मानवता के रक्षक और सद्गुणों के पुंज: भारत की संत परंपरा

Guardians of Humanity and Embodiments of Virtue: India's Tradition of Saints
 
मानवता के रक्षक और सद्गुणों के पुंज: भारत की संत परंपरा

लेखक: अजय हितकारी

"आग लगी आकाश में, झर झर गिरे अंगार। संत न होते जगत में, तो जल मरता संसार।।"

भक्तिकाल के महान संत कबीर दास जी की ये पंक्तियाँ इस सत्य को उजागर करती हैं कि जब-जब संसार विकारों और ईर्ष्या की अग्नि में जला है, तब-तब संतों ने अपने शीतल वचनों और आचरण से मानवता की रक्षा की है। भारत की पावन भूमि कभी भी महान तपस्वियों, करुणामयी और परोपकारी व्यक्तित्वों से खाली नहीं रही।

संत: वस्त्रों का नहीं, आचरण का नाम

अक्सर लोग भगवा, सफेद या पीले वस्त्रों को देखकर ही किसी को संत मान लेते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे परे है। संत होने का अर्थ दिखावा करना नहीं, बल्कि अपने भीतर सद्गुणों को समाहित कर एक श्रेष्ठ इंसान बने रहना है। जो व्यक्ति संपूर्ण होकर भी साधारण बना रहे और जिसके आचरण से दूसरों का भला हो, वही वास्तव में संत है। संत परंपरा ने सदैव सिखाया कि अध्यात्म की राह पर चलकर ही एक बेहतर मनुष्य बना जा सकता है।

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इतिहास के काले पन्ने और संतों का संघर्ष

प्राचीन काल से ही एक वर्ग ऐसा रहा जिसने अध्यात्म और धार्मिक ज्ञान को केवल एक विशेष श्रेणी तक सीमित रखने का प्रयास किया। उस मार्ग पर चलने वालों को रोकने के लिए कई अमानवीय यातनाएं दी गईं—किसी की आंखें निकलवा ली गईं, तो किसी की जीभ कटवा दी गई। कर्मकांडों और पाखंडवाद का जाल बिछाकर आम जन को उस 'अनंत शक्ति' के दर्शन और श्रवण से वंचित रखा गया।ऐसे अंधकारमय समय में संतों ने जन्म लिया। उन्होंने स्वयं कष्ट सहे, लेकिन मानवता को पावन संदेश दिया। उन्होंने पाखंड की जंजीरों को तोड़कर ईश्वर और मनुष्य के बीच का सीधा मार्ग दिखाया।

बदलते समय में संतों के प्रति भ्रांतियां

आज के दौर में संतों के स्वरूप को लेकर कई भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं। वे लोग जो स्वयं नशे, जीव-हत्या और पाखंड में डूबे रहे, उन्होंने संतों को 'ढोंगी' कहना शुरू कर दिया। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि संत के वेश में रहने वाले हर व्यक्ति में संतत्व नहीं होता। जो केवल चोला धारण करते हैं लेकिन जिनके भीतर सद्गुण नहीं हैं, वे 'मनमुख' मनुष्य के समान हैं।

कबीर जैसे महान क्रांतिकारी संत, जिन्होंने अपने ज्ञान के बल पर अपने गुरु तक को तर्क से प्रभावित किया, उन्होंने बिना कारण संतों की इतनी महिमा नहीं गाई होगी। एक प्रचलित दोहा भी इसी मनोदशा को दर्शाता है:

"संत आते जगत में, जीवों को पार लगावन। मूढ़ लोग पहचान न पाते, संतों संग टकरावन।।"

 अंतर्मन में झांकने की आवश्यकता

संतों की महिमा अनंत है और उसे शब्दों में बांधना असंभव है। समाज को यह समझना होगा कि किसी संत या महापुरुष की आलोचना करने से पहले हमें स्वयं के भीतर झांककर देखना चाहिए। क्या हम उन सद्गुणों के अंशमात्र भी पात्र हैं जिनका उपदेश वे देते हैं? संत समाज का दर्पण होते हैं, उन्हें पत्थर मारना स्वयं को अंधकार की ओर धकेलना है।

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