जनकल्याणकारी जनतंत्र ही वास्तविक लोकतंत्र, जनता का कल्याण बने शासन की प्राथमिकता

A welfare-oriented republic is the true form of democracy; the well-being of the people should be the priority of governance.
 
जनकल्याणकारी जनतंत्र ही वास्तविक लोकतंत्र, जनता का कल्याण बने शासन की प्राथमिकता

डॉ. शैलेश शुक्ला — विनायक फीचर्स

भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक सफलता इस बात से तय नहीं होती कि चुनाव कितने सफलतापूर्वक संपन्न हुए या आर्थिक विकास के कितने नए कीर्तिमान बने। इसकी असली कसौटी यह है कि शासन व्यवस्था आम नागरिक के जीवन को कितना बेहतर बना सकी। जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन मिले और आर्थिक-सामाजिक असमानताएं कम हों, तभी लोकतंत्र अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करता है। इसलिए जनकल्याणकारी जनतंत्र केवल एक राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि भारतीय संविधान की मूल भावना से जुड़ा लक्ष्य है।

भारतीय संविधान में इस लक्ष्य की स्पष्ट रूपरेखा मौजूद है। अनुच्छेद 38 राज्य को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित व्यवस्था स्थापित करने तथा आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानताओं को कम करने की दिशा में काम करने का निर्देश देता है। अनुच्छेद 39 आजीविका के पर्याप्त साधनों, संसाधनों के जनहितकारी वितरण और आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण को रोकने जैसे उद्देश्यों पर बल देता है। वहीं, अनुच्छेद 47 पोषण स्तर, जीवन स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को राज्य के प्रमुख दायित्वों में शामिल करता है। इन संवैधानिक आदर्शों को सरकारी नीतियों, बजट और प्रशासनिक कार्यप्रणाली में प्रभावी ढंग से लागू करना ही जनकल्याणकारी लोकतंत्र की पहली शर्त है।

विकास की कसौटी आम नागरिक का जीवन

जनकल्याणकारी जनतंत्र का अर्थ केवल गरीबों को आर्थिक सहायता देना या चुनावों से पहले नई योजनाओं की घोषणा करना नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार, न्याय, सामाजिक सुरक्षा और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें।

सरकार की सफलता का मूल्यांकन केवल सकल घरेलू उत्पाद, विदेशी निवेश, शेयर बाजार या बड़ी विकास परियोजनाओं के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि आम परिवारों की वास्तविक आय में कितनी वृद्धि हुई, बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता कितनी सुधरी, इलाज का आर्थिक बोझ कितना घटा और नागरिकों को सरकारी सेवाएं प्राप्त करने में कितनी आसानी हुई। विकास के आंकड़े तभी सार्थक हैं, जब उनका सकारात्मक प्रभाव लोगों के दैनिक जीवन में दिखाई दे।

भारत ने गरीबी कम करने और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। नीति आयोग के जनवरी 2024 में प्रकाशित चर्चा पत्र के अनुसार, बहुआयामी गरीबी का अनुमानित अनुपात 2013-14 के 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत रह गया। इस अवधि में लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। ये आंकड़े विभिन्न सर्वेक्षण अवधियों और अनुमानों पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें प्रत्येक वर्ष प्रत्यक्ष रूप से मापे गए आंकड़ों के समान नहीं समझना चाहिए।

यह उपलब्धि उत्साहजनक है, लेकिन इसके आधार पर यह मान लेना उचित नहीं होगा कि गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण और आर्थिक असमानता की चुनौतियां समाप्त हो गई हैं। वास्तविक लोकतंत्र का दायित्व उपलब्धियों का उत्सव मनाने के साथ-साथ शेष समस्याओं की पहचान करना और उनके समाधान के लिए निरंतर प्रयास करना भी है।

रोजगार और कौशल विकास को मिले प्राथमिकता

जनकल्याणकारी व्यवस्था के निर्माण के लिए रोजगार को सरकारी नीतियों के केंद्र में रखना होगा। युवाओं को केवल शैक्षणिक डिग्री देना पर्याप्त नहीं है; उन्हें ऐसे कौशल भी उपलब्ध कराने होंगे, जिनकी वास्तविक अर्थव्यवस्था में मांग हो। विनिर्माण, कृषि प्रसंस्करण, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं, निर्माण, अनुसंधान, डिजिटल कारोबार और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।

छोटे और मध्यम उद्यमों को सस्ता ऋण, सरल पंजीकरण प्रक्रिया, समय पर भुगतान और बाजार तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। रोजगारपरक प्रशिक्षण योजनाओं की सफलता केवल प्रशिक्षित युवाओं की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। यह भी देखना होगा कि प्रशिक्षण के बाद कितने युवाओं को रोजगार मिला, उन्हें कितना वेतन प्राप्त हुआ और उनका रोजगार कितना स्थायी रहा।

