भारत छोड़ो आंदोलन: स्वतंत्रता संघर्ष की जनक्रांति के अनछुए रोचक पहलू
(डॉ. शैलेश शुक्ला — विभूति फीचर्स)
भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह निर्णायक अध्याय था, जिसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष को अंतिम और व्यापक जनचरण तक पहुंचा दिया। आमतौर पर इसे महात्मा गांधी के “करो या मरो” के आह्वान और 9 अगस्त 1942 की गिरफ्तारियों के साथ याद किया जाता है, लेकिन इसकी कहानी इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह केवल कांग्रेस का राजनीतिक आंदोलन नहीं था। शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बाद विद्यार्थियों, किसानों, श्रमिकों, महिलाओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने अनेक क्षेत्रों में आंदोलन को आगे बढ़ाया। कई स्थानों पर भूमिगत गतिविधियां संचालित हुईं और कुछ क्षेत्रों में समानांतर प्रशासन स्थापित करने के प्रयास भी किए गए।
युद्ध की पृष्ठभूमि और क्रिप्स मिशन
भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि द्वितीय विश्वयुद्ध से जुड़ी थी। वर्ष 1939 में ब्रिटेन ने भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना भारत को भी युद्ध में शामिल घोषित कर दिया। कांग्रेस ने इसका विरोध करते हुए कहा कि भारत को अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार मिलना चाहिए।
1942 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं से संवैधानिक समझौते की संभावनाएं तलाशने के लिए क्रिप्स मिशन भेजा, लेकिन प्रस्ताव पर सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद कांग्रेस के भीतर ब्रिटिश शासन के तत्काल अंत की मांग और मजबूत हुई।
14 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति ने महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया। इसमें ब्रिटिश शासन समाप्त कर भारत को स्वतंत्र करने की मांग की गई। प्रस्ताव में यह विचार भी सामने आया कि स्वतंत्र भारत विश्व में स्वतंत्रता, शांति और फासीवाद के विरुद्ध संघर्ष में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

8 अगस्त 1942 और ‘करो या मरो’ का आह्वान
8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव को अंतिम रूप से स्वीकार किया गया। बैठक ग्वालिया टैंक मैदान में हुई, जिसे बाद में अगस्त क्रांति मैदान कहा गया। इसी अवसर पर महात्मा गांधी ने देशवासियों को “करो या मरो” का संदेश दिया।
भारत छोड़ो आंदोलन के नाम को लोकप्रिय बनाने में कांग्रेस के समाजवादी नेता यूसुफ मेहरअली की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने “Quit India” नारे को लोकप्रिय बनाने में योगदान दिया और आंदोलन से पहले इसी नाम से पुस्तक भी प्रकाशित की थी।
नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जनता ने संभाली कमान
8 अगस्त की बैठक के तुरंत बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। 9 अगस्त की सुबह महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित अनेक प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए।
लेकिन नेतृत्व की गिरफ्तारी से आंदोलन थमा नहीं। इसके उलट देश के अनेक हिस्सों में स्थानीय नेताओं और आम नागरिकों ने अपने स्तर पर संघर्ष को आगे बढ़ाया।
9 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में अरुणा आसफ अली ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। यह घटना आंदोलन की जनशक्ति और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गई। इसके बाद अरुणा आसफ अली भूमिगत आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हुईं।
भूमिगत रेडियो बना प्रतिरोध की आवाज
भारत छोड़ो आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसका भूमिगत स्वरूप था। ब्रिटिश सरकार की सेंसरशिप और व्यापक गिरफ्तारियों के बीच आंदोलनकारियों ने पर्चों, गुप्त बुलेटिनों और भूमिगत समाचार-पत्रों के जरिए संदेश पहुंचाए।
इस दौर का सबसे चर्चित उदाहरण उषा मेहता और उनके साथियों का कांग्रेस रेडियो था। अगस्त 1942 के अंत में शुरू हुए इस गुप्त रेडियो के माध्यम से सरकारी सेंसरशिप से बचते हुए आंदोलन से संबंधित समाचार और संदेश प्रसारित किए जाते थे। इससे आंदोलनकारियों में यह विश्वास मजबूत हुआ कि संचार माध्यमों पर सरकारी नियंत्रण के बावजूद स्वतंत्रता की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।
बलिया में बनी अल्पकालिक राष्ट्रीय सरकार
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कुछ क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर समानांतर सरकारें स्थापित करने के प्रयास हुए। उत्तर प्रदेश के बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में 19 अगस्त 1942 को अल्पकालिक राष्ट्रीय सरकार स्थापित हुई। आंदोलनकारियों ने स्थानीय प्रशासन पर नियंत्रण कायम करने और गिरफ्तार कांग्रेस नेताओं की रिहाई का प्रयास किया।
हालांकि ब्रिटिश सेना के हस्तक्षेप के बाद यह व्यवस्था अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी। फिर भी बलिया की घटना इस बात का प्रमाण बनी कि आंदोलनकारियों में केवल औपनिवेशिक शासन का विरोध ही नहीं, बल्कि वैकल्पिक स्थानीय शासन की कल्पना भी थी।
तमलुक और सतारा के प्रयोग
