शक्ति केवल आराधना नहीं, लोकमंगल की चेतना है
डॉ. दीपक गोस्वामी – विभूति फीचर्स
भारतीय संस्कृति में शक्ति केवल पूजा-अर्चना का विषय नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली चेतना का प्रतीक है। माँ दुर्गा के हाथों में शस्त्र हैं, लेकिन उनका उद्देश्य हिंसा नहीं, बल्कि अन्याय का प्रतिरोध और धर्म की रक्षा है। माँ अन्नपूर्णा अन्न और पोषण की प्रतीक हैं, माँ सरस्वती ज्ञान एवं विवेक का संदेश देती हैं, जबकि माँ लक्ष्मी समृद्धि और मंगलभाव की प्रेरणा देती हैं। इन सभी स्वरूपों का मूल संदेश एक ही है—जीवन की रक्षा, विवेक का विकास, अन्याय का प्रतिकार और लोककल्याण की स्थापना।
इसी शक्ति-परंपरा में इक्यावन शक्तिपीठों का विशेष स्थान है। श्रद्धालुओं के लिए ये देवी की उपस्थिति और आध्यात्मिक आस्था के पवित्र केंद्र हैं। इनसे जुड़ी सती की कथा प्रेम, आत्मसम्मान, विरह और शिव-शक्ति के शाश्वत संबंध का आध्यात्मिक आख्यान प्रस्तुत करती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव के अपमान से व्यथित होकर सती ने अपने प्राण त्याग दिए। पत्नी के वियोग में भगवान शिव शोकाकुल होकर उनके शरीर को लेकर विचरण करने लगे। सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया। मान्यता है कि उनके अंग या आभूषण जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए।
यह कथा भारतीय पुराण-परंपरा और धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शक्तिपीठों की संख्या और उनकी सूची को लेकर विभिन्न धार्मिक ग्रंथों एवं परंपराओं में अंतर मिलता है। पीठनिर्णय परंपरा में इक्यावन शक्तिपीठों की मान्यता प्रसिद्ध है, जबकि देवीभागवत पुराण में 108 पीठों का उल्लेख मिलता है। इस विविधता से भारतीय धार्मिक परंपरा की व्यापकता और उसकी अनेक धाराओं का परिचय मिलता है।
शक्ति का भूगोल और मानवता का संबंध
हिंगलाज से कामाख्या तक और ज्वालामुखी से कालिका पीठ तक, देवी के विभिन्न स्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप की धार्मिक और सांस्कृतिक स्मृतियों में गहराई से जुड़े हुए हैं। शक्तिपीठों से संबंधित कुछ प्रमुख स्थल आज भारत के बाहर पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में भी स्थित माने जाते हैं। कुछ स्थलों की पहचान और उनके पौराणिक संबंधों को लेकर अलग-अलग मान्यताएँ प्रचलित हैं।
इन तीर्थों का महत्त्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। वे इस बात की भी याद दिलाते हैं कि आस्था, साहित्य, लोककथाएँ और तीर्थयात्राएँ भौगोलिक दूरियों के बावजूद लोगों को साझा सांस्कृतिक स्मृतियों से जोड़ती रही हैं। इस विरासत को समझने का अर्थ राजनीतिक सीमाओं की अनदेखी करना नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों और सांस्कृतिक संवाद के महत्त्व को स्वीकार करना है।
असम के नीलाचल पर्वत पर स्थित कामाख्या मंदिर इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। यह शक्तिपीठ देवी के सृजनात्मक स्वरूप की उपासना के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ आयोजित अंबुबाची पर्व के दौरान देवी के वार्षिक रजस्वला होने की धार्मिक मान्यता से जुड़ी परंपराएँ निभाई जाती हैं।
इस परंपरा को सामाजिक दृष्टि से भी समझने की आवश्यकता है। स्त्री की प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं को अपवित्रता या हीनता से जोड़ना अनुचित है। यदि हम मातृशक्ति के सृजनात्मक स्वरूप का सम्मान करते हैं, तो समाज में मासिक धर्म से संबंधित रूढ़ियों, संकोच और भेदभाव को समाप्त करने के लिए भी आगे आना चाहिए। आस्था का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब वह महिलाओं के सम्मान और गरिमा की रक्षा में सहायक बने।
शक्ति और शिव : सामर्थ्य के साथ विवेक
शाक्त दर्शन में शक्ति को सृजन और क्रियाशीलता का प्रतीक माना गया है, जबकि शिव चेतना और परम तत्त्व के प्रतीक हैं। अनेक शक्तिपीठों में देवी के साथ भैरव की उपस्थिति इस आध्यात्मिक संबंध को रेखांकित करती है।
जीवन में भी केवल सामर्थ्य पर्याप्त नहीं होता। सामर्थ्य के साथ विवेक, अधिकार के साथ उत्तरदायित्व और समृद्धि के साथ करुणा का होना आवश्यक है। जिस समाज के पास धन तो हो, लेकिन संवेदना न हो; ज्ञान हो, लेकिन न्याय न हो; धार्मिक अनुष्ठान हों, लेकिन निर्बलों के प्रति जिम्मेदारी न हो, उसे अपनी साधना के उद्देश्य पर विचार करना चाहिए।