स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने वाली योजनाओं का मूल्यांकन भी वास्तविक आय, कारोबार की निरंतरता और उद्यमों के विकास के आधार पर होना चाहिए। रोजगार के अवसर बढ़ने से न केवल परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक भागीदारी का आधार भी व्यापक होगा।

शिक्षा और स्वास्थ्य को बनाया जाए जनसेवा का आधार

शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी कल्याणकारी राज्य की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल हैं। सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, आधुनिक शिक्षण सामग्री, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं और नियमित शैक्षणिक मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता केवल बड़े शहरों और प्रतिष्ठित संस्थानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों के विद्यार्थियों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के समान अवसर मिलने चाहिए।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिला अस्पतालों, चिकित्सकों, जांच सुविधाओं और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाना जरूरी है। किसी परिवार को बीमारी के कारण कर्ज लेने या अपनी संपत्ति बेचने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। इसके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के साथ स्वास्थ्य सेवाओं की लागत को भी आम नागरिकों की पहुंच में रखना होगा।

शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को केवल बजटीय व्यय के रूप में नहीं, बल्कि देश की मानव पूंजी और भविष्य में किए जाने वाले दीर्घकालीन निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिले मजबूती

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किए बिना जनकल्याण का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। किसानों की आय बढ़ाने के लिए सिंचाई सुविधाओं, भंडारण, शीतगृह, कृषि अनुसंधान, खाद्य प्रसंस्करण और बाजार संपर्क को बेहतर बनाना आवश्यक है। किसान उत्पादक संगठनों और सहकारी संस्थाओं को सक्षम बनाकर छोटे किसानों की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

फसल विविधीकरण को स्थानीय जलवायु, मिट्टी, बाजार की मांग और जल उपलब्धता के अनुरूप प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। केवल कृषि उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य, समय पर भुगतान और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावी सुरक्षा भी मिलनी चाहिए।

ग्रामीण विकास की सफलता तभी मानी जाएगी, जब गांवों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यक सेवाएं उपलब्ध हों। लोगों को केवल आजीविका की मजबूरी में अपना घर-परिवार छोड़कर पलायन न करना पड़े, इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों का विस्तार करना होगा।

सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्ति तक पहुंचे

कल्याणकारी योजनाओं की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उनका लाभ वास्तविक पात्र व्यक्ति तक समय पर पहुंचता है या नहीं। डिजिटल भुगतान और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने कई योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ाने की संभावनाएं पैदा की हैं, लेकिन तकनीक को अपने आप में संपूर्ण समाधान नहीं माना जा सकता।

आधार, बैंक खातों, इंटरनेट या दस्तावेजों से जुड़ी त्रुटियों के कारण कोई पात्र नागरिक राशन, पेंशन अथवा अन्य सहायता से वंचित नहीं होना चाहिए। प्रत्येक योजना में सरल शिकायत निवारण व्यवस्था, समाधान की समयसीमा और अपील का अवसर उपलब्ध होना जरूरी है। डिजिटल प्रक्रिया विफल होने पर वैकल्पिक व्यवस्था भी होनी चाहिए।

प्रशासन का उद्देश्य नागरिकों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगवाना नहीं, बल्कि उनके अधिकारों तक पहुंच आसान बनाना होना चाहिए। सरकारी व्यवस्था की संवेदनशीलता इसी बात से पहचानी जाती है कि वह सबसे कमजोर और जरूरतमंद व्यक्ति की समस्या का समाधान कितनी तत्परता से करती है।

पारदर्शिता और जवाबदेही से मजबूत होगा लोकतंत्र

जनप्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना जनकल्याणकारी व्यवस्था की कल्पना अधूरी है। प्रत्येक प्रमुख योजना के लिए स्पष्ट लक्ष्य, निर्धारित समयसीमा, खर्च का सार्वजनिक विवरण और स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए। सामाजिक अंकेक्षण, सूचना का अधिकार, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट तथा संसद और विधानसभा की समितियों की सिफारिशों को गंभीरता से लागू किया जाना चाहिए।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई राजनीतिक पहचान से स्वतंत्र होकर होनी चाहिए। सार्वजनिक खरीद और सरकारी ठेकों की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाने से सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की संभावनाएं कम की जा सकती हैं।

नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उनके कर से प्राप्त धन कहां खर्च हुआ, योजनाओं से कितना लाभ मिला और निर्धारित लक्ष्य कितने पूरे हुए। जवाबदेही की ऐसी व्यवस्था शासन में जनता के विश्वास को मजबूत करती है और लोकतंत्र को अधिक प्रभावी बनाती है।

