वैश्विक संकट के दौर में प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्र निर्माण का महामंत्र

Prime Minister Modi's mantra for nation-building in times of global crisis
 
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(विवेक रंजन श्रीवास्तव - विभूति फीचर्स)
प्रधानमंत्री द्वारा देश के नाम की गई हालिया अपील केवल एक सरकारी संदेश नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में नागरिक उत्तरदायित्व का एक गहरा मंत्र है। उन्होंने देशवासियों से आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब हर नागरिक को अपने स्तर पर “वित्त मंत्री” की भूमिका निभानी होगी। यह विचार इस मूल सत्य पर आधारित है कि किसी भी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के दैनिक आर्थिक निर्णयों से निर्मित होती है।

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जब हम “वित्त मंत्री” बनने की बात करते हैं, तो उसका अर्थ केवल बचत करना नहीं, बल्कि एक सजग और उत्तरदायी आर्थिक नागरिक बनना है। जिस प्रकार देश का वित्त मंत्री सीमित संसाधनों में विकास की दिशा तय करता है, उसी प्रकार प्रत्येक नागरिक को भी अपने संसाधनों का उपयोग राष्ट्रीय दृष्टिकोण से करना होगा। हमारे द्वारा की गई छोटी-छोटी बचतें जब बैंकिंग व्यवस्था में शामिल होती हैं, तो वे केवल निजी पूंजी नहीं रहतीं, बल्कि देश के विकास कार्यों—सड़क, स्कूल, अस्पताल और आधारभूत संरचना—को गति देने वाली शक्ति बन जाती हैं।
इस विचार का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष “खपत का चरित्र” है। हमारे खरीदने के निर्णय केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं होते, बल्कि वे देश की आर्थिक दिशा तय करते हैं।
जब हम विदेशी वस्तुओं के आकर्षण के बजाय स्वदेशी और स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं, तब हम आर्थिक आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव रखते हैं। एक गृहिणी जब अपने घर के बजट में स्थानीय हस्तशिल्प या ग्रामीण उत्पादों को स्थान देती है, तो वह सीधे किसी कारीगर, बुनकर या छोटे उद्यमी के जीवन में उजाला लाती है। यही छोटे-छोटे आर्थिक निर्णय सामूहिक रूप से आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला बनते हैं।
भोजन में संयम और संसाधनों का संतुलित उपयोग भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा विषय है। उदाहरण के तौर पर, खाद्य तेल की अनावश्यक खपत केवल स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि देश के आयात बिल पर भी प्रभाव डालती है।
इसी प्रकार, यदि अधिक से अधिक लोग सार्वजनिक परिवहन या साझा यात्रा (कार पूलिंग) को अपनाएं, तो पेट्रोल-डीजल की बचत से न केवल घरेलू बजट सुधरेगा, बल्कि विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा।
डिजिटल लेन-देन को अपनाना आज केवल आधुनिकता का प्रतीक नहीं, बल्कि आर्थिक राष्ट्रनिर्माण का एक सशक्त माध्यम है। पारदर्शी भुगतान व्यवस्था काले धन पर नियंत्रण लगाने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को अधिक मजबूत और स्वच्छ बनाती है। प्रधानमंत्री की अपील यह भी स्पष्ट करती है कि अपव्यय रोकना ही सबसे बड़ी बचत है। चाहे अन्न हो, ऊर्जा हो या धन—हर प्रकार का अपव्यय अंततः राष्ट्र की क्षति ही है।
यह संदेश हमें केवल उपभोक्ता की भूमिका से ऊपर उठाकर राष्ट्र-निर्माता बनने की प्रेरणा देता है। जब देश का प्रत्येक नागरिक आर्थिक रूप से जागरूक होगा, विवेकपूर्ण खर्च करेगा और समझदारी से निवेश करेगा, तब भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने घर की आय-व्यय की डायरी को देश के भविष्य से जोड़ें। वास्तव में, यदि 140 करोड़ भारतीय अपने-अपने घरों के कुशल “वित्त मंत्री” बन जाएं, तो भारत की प्रगति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता।
— विभूति फीचर्स

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