पंजाब में शिक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल, निजी स्कूलों पर मुनाफाखोरी के आरोप

Questions Raised Over Education System in Punjab; Private Schools Accused of Profiteering
 
पंजाब में शिक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल, निजी स्कूलों पर मुनाफाखोरी के आरोप

(सुभाष आनंद-विनायक फीचर्स)

पंजाब में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य में निजी स्कूलों पर शिक्षा को सेवा के बजाय मुनाफे का जरिया बनाने के आरोप लग रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि लगातार बढ़ती फीस, अतिरिक्त शुल्क और नियमों की अनदेखी ने शिक्षा को आम परिवारों की पहुंच से दूर करना शुरू कर दिया है।

फिरोजपुर जिले सहित कई क्षेत्रों में निजी स्कूलों द्वारा एसी सुविधा के नाम पर अभिभावकों से अतिरिक्त शुल्क वसूले जाने की शिकायतें सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि कई स्कूलों ने प्रति छात्र 200 रुपये मासिक अतिरिक्त शुल्क लेना शुरू कर दिया है। अभिभावकों का सवाल है कि जब स्कूलों में पहले से एसी लगे हुए थे तो अचानक अतिरिक्त शुल्क क्यों लिया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार राज्य में बड़ी संख्या में निजी स्कूल बिना सरकारी अनुदान के संचालित हो रहे हैं। आरोप है कि इनमें से कई संस्थान फीस वसूली में पारदर्शिता नहीं बरतते और अभिभावकों को उचित रसीद तक उपलब्ध नहीं कराई जाती। वहीं, कई स्कूलों में प्रयोगशाला, पुस्तकालय और खेल मैदान जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव होने के बावजूद उन्हें मान्यता मिलने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।

पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर दावा किया कि राजनीतिक दबाव के चलते कई ऐसे स्कूलों को भी मान्यता दी गई जिन्होंने निर्धारित मानकों को पूरा नहीं किया।

अभिभावकों का कहना है कि निजी स्कूलों में किताबें, कॉपियां और यूनिफॉर्म भी निर्धारित दुकानों से खरीदने का दबाव बनाया जाता है। आरोप है कि बाजार में सस्ती उपलब्ध वस्तुएं स्कूलों से जुड़े विक्रेताओं द्वारा अधिक कीमत पर बेची जा रही हैं।

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वहीं, राज्य सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि निजी स्कूलों की मनमानी पर नियंत्रण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस और आम आदमी पार्टी सरकार की ओर से कई बार सख्ती के संकेत दिए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई दे रहा।

राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। कांग्रेस नेता और पूर्व विधायक परमिंदर सिंह पिंकी ने आरोप लगाया कि निजी स्कूलों की मनमानी पर सरकार प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रही है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, कमजोर आधारभूत ढांचा और गिरते शैक्षणिक स्तर के कारण अभिभावक मजबूरी में निजी स्कूलों का रुख कर रहे हैं। इसी स्थिति का लाभ निजी संस्थान उठा रहे हैं।

सामाजिक संगठनों ने शिक्षा के बढ़ते व्यापारीकरण पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि समय रहते फीस नियंत्रण, पारदर्शिता और मानकों के पालन को लेकर सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

राइट टू एजुकेशन (RTE) कानून के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्राप्त है। साथ ही निजी स्कूलों के लिए भी कई मानक तय किए गए हैं, जिनमें फीस नियंत्रण, आधारभूत सुविधाएं और शिक्षकों की योग्यता शामिल है। हालांकि, आरोप है कि इन नियमों का पालन कई स्थानों पर प्रभावी ढंग से नहीं हो पा रहा।

फिलहाल, अभिभावकों के बीच बढ़ती फीस और अतिरिक्त शुल्क को लेकर नाराजगी बनी हुई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शिक्षा को फिर से सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में स्थापित किया जा सकेगा या यह मुनाफे के बाजार में और गहराई तक फंसती जाएगी।

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