चिंता करने का नाटक

Pretending to worry
 
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(सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स)

उड़ान भरने के बाद आखिरकार परिंदे को अपने नीड़ में लौटना ही पड़ता है। आसमान उसका स्थायी ठिकाना नहीं होता। थके हुए पंख बहुत देर तक ऊँची उड़ान नहीं भर सकते। साहेब को सबकी चिंता है—परिंदों की भी और उनके लिए दाना-पानी जुटाने वालों की भी। इसलिए उन्होंने सलाह दी कि उड़ान सीमित रखो, चाहे वह देश की हो या विदेश की। महत्वाकांक्षाओं पर संयम रखो, फिजूलखर्ची कम करो और बचत की आदत डालो। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत रहेंगे तो मुश्किल समय में देश संभला रहेगा।

एक समय था जब बच्चों को बचपन से बचत का पाठ पढ़ाया जाता था। घरों में मिट्टी की गुल्लकें हुआ करती थीं। जेब खर्च में मिले चवन्नी-अठन्नी से लेकर दस-बीस रुपये तक बच्चे बड़े जतन से बचाकर रखते थे। उन पैसों पर उनका अपना अधिकार होता था। अब दौर बदल गया है। बच्चों का लगाव पैसों से तो है, लेकिन गुल्लक से नहीं। साहेब को इसकी भी चिंता है। वे मन की बात करते हैं और सलाह देने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने कहा कि सोने के प्रति आकर्षण कम करो, विदेशों में डेस्टिनेशन वेडिंग से बचो, क्योंकि इससे देश का पैसा बाहर जाता है। निजी वाहनों का कम उपयोग करो और सार्वजनिक परिवहन अपनाओ।

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कुछ लोगों ने इन बातों को गंभीरता से लिया, तो कुछ ने इसे महज भाषण समझकर टाल दिया। हर परिवार में सभी सदस्य आज्ञाकारी नहीं होते। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें मुखिया की हर बात खटकती है। वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो दिखावे में पूरी निष्ठा दिखाने लगते हैं। महंगी गाड़ियों के काफिले में चलने वाले नेता अचानक साइकिल चलाते नजर आने लगते हैं। कोई ई-रिक्शा में बैठकर वीडियो बनवाता है, तो कोई बरसों बाद सरकारी बस की उस सीट पर बैठता दिखाई देता है, जो अपने वास्तविक यात्री की राह देख रही थी।

साहेब की सलाह पर प्रतिक्रियाएँ भी अलग-अलग रहीं। किसी ने इसे सर आँखों पर रखा तो किसी ने सवाल खड़े कर दिए। आलोचकों ने कहा कि यह “उपदेश कुशल बहुतेरे” वाली स्थिति है—जो खुद बड़े लाव-लश्कर के साथ चलते हैं, वही दूसरों को पेट्रोल बचाने और खर्च कम करने की सीख दे रहे हैं। हर व्यक्ति अपनी सोच के अनुसार ही प्रतिक्रिया देता है।

सच यही है कि सोच ही इंसान को ऊँचाइयों तक पहुँचाती है और वही उसे नकारात्मकता की गहराइयों में भी धकेल देती है। साहेब ने एक सुझाव दिया और कई लोग उसे अमल से ज्यादा प्रदर्शन का माध्यम बना बैठे। सड़कों पर साइकिल, मेट्रो और ई-रिक्शा में वीडियो बनवाने वालों की संख्या बढ़ गई। अच्छा हुआ कि ताँगे अब शहरों से लगभग गायब हो चुके हैं, वरना कुछ लोग वहाँ भी कैमरा लेकर बैठ जाते और सादगी का नया प्रदर्शन शुरू हो जाता। (विनायक फीचर्स)

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