शक्ति की उपासना का अर्थ केवल देवी के सामने शीश झुकाना नहीं, बल्कि अन्याय के सामने निर्भीक होकर खड़ा होना भी है। अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने के साथ दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना और अपने सामर्थ्य का उपयोग जनकल्याण के लिए करना ही शक्ति के व्यापक अर्थ को सार्थक बनाता है।
शक्ति-आराधना की असली कसौटी
समाज की संवेदनशीलता का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वह अपने सबसे कमजोर और वंचित व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। वह वृद्ध महिला, जिसे सहारे की जरूरत है; वह विधवा, जिसके सामने आजीविका का संकट है; वह श्रमिक, जिसे उसकी मेहनत का पूरा पारिश्रमिक नहीं मिलता; वह किसान, जो फसल उगाने के बाद भी कर्ज की चिंता से घिरा रहता है; वह बालिका, जिसे शिक्षा के बजाय भेदभाव झेलना पड़ता है; और वह दिव्यांग व्यक्ति, जिसके लिए सामान्य सुविधाओं तक पहुँचना कठिन है—ये सभी हमारी सामाजिक संवेदना की परीक्षा हैं।
नवरात्र में कन्या-पूजन करना तभी अधिक सार्थक होगा, जब हम प्रत्येक बालिका को सुरक्षित वातावरण, सम्मान और शिक्षा का अधिकार दिलाने का प्रयास भी करें। माँ अन्नपूर्णा की आराधना के साथ भूखे व्यक्ति तक भोजन पहुँचाने की जिम्मेदारी निभाएँ। माँ लक्ष्मी की पूजा के साथ जरूरतमंद परिवारों के लिए आजीविका के अवसर बढ़ाने में सहयोग करें। माँ सरस्वती की वंदना के साथ आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की शिक्षा में योगदान दें।
पूजा और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच यही संबंध भारतीय संस्कृति के लोकमंगलकारी स्वरूप को उजागर करता है। धर्म का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन में सद्भाव, सेवा और न्याय की भावना को मजबूत करना भी है।
संकल्प को कर्म में बदलने का समय
शक्ति-आराधना को लोकमंगल से जोड़ने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं।
पहला, भूख और अभाव से लड़ने में सहयोग करें। अपने आसपास जरूरतमंद परिवारों की पहचान कर उन्हें भोजन, रोजगार या आजीविका संबंधी सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास करें। सहायता इस तरह दी जाए कि व्यक्ति की गरिमा और आत्मसम्मान सुरक्षित रहें।
दूसरा, बालिकाओं की शिक्षा और सुरक्षा को प्राथमिकता दें। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों की पढ़ाई में सहयोग करें और उनके लिए सुरक्षित वातावरण बनाने में अपनी भूमिका निभाएँ।
तीसरा, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और भेदभाव का विरोध करें। दहेज, बालविवाह और घरेलू हिंसा जैसी सामाजिक बुराइयों के प्रति मौन रहने के बजाय पीड़ितों को सुरक्षित सहायता और उचित मार्गदर्शन उपलब्ध कराने में मदद करें।
चौथा, श्रम का सम्मान करें। श्रमिकों और कारीगरों को उचित पारिश्रमिक देना, उनके अधिकारों का सम्मान करना और उनके साथ मानवीय व्यवहार करना भी नैतिक आचरण का हिस्सा है।
पाँचवाँ, धार्मिक आयोजनों को जनसुविधाओं से जोड़ें। मंदिरों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में स्वच्छता, पेयजल, दिव्यांगजनों की सुविधा और पर्यावरण संरक्षण की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
छठा, सेवा को सामूहिक अभियान बनाएँ। गाँवों और मोहल्लों में ऐसे सेवा समूह बनाए जा सकते हैं, जो वृद्धजनों, निराश्रितों और जरूरतमंद परिवारों की आवश्यकताओं को समझकर उनकी मदद करें।
ये छोटे-छोटे प्रयास समाज में बड़े बदलाव की नींव बन सकते हैं। इसके लिए हमेशा बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती; कई बार संवेदनशील दृष्टि, समय और सहयोग की भावना ही किसी के जीवन में आशा जगा सकती है।
जब आराधना लोककल्याण का माध्यम बने
माँ दुर्गा से हमें अन्याय का सामना करने का साहस मिले, माँ सरस्वती से विवेक और ज्ञान प्राप्त हो, माँ लक्ष्मी से मिली समृद्धि का उपयोग जनकल्याण में हो और माँ अन्नपूर्णा की प्रेरणा से कोई भूखा न सोए—यही शक्ति-आराधना का व्यापक संदेश है।
शक्ति की सच्ची साधना तब पूर्ण होती है, जब मंदिर में प्रज्वलित दीपक हमारे भीतर संवेदना का प्रकाश जगाए। जब पूजा के साथ सेवा, श्रद्धा के साथ उत्तरदायित्व और भक्ति के साथ न्याय की भावना विकसित हो, तभी आध्यात्मिक चेतना समाज के जीवन में उतरती है।
देवी की आराधना का सर्वोच्च उद्देश्य केवल व्यक्तिगत कल्याण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसका विस्तार समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, निर्बलों को संबल मिले, महिलाओं को सम्मान मिले और जरूरतमंदों को सहारा मिले। यही वह मार्ग है, जहाँ शक्ति केवल उपासना का विषय नहीं रहती, बल्कि लोकमंगल की जीवंत चेतना बन जाती है।

