राजा भभूत सिंह कोरकू: स्वाभिमान की ज्वाला, जो आज भी सतपुड़ा में गूंजती है

Raja Bhabhut Singh Korku: The flame of self-respect, which still resonates in Satpura
 
राजा भभूत सिंह कोरकू: स्वाभिमान की ज्वाला, जो आज भी सतपुड़ा में गूंजती है

(लेखक: दुर्गेश रायकवार | स्रोत: विनायक फीचर्स)

मध्य भारत का मालवा और सतपुड़ा अंचल, प्राचीन काल में अवंतिका महाजनपद का हिस्सा था। यह क्षेत्र हजारों वर्षों से आस्था, साधना और प्रकृति की गोद में पलता रहा है। सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखलाएं, नर्मदा और ताप्ती की घाटियाँ, न सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर हैं, बल्कि ये आदिवासी अस्मिता और संघर्ष की भी साक्षी रही हैं। यहीं से उभरे थे कोरकू योद्धा राजा भभूत सिंह – एक ऐसे योद्धा जिनकी वीरता और आत्मसम्मान की गूंज आज भी इन वादियों में सुनी जाती है।

राजा भभूत सिंह कोरकू: स्वाभिमान की ज्वाला, जो आज भी सतपुड़ा में गूंजती है

कोरकू संस्कृति के प्रतिनिधि योद्धा

कोरकू समाज भगवान शिव को अपना कुलदेवता मानता है और खुद को शिव के गणों का वंशज मानता है। राजा भभूत सिंह कोरकू समुदाय के एक ऐसे नेतृत्वकर्ता थे, जिनका प्रभाव पचमढ़ी, तामिया, हर्राकोट, बोरी, मढ़ई, बैतूल, हरदा और केसला जैसे क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से देखा जाता था।

वे केवल एक शासक नहीं, बल्कि अद्वितीय आध्यात्मिक साधक भी थे। आयुर्वेद, तंत्र-मंत्र, जड़ी-बूटियों की विद्या और रणकला में उनकी पारंगतता लोककथाओं का हिस्सा बन चुकी है। माना जाता है कि उन्होंने दिव्य औषधियों और मंत्रबल से अपने शरीर को इतना शक्तिशाली बना लिया था कि सामान्य अस्त्र-शस्त्र उन पर कोई प्रभाव नहीं डालते थे। किंवदंती है कि केवल हरे बांस की लकड़ी से ही उन्हें मृत्यु हो सकती थी – और यह रहस्य उनके एक विश्वासपात्र मित्र को ही ज्ञात था।

1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब तात्या टोपे अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए सतपुड़ा पहुँचे, तो उन्हें भभूत सिंह की शरण मिली। उन्होंने तात्या को गुफाओं के रास्ते हरियागढ़ से होते हुए मुलताई की ओर सुरक्षित मार्ग प्रदान किया।

जब यह जानकारी अंग्रेज अधिकारी जेम्स फोर्सिथ को मिली, तो उसने नवाब आदिल मोहम्मद खान के माध्यम से राजा पर दबाव डाला कि वे तात्या टोपे को अंग्रेजों के हवाले करें। मगर राजा भभूत सिंह ने समझौता करने से मना कर दिया और जुलाई 1859 में अंग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया।

जंगलों में छिड़ा छह महीने लंबा युद्ध

अंग्रेजी फौज और मद्रास इन्फेंट्री की टुकड़ियाँ देनवा घाटी में भेजी गईं। वहां छः महीने तक चला गुरिल्ला युद्ध भभूत सिंह की रणनीति, पहाड़ी भूगोल और गुप्त युद्ध कौशल का प्रमाण था। उनकी छापामार शैली शिवाजी महाराज की याद दिलाती है – अचानक हमला, जंगलों का उपयोग और दुश्मन को चकमा देना।

एक लोककथा के अनुसार, उन्होंने चिरौंजी के बीजों को मंत्रबल से मधुमक्खियों में परिवर्तित कर युद्ध के दौरान दुश्मनों पर छोड़ा, जिससे अंग्रेजों की सेना में भगदड़ मच गई।

विश्वासघात और गिरफ्तारी

एक बार राखी पर्व पर वे खारी गाँव में अपनी मुंहबोली बहन के पास गए थे, तभी किसी ने अंग्रेजों को इसकी सूचना दे दी। राजा की शक्तियों से परिचित उनका एक निकट सहयोगी, कथित रूप से अंग्रेजों से मिल चुका था। इसी विश्वासघात के कारण अंग्रेज उन्हें पकड़ने में सफल हुए।

उन्हें कठोर यातनाएं दी गईं, अन्न-जल से वंचित रखा गया, लेकिन उन्होंने न तो अपने खजाने का रहस्य बताया, न ही अपने साथियों का नाम उजागर किया। अंततः 1860 में जबलपुर में उन्हें मृत्युदंड दिया गया। कुछ अभिलेखों में उन्हें फांसी दिए जाने की बात है, जबकि कुछ में गोली मारने की पुष्टि मिलती है।

एक योद्धा, एक प्रतीक

उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उनकी जागीर को जब्त कर वन विभाग को सौंप दिया। यह घटना भारतीय इतिहास की पहली मिसाल थी जब किसी आदिवासी राजा की भूमि को सीधे वन क्षेत्र घोषित किया गया।

आज भी देनवा नदी के किनारे “भभूतकुंड” और उनका बग़ीचा उनकी याद को जीवित रखे हुए हैं। चौरागढ़ मंदिर में उनके द्वारा स्थापित त्रिशूल आज भी श्रद्धा और वीरता का प्रतीक हैं।

ऐतिहासिक अनदेखी का शिकार

राजा भभूत सिंह की वीरगाथा 1865 की अंग्रेज अधिकारी एलियट की सेटलमेंट रिपोर्ट में दर्ज है, लेकिन दुर्भाग्यवश मुख्यधारा इतिहास में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। सतपुड़ा के “शिवाजी” कहलाने वाले इस योद्धा को भुला दिया गया।

कोरकू समाज ने उनके बलिदान को कभी नहीं भुलाया। लोकगीतों, भजनों और लोक परंपराओं में वे आज भी जीवित हैं – एक नायक के रूप में, एक प्रतीक के रूप में।

आज की पीढ़ी का दायित्व

राजा भभूत सिंह केवल कोरकू समाज की शान नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनदेखे नायक हैं। उनका जीवन देशभक्ति, आत्मसम्मान और आध्यात्मिक शक्ति का अनूठा मिश्रण है। ऐसे महापुरुषों की गाथाओं को राष्ट्रीय पटल पर लाना हमारा नैतिक दायित्व है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ प्रेरणा पा सकें।

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