साबित कीजिए कि आप ज़िंदा हैं

Prove that you are alive.
 
साबित कीजिए कि आप ज़िंदा हैं

विवेक रंजन श्रीवास्तव – विभूति फीचर्स)  हर वर्ष नवंबर के आते ही ठंड से ज्यादा सिहरन पेंशनर्स को उस प्रक्रिया से होने लगती है, जिसमें उन्हें यह प्रमाणित करना होता है कि वे अब भी जीवित हैं। बैंक और सरकारी सिस्टम मानो कह देते हैं—“अगर आप वास्तव में दुनिया में मौजूद हैं, तो फिंगरप्रिंट देकर साबित कीजिए!”

दरअसल स्थिति इतनी विडम्बनापूर्ण है कि वही बुजुर्ग, जिनके हाथों ने कभी देश और समाज का भविष्य गढ़ा था, आज उस मशीन के सामने खड़े हैं जो उनकी उंगलियों को पहचानने से इनकार कर देती है। सामने बैठा युवा क्लर्क मुस्कराकर कह देता है—“सर, सिस्टम आपको पहचान नहीं रहा!” और बुजुर्ग भी मुस्करा देते हैं—“बेटा, अब तो अपने भी पहचानना भूल गए, मशीन तो फिर भी मशीन है!”

नियम और प्रक्रिया के नाम पर संवेदना की जगह अब सॉफ्टवेयर ने ले ली है। जीवन प्रमाण पत्र मानो हर साल नवीनीकृत होने वाला टेंडर बन चुका है। लेकिन सोचने वाली बात यह है—क्या सिर्फ पेंशनर ही जिंदा होने का सबूत दे रहे हैं?

इस देश में हर व्यक्ति रोज अपने-अपने तरीके से “जीवित” होने का प्रमाण दे रहा है—
नौकरी करने वाला अपने बॉस के सामने,
गृहिणी अपने रसोईघर में,
छात्र अपनी परीक्षाओं में,
और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग हर पोस्ट के साथ।

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आज के समय में जीवन की पहचान शरीर नहीं—नेटवर्क बन गया है। दो दिनों तक कोई मैसेज का उत्तर न दे तो लोग पूछने लगते हैं—“कहाँ गायब हो?” अब जीवंतता की कसौटी यह है कि आप ऑनलाइन हैं या नहीं।

शहरों में ज़िंदा रहना आज एक कला जैसा हो गया है।
कोई EMI में घुट रहा है,
कोई प्रमोशन की दौड़ में थक चुका है,
कोई रिश्तों को म्यूट कर चुका है,
कोई भावनाओं को आर्काइव।

और फिर भी हर कोई कह रहा है—“हम ज़िंदा हैं।”

लेकिन असल सवाल यही है—जिंदा कौन है?
वह जो सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद है?
या वह जो भीतर की आग को अब भी जलाए हुए है?

सरकारी सिस्टम जीवन का प्रमाण मशीन से लेता है।
पर आत्मा की जीवंतता का प्रमाण सिर्फ साहस से मिलता है।

मशीनें आज इंसान को नहीं पहचान पा रहीं, और इंसान खुद को पहचानने की स्थिति में भी नहीं रह गया! और यही हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।

इस नवंबर जब बैंक आपसे कहे—“प्रमाण दीजिए कि आप जीवित हैं”—तो बस मुस्करा दीजिए और खुद से पूछिए, आखिर वास्तव में जिंदा कौन है?

जीवन का सच्चा प्रमाण पत्र मशीन नहीं देती—वह भीतर की अनुभूति देती है। सरकारी रिकॉर्ड में जीवित होना और जीवन में वास्तव में जीवित होना—दोनों ही बिल्कुल अलग बातें हैं।

अब वक्त है कि हम कुछ ऐसा करें…
जिससे सच में साबित हो—कि हम जिंदा हैं।

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