सार्वजनिक अभद्रता पर अंकुश आवश्यक

 
शल मीडिया आज सूचना और अभिव्यक्ति का एक प्रभावी माध्यम बन चुका है

डॉ. सुधाकर आशावादी—विनायक फीचर्स)

सोशल मीडिया आज सूचना और अभिव्यक्ति का एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। इसके जरिए देश-दुनिया की घटनाएं कुछ ही क्षणों में लोगों तक पहुंच जाती हैं। यही माध्यम कई बार सार्वजनिक स्थलों पर होने वाली ऐसी घटनाओं को भी सामने लाता है, जो सामाजिक मर्यादा, अनुशासन और सार्वजनिक शिष्टाचार पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो सामने आए हैं, जिनमें सार्वजनिक स्थानों पर लोगों के अभद्र व्यवहार को दिखाया गया है। उदाहरण के तौर पर, यात्रियों से भरी ट्रेन में एक व्यक्ति द्वारा कथित रूप से सार्वजनिक रूप से मूत्र विसर्जन किए जाने का वीडियो सामने आया। इसी तरह बेटिकट यात्रा, टिकट मांगने पर कर्मचारियों से विवाद और सार्वजनिक स्थानों पर अशोभनीय व्यवहार से जुड़े वीडियो भी वायरल होते रहे हैं।

विभिन्न आंदोलनों और सार्वजनिक आयोजनों के दौरान भी कुछ लोगों द्वारा आपत्तिजनक भाषा, गाली-गलौज अथवा अशोभनीय व्यवहार किए जाने के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होते हैं। ऐसे वीडियो की वास्तविकता और संदर्भ की पुष्टि किए बिना उन्हें पूरी तरह सच मान लेना उचित नहीं है, लेकिन सार्वजनिक आचरण को लेकर उठने वाले सवालों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती।

ऐसा प्रतीत होता है कि सामाजिक मर्यादा और सार्वजनिक अनुशासन की भावना कई मामलों में कमजोर पड़ रही है। मध्य प्रदेश के एक विद्यालय से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें एक अतिथि शिक्षक द्वारा कथित रूप से शिक्षिका के साथ अभद्र व्यवहार किए जाने और पुलिसकर्मियों से विवाद करने का दृश्य बताया गया। ऐसे मामलों की सच्चाई संबंधित जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।

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वायरल रील्स का सामाजिक प्रभाव

सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने की होड़ में कुछ लोग ऐसे कंटेंट को भी बढ़ावा देते हैं, जिसमें जानबूझकर विवाद, अश्लीलता, अभद्रता या असामान्य व्यवहार को आकर्षण का माध्यम बनाया जाता है। जब इस तरह के वीडियो को बड़ी संख्या में लोग देखते, साझा करते और उस पर प्रतिक्रिया देते हैं तो इससे ऐसे कंटेंट बनाने वालों को प्रोत्साहन मिल सकता है।

हर वायरल वीडियो वास्तविक घटना का प्रमाण नहीं होता। कई बार वीडियो अधूरा होता है, उसका संदर्भ स्पष्ट नहीं होता या पुरानी घटना को नए संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है। इसलिए सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली किसी भी सामग्री को सत्य मानने से पहले उसकी पुष्टि आवश्यक है।

लेकिन जहां सार्वजनिक स्थान पर वास्तव में कानून या सामाजिक शिष्टाचार का उल्लंघन हुआ हो, वहां कार्रवाई की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। ट्रेन, बस, विद्यालय, बाजार या किसी अन्य सार्वजनिक स्थल पर नागरिकों से मर्यादित और जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा स्वाभाविक है।

कानून के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी

सार्वजनिक अभद्रता पर अंकुश लगाने के लिए केवल पुलिस या प्रशासन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। परिवार, शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और स्वयं सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को भी अपनी भूमिका समझनी होगी।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक समाज का महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे व्यक्ति की गरिमा, सुरक्षा और अधिकारों को प्रभावित करने लगे तो वहां सामाजिक और कानूनी मर्यादाओं पर विचार आवश्यक हो जाता है।

सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली हर बेहूदा हरकत को मनोरंजन समझकर साझा करने के बजाय यह देखना जरूरी है कि उससे समाज में किस प्रकार का संदेश जा रहा है। सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार, अनुशासन और दूसरों की गरिमा के प्रति सम्मान को बढ़ावा देना ही स्वस्थ सामाजिक वातावरण की बुनियाद बन सकता है।

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