बंगाल के तमलुक और कांथी क्षेत्र में तम्रलिप्त जातीय सरकार का गठन हुआ। इस समानांतर व्यवस्था ने न्याय, सुरक्षा और गरीबों की सहायता जैसे कार्य करने का प्रयास किया। इसके अस्तित्व की अवधि को लेकर विभिन्न स्रोतों में कुछ अंतर मिलता है, लेकिन यह भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण स्थानीय प्रशासनिक पहलों में गिनी जाती है।
महाराष्ट्र के सतारा में क्रांतिसिंह नाना पाटील के नेतृत्व में ‘प्रति सरकार’ का गठन हुआ। इसका प्रभाव अनेक गांवों तक फैला। खाद्य वितरण, कानून-व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन के क्षेत्र में वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी करने का प्रयास किया गया। इसके साथ तूफान सेना नामक संगठन भी जुड़ा था।
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि भारत छोड़ो आंदोलन पूरे देश में एक समान तरीके से नहीं चला। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसके स्वरूप और रणनीतियां बदलती रहीं।
तालचर में भी सामने आया वैकल्पिक शासन का विचार
उड़ीसा के तालचर क्षेत्र में भी ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती देने के प्रयास हुए। वहां ‘चासी माउलिया’ और ‘मजदूर राज’ जैसी वैकल्पिक शासन-व्यवस्थाओं की कल्पना सामने आई। स्थानीय संस्थाओं को वयस्क मताधिकार के आधार पर विकसित करने की सोच इस बात को दर्शाती है कि स्वतंत्रता संघर्ष का एक पक्ष भविष्य के लोकतांत्रिक शासन की कल्पना से भी जुड़ा था।
विद्यार्थियों, किसानों, श्रमिकों और महिलाओं की भागीदारी
भारत छोड़ो आंदोलन का सामाजिक आधार व्यापक था। शीर्ष नेतृत्व के जेल जाने के बाद विद्यार्थियों, किसानों, श्रमिकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने अनेक स्थानों पर आंदोलन को गति दी। हड़तालें हुईं, जुलूस निकाले गए, सरकारी संस्थानों का बहिष्कार किया गया और कुछ क्षेत्रों में संचार व्यवस्था को बाधित किया गया।
महिलाओं की भूमिका भी उल्लेखनीय रही। अरुणा आसफ अली के अलावा अनेक महिलाओं ने भूमिगत गतिविधियों में सहयोग किया, संदेश पहुंचाए, आंदोलनकारियों को आश्रय दिया और विभिन्न स्तरों पर प्रतिरोध में भाग लिया।
हालांकि आंदोलन का घोषित दर्शन अहिंसक जनप्रतिरोध पर आधारित था, लेकिन कई स्थानों पर हिंसक घटनाएं भी हुईं। सरकारी भवनों पर हमले, रेलवे और तार व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं सामने आईं। इसलिए 1942 के आंदोलन को समझते समय गांधीजी के अहिंसक सिद्धांत और आंदोलन के कुछ हिस्सों में हुई हिंसक कार्रवाइयों, दोनों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
क्या भारत को केवल भारत छोड़ो आंदोलन से आजादी मिली?
भारत छोड़ो आंदोलन तत्काल भारत को स्वतंत्र नहीं करा सका। ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तारियों, दमन और प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल करके आंदोलन को नियंत्रित किया। हजारों लोग गिरफ्तार हुए और कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व लंबे समय तक जेल में रहा।
फिर भी इस आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व असाधारण था। इसने ब्रिटिश शासन के सामने भारतीय जनता की स्वतंत्रता की इच्छा को निर्णायक रूप से प्रस्तुत किया और यह स्पष्ट कर दिया कि औपनिवेशिक शासन को अब पहले की तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता।
भारत को 1947 में मिली स्वतंत्रता केवल भारत छोड़ो आंदोलन का परिणाम नहीं थी। स्वतंत्रता का मार्ग दशकों के राजनीतिक संघर्ष, सामाजिक जागरण, क्रांतिकारी गतिविधियों, सैनिक असंतोष, द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रभाव और बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से होकर गुजरा। युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति भी बदल चुकी थी। इसलिए 1942 को स्वतंत्रता का एकमात्र कारण मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।
फिर भी भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संघर्ष के अंतिम चरण का एक निर्णायक जन-अध्याय था।
आंदोलन की सबसे बड़ी विरासत
भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी विरासत यह थी कि जब देश के शीर्ष नेता जेल में थे, तब आम जनता ने अपने-अपने तरीके से संघर्ष को जीवित रखा। “Quit India”, गांधी का “करो या मरो” का आह्वान, भूमिगत रेडियो, गुप्त साहित्य, महिलाओं और विद्यार्थियों की सक्रियता तथा बलिया, तमलुक, सतारा और तालचर जैसे क्षेत्रों में वैकल्पिक प्रशासन के प्रयास इस व्यापक जनऊर्जा के अलग-अलग रूप थे।
इसलिए भारत छोड़ो आंदोलन को केवल 8 अगस्त 1942 के प्रस्ताव या 9 अगस्त की गिरफ्तारियों तक सीमित करके देखना इसके व्यापक ऐतिहासिक स्वरूप को समझने में बाधा डालता है। इसका वास्तविक महत्व उस राजनीतिक चेतना में था, जिसने यह स्पष्ट किया कि भारत का भविष्य भारत के लोगों के हाथ में होना चाहिए।
स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन का अंत नहीं था, बल्कि जनता को अपने राजनीतिक भविष्य का निर्णय करने का अधिकार मिलना भी था। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन इसी अधिकार की सबसे व्यापक राष्ट्रीय पुकारों में से एक था।
(विभूति फीचर्स)
