तो न्याय मिलना सुनिश्चित हो जाता है। राजनीतिक शुचिता और कानून का ईमानदार सदुपयोग ही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली पहचान है।
