जेन अल्फा के सवालों में घिरी मध्यप्रदेश की सत्ता
(पवन वर्मा — विनायक फीचर्स)
मध्यप्रदेश सरकार बड़े निवेश सम्मेलनों, विकास परियोजनाओं और ग्लोबल दावों के जरिए राज्य की बदलती तस्वीर पेश कर रही है। लेकिन इसी बीच राज्य के बच्चों से जुड़े कुछ ऐसे सवाल सामने आए हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। खास बात यह है कि ये सवाल उस पीढ़ी की ओर से उठ रहे हैं, जिसने अभी मतदान का अधिकार भी हासिल नहीं किया है।
जेन अल्फा के बच्चे अब अपनी बुनियादी जरूरतों को लेकर आवाज उठा रहे हैं। छतरपुर के चंदला में स्कूली बच्चों ने स्कूल तक पहुंचने वाली सड़क की समस्या को लेकर मंत्री दिलीप अहिरवार का काफिला रोक दिया। सिरोंज में छात्राएं बढ़े हुए बस किराये के खिलाफ सड़क पर उतरीं, जबकि उज्जैन में छात्राओं ने स्कूल को दूसरी जगह स्थानांतरित किए जाने के विरोध में कलेक्ट्रेट का घेराव किया।
इन घटनाओं की खासियत यह है कि बच्चों की नाराजगी किसी राजनीतिक मुद्दे को लेकर नहीं है। वे सत्ता परिवर्तन की मांग नहीं कर रहे हैं और न ही किसी राजनीतिक दल के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। उनकी मांगें बेहद बुनियादी हैं—स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क, उचित परिवहन और पढ़ाई के अनुकूल स्कूल व्यवस्था।
बच्चों को अपनी बात कहने के लिए सड़क पर क्यों उतरना पड़ा?
चंदला में स्वतंत्रता दिवस के दिन स्कूली बच्चों ने मंत्री दिलीप अहिरवार का काफिला रोककर स्कूल तक पहुंचने वाली सड़क की समस्या बताई। बच्चों की परेशानी सुनने के बाद मंत्री ने सड़क बनवाने का आश्वासन दिया।लेकिन सवाल यह है कि जिस सड़क से बच्चे रोज स्कूल आते-जाते हैं, उसकी स्थिति का पता प्रशासन को पहले क्यों नहीं चला? स्थानीय स्तर पर समस्या का समाधान बच्चों के प्रदर्शन के बाद ही क्यों सामने आया?
सरकार के लिए आश्वासन देना आसान है, लेकिन बच्चों के लिए सड़क बनना जरूरी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चंदला के बच्चों की आवाज वास्तव में व्यवस्था तक पहुंचती है या फिर यह घटना भी आश्वासनों तक सीमित रह जाती है।
सिरोंज में बस किराये का सवाल
विदिशा जिले के सिरोंज में छात्राओं ने निजी बसों का किराया बढ़ाए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया। बताया गया कि किराया 10 रुपये से बढ़ाकर 25 रुपये कर दिया गया था। रोज स्कूल आने-जाने वाले विद्यार्थियों के लिए यह अतिरिक्त खर्च बड़ी परेशानी बन गया।छात्राओं के प्रदर्शन के बाद बस संचालक किराया फिर 10 रुपये करने पर सहमत हुए। इस पूरे घटनाक्रम में यह सवाल भी उठता है कि विद्यार्थियों की परिवहन संबंधी समस्याओं पर प्रशासन की निगरानी कितनी प्रभावी है।
उज्जैन में स्कूल स्थानांतरण का विरोध
उज्जैन में छात्राओं ने स्कूल को दूसरी जगह ले जाने के विरोध में कलेक्ट्रेट पहुंचकर प्रदर्शन किया। छात्राओं की मांग थी कि स्कूल को मौजूदा स्थान पर ही रखा जाए। प्रदर्शन के दौरान कई छात्राएं भावुक भी हुईं। प्रशासन की ओर से लिखित आश्वासन मिलने के बाद प्रदर्शन समाप्त हुआ।उज्जैन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का गृह जिला भी है। इसलिए वहां विद्यार्थियों का अपनी शिक्षा से जुड़े फैसले को लेकर प्रशासन के सामने प्रदर्शन करना राजनीतिक रूप से भी ध्यान खींचता है।राजधानी भोपाल से भी विद्यार्थियों की परिवहन संबंधी परेशानियों को लेकर आवाज उठने की खबरें सामने आती रही हैं। इससे संकेत मिलता है कि समस्या केवल किसी एक जिले या क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
