पंजाब भाजपा : गुटबाज़ी में उलझी सियासत की नई राह

Punjab BJP: A new path for politics entangled in factionalism.
 
पंजाब भाजपा : गुटबाज़ी में उलझी सियासत की नई राह

सुभाष आनंद (विनायक फीचर्स)पंजाब में भारतीय जनता पार्टी 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटी दिखाई देती है। पार्टी के नेता लगातार बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती। राज्य में भाजपा इस समय गंभीर गुटबाज़ी से जूझ रही है, जिसने उसकी संगठनात्मक मजबूती और चुनावी संभावनाओं दोनों को प्रभावित किया है।

 

पंजाब भाजपा में फिलहाल तीन प्रमुख गुट स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। पहला और सबसे प्रभावशाली गुट प्रदेश अध्यक्ष अश्विनी शर्मा का माना जाता है, जिनका संगठन पर सीधा नियंत्रण है। दूसरा गुट सुनील जाखड़ के नेतृत्व में देखा जाता है, जिनकी केंद्रीय स्तर पर पकड़ मजबूत है और जो आम आदमी पार्टी की मुखर आलोचना करते रहे हैं। तीसरा गुट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा है, जिसका अपना प्रभाव, अनुशासन और वैचारिक दृष्टिकोण है। इन गुटों के बीच समन्वय की कमी पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है।

 

गुटबाज़ी की एक बड़ी वजह बाहरी नेताओं का भाजपा में शामिल होना भी है। कांग्रेस और अन्य दलों से आए नेताओं को तरजीह दिए जाने से पुराने भाजपा कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा है। वर्षों से पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले नेता खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। उन्हें आशंका है कि चुनाव के समय उनकी टिकट काटकर नए शामिल नेताओं को मौका दिया जाएगा। यही असंतोष जिला और मंडल स्तर तक फैल चुका है, जिससे संगठन की जड़ें कमजोर होती जा रही हैं।

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इसी बीच शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के बीच संभावित गठबंधन को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज़ हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ जैसे नेता मानते हैं कि पंजाब में सत्ता तक पहुंचने के लिए भाजपा को किसी क्षेत्रीय दल, विशेषकर अकाली दल, के साथ समझौता करना पड़ सकता है। हालांकि अकाली दल इस स्थिति में नहीं है कि वह भाजपा को ‘बड़े भाई’ की भूमिका स्वीकार करे। पंथक वोटों का झुकाव दोबारा अकाली दल की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है, जिससे भाजपा की मोलभाव की स्थिति कमजोर पड़ रही है।

 

चुनावी स्तर पर भाजपा को कई मोर्चों पर झटके लगे हैं। उपचुनावों में मिली हार ने यह साफ कर दिया है कि ग्रामीण इलाकों में भी पार्टी का आधार लगातार खिसक रहा है। जिन नेताओं को बाहर से लाकर पार्टी में शामिल किया गया, उनकी सामाजिक स्वीकार्यता और जनाधार सीमित है। इससे भाजपा की वैचारिक पहचान भी धुंधली होती दिख रही है। कांग्रेस से आए नेताओं को लेकर स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं में नाराज़गी है, जिसका असर आने वाले चुनावों में आंतरिक विरोध के रूप में सामने आ सकता है।

प्रदेश अध्यक्ष अश्विनी शर्मा यह दावा कर चुके हैं कि भाजपा 2027 का चुनाव अपने दम पर लड़ेगी। उनका कहना है कि भाजपा की राजनीति कोठियों में नहीं, बल्कि जनता के बीच जाकर होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा अंतिम समय में माहौल बनाने में माहिर मानी जाती है, लेकिन केवल चुनावी रणनीति से संगठनात्मक असंतोष को दबाया नहीं जा सकता। कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं की नाराज़गी पार्टी के लिए एक गंभीर चुनौती बनी हुई है।

कुल मिलाकर, 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले पंजाब भाजपा कई कठिन सवालों के घेरे में खड़ी है। गुटबाज़ी, बाहरी नेताओं का बढ़ता प्रभाव और अकाली दल के साथ गठबंधन को लेकर असमंजस—ये सभी कारक पार्टी की चुनावी राह को कठिन बना रहे हैं। यदि समय रहते पार्टी हाईकमान ने स्थिति को नहीं संभाला, तो पंजाब में भाजपा की हालत कांग्रेस से भी अधिक कमजोर हो सकती है।

भाजपा के लिए ज़रूरी है कि वह अपने पुराने कार्यकर्ताओं को विश्वास में ले, नए और पुराने नेताओं के बीच संतुलन बनाए और ज़मीनी स्तर पर संगठन को फिर से खड़ा करे। साथ ही, अकाली दल के साथ रिश्तों को लेकर व्यावहारिक और यथार्थवादी निर्णय लेने होंगे। पंजाब की राजनीति में भाजपा अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकेगी या नहीं—यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह गुटबाज़ी से ऊपर उठकर एक स्पष्ट, संगठित और भरोसेमंद रणनीति बना पाती है या नहीं।

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