प्राकृतिक आपदाओं पर राजनीति
Tue, 9 Sep 2025
(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
प्राकृतिक आपदाएं कभी पूर्व सूचना देकर नहीं आतीं। यदि इनके विनाशकारी प्रभाव का पहले से अनुमान लगाया जा सके, तो बड़ी हद तक नुकसान कम किया जा सकता है। बरसात के मौसम में बाढ़ और जल प्रलय जैसी स्थितियां अकसर देखने को मिलती हैं। प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन इन आपदाओं को और भयावह बना देता है, लेकिन ऐसे समय में सबसे बड़ी आवश्यकता होती है—जनसहयोग और एकजुटता की।

हाल ही में जम्मू–कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में आई बाढ़, बादल फटना और भू-स्खलन जैसी आपदाओं ने सामान्य जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। दुखद पहलू यह है कि संकट की इस घड़ी में भी कुछ लोग राजनीतिक लाभ लेने से नहीं चूके। आरोप-प्रत्यारोप और सत्ता संघर्ष में उलझे नेताओं के व्यवहार से लगता है मानो मानवीय संवेदनाएं पीछे छूट गई हों। यदि उनके भीतर संवेदना होती तो वे पीड़ितों की मदद में जुटते, न कि मंच और मीडिया पर एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा करने में।
पंजाब, जो देश का अन्न भंडार कहलाता है, हमेशा से समृद्ध किसानों और आढ़तियों की उदारता का उदाहरण देता आया है। किसानों ने कई आंदोलनों में अपनी एकजुटता और सेवा भाव दिखाया है—चाहे वह लंगर लगाकर हजारों लोगों का पेट भरना हो या संसाधनों का खुलकर उपयोग करना। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे बाढ़ पीड़ितों की भी हर संभव मदद करेंगे। बावजूद इसके, कुछ राजनीतिक दल उनके योगदान को नजरअंदाज कर केवल केंद्र और राज्य सरकारों पर दोष मढ़ने की राजनीति कर रहे हैं। यह दृष्टिकोण न तो नैतिक है और न ही उचित।
और तो और, कुछ दल तो आपदा के बीच भी धरना, प्रदर्शन और रैली की राजनीति करने से पीछे नहीं हट रहे। यह प्रवृत्ति राष्ट्र को यही संदेश देती है कि राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं में आम नागरिकों की समस्याएं और प्राकृतिक आपदाओं से जूझते लोग कहीं खो गए हैं। यह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि निंदनीय भी।
