वीभत्स सोच की सार्वजनिक प्रस्तुति पर अंकुश आवश्यक

It is necessary to curb the public display of perverse thoughts.
 
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा कुछ लोगों द्वारा लगातार मर्यादाओं को लांघता हुआ प्रतीत हो रहा है। जिसे देखिए, वही स्वयं को सबसे बड़ा उपदेशक सिद्ध करने की होड़ में लगा है। कोई प्रशासनिक पद पर आसीन व्यक्ति सार्वजनिक रूप से यह कामना करता दिखाई देता है कि किसी विशेष बिरादरी की कन्याओं का विवाह उसके अयोग्य और नकारा पुत्रों से हो जाए, तो कोई अपनी ही बिरादरी की कन्याओं की उपेक्षा कर अन्य समाजों से यह अपेक्षा करता है कि वे अपनी बेटियों का विवाह ऐसे लोगों से करें, जो मानसिक और सामाजिक रूप से अक्षम हैं।
(सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)  भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा कुछ लोगों द्वारा लगातार मर्यादाओं को लांघता हुआ प्रतीत हो रहा है। जिसे देखिए, वही स्वयं को सबसे बड़ा उपदेशक सिद्ध करने की होड़ में लगा है। कोई प्रशासनिक पद पर आसीन व्यक्ति सार्वजनिक रूप से यह कामना करता दिखाई देता है कि किसी विशेष बिरादरी की कन्याओं का विवाह उसके अयोग्य और नकारा पुत्रों से हो जाए, तो कोई अपनी ही बिरादरी की कन्याओं की उपेक्षा कर अन्य समाजों से यह अपेक्षा करता है कि वे अपनी बेटियों का विवाह ऐसे लोगों से करें, जो मानसिक और सामाजिक रूप से अक्षम हैं।

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स्थिति तब और भयावह हो जाती है, जब मानसिक विकृति से ग्रस्त लोग सौंदर्य को भी जातियों और बिरादरियों से जोड़कर देखने लगते हैं। नारी सौंदर्य को वासना का माध्यम बताना और कुछ विशेष समुदायों की महिलाओं को ही सुंदर मानने जैसी सोच न केवल संकीर्ण है, बल्कि समाज के नैतिक ताने-बाने को तोड़ने वाली भी है। ऐसी मानसिकता यह दर्शाती है कि उनके लिए नारी सम्मान नहीं, बल्कि उपभोग की वस्तु बनकर रह जाती है।

कहने का आशय यह है कि जितने मुँह, उतनी बातें। किंतु जब ओछी राजनीति के कीड़े समाज का ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसे धूर्ततापूर्ण और अपमानजनक बयान देने लगें, तो यह केवल व्यक्तिगत विकृति नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक बीमारी का रूप ले लेती है। ऐसे तत्वों का नाम लेकर महिमामंडन करना उचित नहीं, क्योंकि समस्या व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि उस सड़ी-गली मानसिकता की है, जो ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसी उदात्त भावना को कभी स्वीकार ही नहीं कर सकती।

जिनकी बुद्धि और विवेक का स्तर शून्य से भी नीचे चला गया हो, जिनके जीवन में आत्मीय रिश्तों और मानवीय मूल्यों का कोई महत्व न हो, वही इस प्रकार के कुत्सित विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने का दुस्साहस करते हैं। जिस जनप्रतिनिधि को नारी की गरिमा नहीं दिखती, जिसे सुंदरता उत्तेजना का साधन लगती है और जो विशेष बिरादरियों की महिलाओं को वासना की दृष्टि से देखता है, उसकी मानसिकता स्वयं में एक गंभीर खतरा है।

ऐसे धूर्त तत्वों के मानसिक और नैतिक परीक्षण की आवश्यकता है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उनके बयान उनकी व्यक्तिगत सोच हैं या उनकी राजनीतिक पार्टी का अधिकृत मत। इस संबंध में संबंधित दलों को सार्वजनिक स्पष्टीकरण देना चाहिए। राजनीतिक दलों की बैठकों में केवल रणनीति नहीं, बल्कि अपने प्रतिनिधियों के चारित्रिक और नैतिक पक्षों की भी समीक्षा होनी चाहिए।

एक ओर देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान सशक्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर अपने ही समाज में इस प्रकार की वीभत्स और विभेदकारी सोच का खुलेआम प्रदर्शन होना गहरी चिंता का विषय है। समय आ गया है कि ऐसी विकृत मानसिकता पर कठोर अंकुश लगाया जाए।

किसी को भी यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह सार्वजनिक मंचों से ऐसे कुत्सित, एकपक्षीय और विभाजनकारी विचार व्यक्त करे, जिनसे समाज में घृणा, भेदभाव और असमानता को बढ़ावा मिले। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सामाजिक सौहार्द को चोट पहुँचाना नहीं हो सकता। स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब वह जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ प्रयोग की जाए।

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