संवैधानिक संस्थाओं के सामने खड़े सवाल
(डॉ. सुधाकर आशावादी – विनायक फीचर्स)
लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश करने वाले तत्व लगातार सक्रिय हो गए हैं। यदि ऐसा न होता तो वे सत्य से परे जाकर संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास फैलाने और देश में अराजकता का माहौल बनाने की कोशिश न करते। दुर्भाग्य है कि चुनाव जैसी गंभीर प्रक्रिया पर आम नागरिक की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आती।

आरोप लगाने वाले तत्व अपनी बात के समर्थन में ठोस प्रमाण देने के बजाय केवल शोर मचाने और जनता को भ्रमित करने में लगे रहते हैं। पराजय की सच्चाई स्वीकार करने से बचने वाले ये लोग, बार-बार बिना आधार के आरोप लगाकर स्वयं को संदेह के घेरे में खड़ा कर देते हैं। यही कारण है कि चाहे हिमाचल प्रदेश हो, तेलंगाना हो या पश्चिम बंगाल – कहीं भी उन्हें वोट चोरी के सबूत नहीं मिलते।
यहाँ तक कि जब मतदाता सूची में मृत व्यक्तियों के नाम हटाए जाते हैं या एक ही मतदाता का नाम अलग-अलग स्थानों से हटाकर सुधार किया जाता है, तब भी वे आपत्ति जताते हैं। सवाल यह है कि क्यों उन्हें केवल वही संशोधन गलत लगते हैं जो कथित तौर पर उनके “पारंपरिक वोट बैंक” को प्रभावित करते हैं?
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि संवैधानिक संस्थाओं के सामने यह बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है कि निराधार और अप्रामाणिक आरोपों से कैसे निपटा जाए ताकि उनकी गरिमा सुरक्षित रह सके। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर यदि कोई असत्य आरोप लगाता है और समाज में भ्रम फैलाता है, तो इसे आपराधिक कृत्य माना जाना चाहिए। इसलिए अब समय आ गया है कि झूठ और अराजकता पर आधारित विमर्श फैलाने वाले तत्वों को सख्त सबक सिखाया जाए, ताकि लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की साख अक्षुण्ण बनी रहे।