विकास का पहला पैमाना स्कूल तक पहुंचने का रास्ता
मध्यप्रदेश में विकास की तस्वीर बड़े निवेश, उद्योग, सड़क, भवन और आधारभूत ढांचे की परियोजनाओं के माध्यम से प्रस्तुत की जाती है। ये उपलब्धियां अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी गांव या कस्बे के बच्चे के लिए विकास का सबसे पहला अनुभव यही है कि वह बिना परेशानी और सुरक्षित तरीके से स्कूल पहुंच सके।
परिवार के लिए विकास का अर्थ यह भी है कि बच्चे को स्कूल भेजने में परिवहन का खर्च असहनीय न हो। विद्यार्थी के लिए जरूरी है कि प्रशासनिक फैसलों के कारण उसकी पढ़ाई बाधित न हो।यदि इन बुनियादी जरूरतों के लिए बच्चों को प्रदर्शन करना पड़े तो सवाल केवल बच्चों की नाराजगी पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी उठेंगे।
आज के बच्चे, कल के मतदाता
जेन अल्फा की चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पीढ़ी आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। आज उनके पास मताधिकार नहीं है, लेकिन उनके अनुभव लगातार बन रहे हैं।
किसी बच्चे के लिए राजनीति का पहला अनुभव विधानसभा या संसद नहीं होता। उसका पहला अनुभव उसके आसपास की व्यवस्था होती है—स्कूल की सड़क कैसी है, बस कितने रुपये में मिलती है, अधिकारी उसकी बात सुनते हैं या नहीं और स्थानीय जनप्रतिनिधि उसकी समस्या का समाधान करते हैं या नहीं।यही छोटे अनुभव आगे चलकर बड़ी राजनीतिक धारणाओं का आधार बन सकते हैं।
इसलिए इन घटनाओं को केवल बच्चों के प्रदर्शन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह शासन व्यवस्था के लिए एक संदेश भी है।
सरकार के सामने अवसर
सरकार के लिए बेहतर रास्ता यह होगा कि इन घटनाओं को विपक्ष के राजनीतिक प्रदर्शन के रूप में देखने के बजाय शासन की प्रतिक्रिया के संकेत के रूप में देखा जाए।स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं की नियमित समीक्षा होनी चाहिए। विद्यार्थियों के परिवहन की समस्याओं का आकलन होना चाहिए। स्कूलों से जुड़े बड़े प्रशासनिक फैसले लेते समय विद्यार्थियों और अभिभावकों की वास्तविक परेशानियों को समझा जाना चाहिए।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिकायतें प्रदर्शन बनने से पहले हल हों। यही संवेदनशील और प्रभावी प्रशासन की पहचान है।
चंदला में बच्चों ने मंत्री का काफिला रोका, सिरोंज में छात्राओं ने बस किराये के खिलाफ आवाज उठाई और उज्जैन में छात्राओं ने कलेक्ट्रेट का घेराव किया। इन घटनाओं को एक साथ देखें तो साफ है कि नई पीढ़ी अपनी जरूरतों को लेकर सजग हो रही है।
आज ये बच्चे मतदाता नहीं हैं। कल होंगे।
आज सड़क मांगने वाला बच्चा कल मतदान केंद्र पर खड़ा होगा। आज बस किराये का हिसाब पूछने वाली छात्रा भविष्य में सरकार के कामकाज का हिसाब पूछेगी। इसलिए जेन अल्फा की आवाज को हल्के में लेना मध्यप्रदेश सरकार के लिए प्रशासनिक ही नहीं, राजनीतिक स्तर पर भी बड़ी भूल हो सकती है।बच्चों को सड़क पर आने की नौबत जिस व्यवस्था ने पैदा की है, वह व्यवस्था के लिए आईना है। सवाल यह है कि उस आईने में सरकार अपना चेहरा देखकर समय रहते सुधार करती है या नहीं।