जनभागीदारी के बिना विकास अधूरा

लोकतंत्र को अधिक सहभागी बनाने के लिए ग्राम सभाओं, नगर निकायों और स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं को पर्याप्त वित्तीय संसाधन, प्रशासनिक अधिकार और प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध कराने होंगे। स्थानीय समस्याओं का समाधान हमेशा केंद्रीय स्तर पर तैयार नीतियों से नहीं हो सकता।

पहाड़ी क्षेत्रों की जरूरतें महानगरों से अलग होती हैं, जबकि सूखाग्रस्त जिलों की प्राथमिकताएं बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से भिन्न हो सकती हैं। इसलिए स्थानीय विकास योजनाओं के निर्माण में महिलाओं, युवाओं, किसानों, श्रमिकों, दिव्यांगजनों और वंचित समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है।

जब विकास की प्राथमिकताएं स्थानीय आवश्यकताओं और नागरिकों के अनुभवों के आधार पर तय होती हैं, तब योजनाओं की उपयोगिता और प्रभावशीलता बढ़ती है। जनभागीदारी केवल औपचारिक बैठक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि निर्णय लेने और उनके परिणामों का मूल्यांकन करने की प्रक्रिया में भी दिखाई देनी चाहिए।

सामाजिक न्याय को व्यवहार में उतारना होगा

सामाजिक न्याय को केवल राजनीतिक नारों तक सीमित रखने के बजाय उसे नागरिकों के वास्तविक जीवन में उतारना आवश्यक है। जाति, धर्म, लिंग, भाषा, दिव्यांगता और आर्थिक स्थिति के आधार पर अवसरों में मौजूद बाधाओं को पहचानकर दूर करना होगा।

महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, रोजगार में समान अवसर और देखभाल संबंधी सुविधाएं उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। दिव्यांग नागरिकों के लिए सुलभ भवन, परिवहन और डिजिटल सेवाएं सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

कमजोर वर्गों के लिए संचालित कल्याणकारी योजनाएं सम्मानजनक, पारदर्शी और भेदभावरहित होनी चाहिए। लोकतंत्र तभी सार्थक बनता है, जब नागरिकों को प्राप्त अधिकार केवल संविधान और कानून की पुस्तकों में दर्ज न रहें, बल्कि उनके दैनिक जीवन में भी दिखाई दें।

सरकारी बजट में दीर्घकालीन जनहित को मिले महत्व

सरकारी बजट और कल्याणकारी योजनाओं का निर्धारण केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ के आधार पर नहीं होना चाहिए। मुफ्त सुविधाओं, सब्सिडी और नकद सहायता की उपयोगिता का आकलन उनके उद्देश्य, लाभार्थियों और वित्तीय स्थिरता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवारों को सहायता देना आवश्यक है, लेकिन दीर्घकालीन कल्याण के लिए रोजगार सृजन, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी ढांचे में निवेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, अनुसंधान और स्थानीय विकास को पर्याप्त प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

प्रत्येक नई योजना के साथ उसके वित्तपोषण, अपेक्षित परिणाम और स्वतंत्र मूल्यांकन की व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सरकारी संसाधनों का उपयोग वास्तविक जनहित में हो और योजनाएं केवल घोषणाओं तक सीमित न रह जाएं।

जनता का जीवन बेहतर बनाना ही लोकतंत्र की असली कसौटी

भारतीय जनतंत्र को जनकल्याण पर केंद्रित करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता और नागरिक भागीदारी का समन्वय आवश्यक है। सरकार की उपलब्धियों का वास्तविक प्रमाण विज्ञापनों, भाषणों या घोषणाओं की संख्या नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन में आया सकारात्मक बदलाव होना चाहिए।

लोकतंत्र का अर्थ केवल निश्चित अंतराल पर मतदान करना नहीं है। इसका अर्थ सरकार को निरंतर जवाबदेह बनाना, जनहित के मुद्दों पर सवाल उठाना और शासन की प्राथमिकताओं में आम नागरिक के हितों को सर्वोपरि रखना भी है।

जिस व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक सम्मान के साथ जीवन जी सके, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं तक उसकी पहुंच हो, रोजगार के अवसर उपलब्ध हों और उसकी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए, वही वास्तविक अर्थों में जनकल्याणकारी जनतंत्र कहलाने की अधिकारी है।

भारत को इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा, जहां सत्ता का प्रत्येक निर्णय नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने की कसौटी पर परखा जाए और विकास का लाभ समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुंचे। क्योंकि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल जनता के मत में नहीं, बल्कि जनता के कल्याण के प्रति शासन की प्रतिबद्धता में निहित है।

(डॉ. शैलेश शुक्ला — विनायक फीचर्स)

Tags